
आज की तेज रफ्तार और तनावभरी जिंदगी में अक्सर लोग बेवजह के चिड़चिड़ेपन, रातों की बेचैनी, नींद न आने की समस्या और अचानक दिल की धड़कन तेज हो जाने वाली चिंता को केवल काम का दबाव या डिप्रेशन मानकर टाल देते हैं। कई बार लोग इसके इलाज के लिए नींद की गोलियां लेने लगते हैं या मनोचिकित्सक के चक्कर काटने लगते हैं, लेकिन असल जड़ तक नहीं पहुंच पाते। वरिष्ठ एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि मूड में आने वाले ये अचानक बदलाव केवल दिमाग की उपज नहीं होते, बल्कि हमारी गर्दन के निचले हिस्से में मौजूद तितली के आकार की छोटी सी थायरॉइड ग्रंथि के असंतुलन का सीधा नतीजा हो सकते हैं। थायरॉइड ग्रंथि से निकलने वाले हॉर्मोन हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म से लेकर न्यूरोट्रांसमीटर और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) की कार्यप्रणाली को सीधे नियंत्रित करते हैं। जब भी इन हॉर्मोन के स्राव में रत्ती भर भी कमी या अधिकता होती है, तो उसका पहला और सबसे प्रत्यक्ष आघात हमारे मानसिक स्वास्थ्य और स्वभाव पर पड़ता है।
थायरॉइड ग्रंथि मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण हॉर्मोन—थायरोक्सिन (T4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) का उत्पादन करती है, जो पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा रिलीज किए जाने वाले थायरॉइड स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन (TSH) के निर्देश पर काम करते हैं। ये हॉर्मोन मस्तिष्क में सेरोटोनिन, डोपामाइन और नॉरएड्रेनालाईन जैसे न्यूरोकेमिकल्स के निर्माण और संतुलन में उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं, जो हमारे मूड, खुशी, नींद और ऊर्जा को नियमित करते हैं। जब रक्तप्रवाह में थायरॉइड हॉर्मोन का स्तर गड़बड़ा जाता है, तो मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर रिसेप्टर्स सही तरीके से संकेत ग्रहण नहीं कर पाते। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति बिना किसी बाहरी कारण के भी अत्यधिक बेचैनी, पैनिक अटैक, बेवजह का रोना या असहनीय चिड़चिड़ापन महसूस करने लगता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘थायरॉइड-प्रेरित मूड विकार’ (Thyroid-Induced Mood Disorders) कहा जाता है, जिसका इलाज डिप्रेशन की दवाओं से नहीं बल्कि हॉर्मोन को सामान्य स्तर पर लाकर ही संभव होता है।
जब थायरॉइड ग्रंथि आवश्यकता से अधिक मात्रा में T3 और T4 हॉर्मोन का स्राव करने लगती है, तो इस स्थिति को ‘हाइपरथायरायडिज्म’ (Hyperthyroidism) कहा जाता है। इसमें शरीर का पूरा मेटाबॉलिज्म एक तरह से ओवरड्राइव या सुपर-फास्ट मोड में चला जाता है। इसके प्रमुख मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल लक्षणों में अत्यधिक बेचैनी और कंपकंपी शामिल हैं, जहां मरीज को हर समय किसी अनहोनी का डर सताता रहता है और उसके हाथ-पैर कांपने लगते हैं। इसके साथ ही क्रॉनिक इंसोम्निया यानी अनिद्रा की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है; दिमाग इतना हाइपरएक्टिव रहता है कि थका होने के बावजूद व्यक्ति को बिस्तर पर करवटें बदलते हुए रात बितानी पड़ती है। बात-बात पर गुस्सा आना, अधीरता और पल्स रेट का 100 से ऊपर पहुंच जाना (Tachycardia) इसके प्रमुख संकेत हैं। यदि आप रात में अचानक पसीने से भीगकर घबराहट के साथ उठ जाते हैं और दिनभर आपका मूड विस्फोटक बना रहता है, तो यह ओवरएक्टिव थायरॉइड का पुख्ता अलार्म हो सकता है।
