
देश के कोने-कोने में सब्जी के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक नकद की जगह क्यूआर कोड स्कैन करने की जो सहज आदत करोड़ों भारतीयों ने अपनाई है, उस पर अब अतिरिक्त लागत के बादल मंडराने लगे हैं। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए होने वाले मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की चर्चाओं के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT Bombay) के प्रोफेसरों की एक विस्तृत शोध रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट ने नीति-निर्माताओं और आम जनता दोनों का ध्यान इस ओर खींचा है कि भले ही कागजों पर यह शुल्क सिर्फ व्यापारियों यानी मर्चेंट्स पर लगाया जाए और ग्राहकों पर अतिरिक्त सरचार्ज लगाने पर कानूनी पाबंदी हो, लेकिन बाजार की वास्तविक कार्यप्रणाली के चलते इसका अंतिम वित्तीय बोझ आम आदमी की जेब पर ही पड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार, 0.40 प्रतिशत की मौजूदा प्रस्तावित दर बेहद ऊंची है और इसे तुरंत घटाकर 0.08 प्रतिशत किया जाना चाहिए ताकि डिजिटल इंडिया की रफ्तार थमे बिना वित्तीय प्रणाली का खर्च भी निकल सके।
आम तौर पर जब भी डिजिटल भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट की बात आती है, तो यह दलील दी जाती है कि नियमों के मुताबिक दुकानदार ग्राहक से अलग से कोई अतिरिक्त शुल्क (Convenience Fee या Surcharge) नहीं ले सकते। लेकिन IIT बॉम्बे के अध्ययन ने जमीनी हकीकत को उजागर करते हुए बताया है कि खुदरा व्यापार में लागत का हस्तांतरण अप्रत्यक्ष तरीकों से होता है:
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कीमतों में छिपा हुआ इजाफा: किराना रिटेल, एफएमसीजी और दैनिक उपभोग की वस्तुओं का कारोबार करने वाले छोटे व मध्यम व्यापारी पहले से ही 3 से 5 प्रतिशत के अत्यंत कम शुद्ध मुनाफे (Thin Profit Margin) पर काम करते हैं। जब उनसे 0.40% का भुगतान शुल्क काटा जाएगा, तो वे अपने घटते मुनाफे की भरपाई के लिए सीधे तौर पर सामान की एमआरपी या खुदरा कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी कर देंगे।
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कैश पर डिस्काउंट और डिजिटल पर सख्ती: कई सर्वेक्षणों में यह सामने आया है कि 80 प्रतिशत से अधिक छोटे व्यापारी इस शुल्क को खुद वहन करने की स्थिति में नहीं हैं। वे उपभोक्ताओं को नकद में भुगतान करने पर छूट देने लगेंगे या ₹2,000 से ऊपर के बिल पर यूपीआई स्वीकार करने से साफ मना कर देंगे।
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कमजोर वर्गों पर असर: जब कीमतें समग्र रूप से बढ़ती हैं, तो इसका सबसे प्रतिकूल असर मध्यम वर्गीय और निम्न आय वाले परिवारों पर पड़ता है, जो दूध, राशन और दवाइयों जैसी आवश्यक वस्तुओं के लिए यूपीआई का सहारा लेते हैं।
आईआईटी बॉम्बे की इस स्टडी में विस्तृत डेटा का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि यूपीआई का तकनीकी बुनियादी ढांचा अब इतने बड़े पैमाने (Scale) पर पहुंच चुका है कि प्रति ट्रांजैक्शन परिचालन लागत काफी घट चुकी है। ऐसे में सिस्टम को चालू रखने के लिए 0.40% का भारी शुल्क लगाने का कोई तार्किक आधार नहीं बनता:
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दर में भारी कटौती: अध्ययन में स्पष्ट सिफारिश की गई है कि यूपीआई पर एमडीआर की दर को 0.40 प्रतिशत से घटाकर मात्र 0.08 प्रतिशत (यानी वर्तमान प्रस्तावित दर का पांचवां हिस्सा) तय किया जाना चाहिए।
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बैंकों के हिस्से पर पुनर्विचार: रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि इस शुल्क से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा बैंकों की झोली में जाने के बजाय सीधे उन पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (PSPs) और फिनटेक कंपनियों को मिलना चाहिए जो असल में यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी नवाचार को बनाए रखने में भारी निवेश कर रहे हैं।
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व्यवहार्यता का संतुलन: 0.08% की न्यूनतम दर से व्यापारियों पर कोई उल्लेखनीय वित्तीय दबाव नहीं पड़ेगा और वे ग्राहकों पर किसी तरह की छिपी हुई महंगाई थोपने से बचेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) का रुख भी बेहद सतर्क रहा है। हालिया बयानों में यह साफ किया गया है कि अधिकांश रोजमर्रा के छोटे पेमेंट्स (जो वॉल्यूम के लिहाज से 90% से अधिक हैं) इस दायरे से बाहर रहते हैं और ₹2,000 से नीचे के सामान्य उपभोक्ता भुगतानों पर किसी तरह की रुकावट नहीं डाली जा रही है। आरबीआई गवर्नर ने भी स्पष्ट किया है कि मामूली शुल्क से लेन-देन की कुल संख्या में किसी बड़ी गिरावट की आशंका नहीं है। हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की चिंता इस बात को लेकर है कि बड़े लेन-देन (P2M) पर यदि लागत बढ़ी, तो लोग वापस नकद अर्थव्यवस्था (Cash Economy) की ओर लौटने लगेंगे, जिससे काले धन पर लगाम लगाने और डिजिटल ट्रेसेबिलिटी को बढ़ावा देने के प्रयासों को झटका लग सकता है।
आईआईटी बॉम्बे की यह रिपोर्ट इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि यूपीआई जैसी राष्ट्रीय सार्वजनिक डिजिटल उपयोगिता (Digital Public Infrastructure) को टिकाऊ बनाने के लिए वित्तीय संतुलन साधना जरूरी है, लेकिन यह संतुलन आम उपभोक्ता के विश्वास की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
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सरकार और नियामक संस्थाओं को चाहिए कि वे आवश्यक वस्तुओं—जैसे राशन, सब्जियां, दवाएं और सार्वजनिक परिवहन—को किसी भी प्रकार के एमडीआर से पूरी तरह मुक्त रखें।
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छोटे व्यापारियों के लिए टर्नओवर आधारित छूट की स्पष्ट सीमा तय की जाए ताकि गली-मोहल्ले के दुकानदार डिजिटल क्यूआर कोड हटाने के लिए मजबूर न हों।
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फिनटेक कंपनियों और बैंकों के इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत निकालने के लिए सरकारी बजटीय सब्सिडी या न्यूनतम तकनीकी शुल्क (जैसा कि आईआईटी बॉम्बे ने 0.08% सुझाया है) का रास्ता चुना जाए। यदि समय रहते नीतिगत स्तर पर इन व्यावहारिक चिंताओं का समाधान नहीं निकाला गया, तो भारत की सबसे सफल डिजिटल भुगतान क्रांति अनचाहे विवादों और आम आदमी की जेब पर बढ़ती महंगाई के बोझ में उलझ सकती है।
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