इसके ठीक विपरीत जब थायरॉइड ग्रंथि शरीर की जरूरत के अनुसार पर्याप्त हॉर्मोन नहीं बना पाती, तो उसे ‘हाइपोथायरायडिज्म’ (Hypothyroidism) कहा जाता है। इसमें शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहद सुस्त पड़ जाता है, जिसका दिमाग पर धीमा और भारी असर पड़ता है। इसके मुख्य लक्षणों में क्रॉनिक डिप्रेशन और लगातार उदासी शामिल है, जहां मरीज का किसी भी काम में मन नहीं लगता और वह सामाजिक रूप से अलग-थलग रहने लगता है। इसके साथ ही ब्रेन फॉग (Brain Fog) यानी सोचने-समझने में धुंधलापन, याददाश्त में कमजोरी और बातों को भूलने की समस्या आम हो जाती है। दिनभर 8 से 10 घंटे सोने के बाद भी अत्यधिक थकान, सुस्ती और मांसपेशियों में भारीपन महसूस होता है। हाइपोथायरायडिज्म के मरीज अक्सर चिड़चिड़े इसलिए हो जाते हैं क्योंकि उनका शरीर दिमाग के निर्देशों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता और वे अपनी धीमी गति से खुद ही कुंठित होने लगते हैं।
चिकित्सीय अध्ययनों के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं में थायरॉइड विकारों का खतरा 5 से 8 गुना अधिक पाया जाता है। महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हॉर्मोन के उतार-चढ़ाव सीधे थायरॉइड फंक्शन को प्रभावित करते हैं। प्यूबर्टी (किशोरावस्था), गर्भावस्था, प्रसव के बाद (Postpartum Thyroiditis) और मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के दौरान महिलाओं के हॉर्मोनल सिस्टम में भारी बदलाव आते हैं। अक्सर प्रसव के बाद महिलाओं में दिखने वाले डिप्रेशन (Postpartum Depression) या मेनोपॉज के मूड स्विंग्स के पीछे असल अपराधी थायरॉइड ग्रंथि की कार्यप्रणाली में आई खराबी ही होती है। इसलिए यदि किसी महिला को मूड स्विंग्स के साथ-साथ अनियमित पीरियड्स, बालों का गुच्छों में झड़ना, अचानक वजन बढ़ना या घटना और चेहरे पर सूजन की समस्या दिख रही हो, तो उसे तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए।
यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य लगातार चिड़चिड़ेपन, चिंता और अनिद्रा से जूझ रहा है और मनोवैज्ञानिक परामर्श या लाइफस्टाइल बदलने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है, तो सबसे पहले किसी अधिकृत पैथोलॉजी लैब से थायरॉइड प्रोफाइल टेस्ट (Complete Thyroid Profile) करवाएं:
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TSH (थायरॉइड स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन): यह प्राथमिक स्क्रीनिंग टेस्ट है। यदि TSH का स्तर सामान्य (0.4 से 4.0 mIU/L) से बहुत अधिक है, तो यह हाइपोथायरायडिज्म का संकेत है; यदि TSH बहुत कम है, तो यह हाइपरथायरायडिज्म दर्शाता है।
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Free T3 और Free T4: रक्त में सक्रिय हॉर्मोन के सटीक स्तर को मापने के लिए यह टेस्ट बेहद जरूरी है।
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एंटी-TPO एंटीबॉडी टेस्ट: यह ऑटोइम्यून थायरॉइड बीमारियों जैसे हाशिमोटो थायरॉयडिटिस (Hashimoto’s) या ग्रेव्स डिजीज (Graves’ Disease) का पता लगाने के लिए किया जाता है, जो मूड डिसऑर्डर्स के बड़े कारण हैं।
थायरॉइड असंतुलन से होने वाली चिंता और नींद की कमी से पूरी तरह छुटकारा पाया जा सकता है, बशर्ते सही समय पर मेडिकल हस्तक्षेप किया जाए। यदि जांच में हाइपोथायरायडिज्म निकलता है, तो डॉक्टर सुबह खाली पेट ली जाने वाली सिंथेटिक थायरॉक्सिन हॉर्मोन की गोली (जैसे लेवोथायरोक्सिन) निर्धारित करते हैं, जिससे कुछ ही हफ्तों में मूड और ऊर्जा का स्तर पूरी तरह सामान्य हो जाता है। हाइपरथायरायडिज्म के लिए एंटी-थायरॉइड दवाएं और बीटा-ब्लॉकर्स दिए जाते हैं जो तुरंत दिल की धड़कन और घबराहट को शांत करते हैं। इसके साथ ही अपनी दिनचर्या में सेलेनियम, जिंक और आयोडीन युक्त संतुलित आहार शामिल करें, कैफीन और प्रोसेस्ड शुगर का सेवन सीमित करें तथा रोजाना 20 से 30 मिनट प्राणायाम (जैसे अनुलोम-विलोम और उज्जायी प्राणायाम) का अभ्यास करें। कभी भी खुद से दवा की डोज कम या ज्यादा न करें और हर तीन से छह महीने में एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से अपनी जांच रिपोर्ट की समीक्षा अवश्य कराते रहें।
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