15 अक्टूबर से UPI पर 0.40% MDR का झटका! व्यापारियों की चेतावनी, लगाएंगे ‘Cash Only’ के बोर्ड, वित्त मंत्री को लिखा लेटर

देश के डिजिटल भुगतान तंत्र की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर एक बड़े विवाद की चिंगारी सुलग उठी है। बैंकों, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और बड़े पेमेंट गेटवे ऑपरेटरों की ओर से डिजिटल लेनदेन के बुनियादी ढांचे और सर्वर लागत का हवाला देते हुए 15 अक्टूबर से चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर 0.40 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। इस प्रस्तावित कदम की भनक लगते ही देशभर के खुदरा व्यापारी, उद्योग मंडल और एमएसएमई संगठन खुलकर विरोध में उतर आए हैं। व्यापारिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि छोटे और मझोले स्तर के डिजिटल लेन-देन पर किसी भी प्रकार का शुल्क थोपा गया, तो वे अपनी दुकानों के बाहर से क्यूआर कोड हटाकर ‘ओनली कैश’ (केवल नकद स्वीकार्य) के बोर्ड टांग देंगे। अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (CAIT) समेत कई प्रमुख व्यावसायिक संस्थाओं ने इस मामले में सीधे केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को औपचारिक पत्र लिखकर आपात हस्तक्षेप की मांग की है।

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह शुल्क होता है जो बैंक या डिजिटल पेमेंट कंपनियां किसी व्यापारी से डिजिटल माध्यम से पैसे स्वीकार करने की सुविधा के बदले वसूलती हैं। साल 2020 में केंद्र सरकार ने रूपे डेबिट कार्ड और यूपीआई को पूरी तरह जीरो एमडीआर (शून्य शुल्क) के दायरे में लाकर देश में डिजिटल क्रांति को ऐतिहासिक रफ्तार दी थी। अब बैंकिंग जगत का तर्क है कि देश में प्रतिदिन करोड़ों छोटे-बड़े सौदे प्रोसेस करने के लिए डेटा सेंटर, साइबर सुरक्षा, नेटवर्क बैंडविड्थ और सर्वर कैपेसिटी पर हजारों करोड़ रुपये का सालाना खर्च आ रहा है, जिसे बिना किसी चार्ज के वहन करना मुमकिन नहीं है। इसी घाटे की भरपाई के लिए 15 अक्टूबर से ₹2,000 से अधिक के व्यापारिक यूपीआई ट्रांजैक्शंस पर 0.40% एमडीआर लागू करने की रूपरेखा प्रस्तावित की गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि कोई ग्राहक किसी रिटेल स्टोर पर ₹5,000 का सामान खरीदकर क्यूआर कोड से भुगतान करता है, तो दुकानदार के खाते में ₹20 कटकर मात्र ₹4,980 ही जमा होंगे। किराना, मेडिकल, कपड़ा और रोजमर्रा की वस्तुओं के कारोबार में मार्जिन पहले से ही 1.5 से 2 फीसदी के बीच सिमटा हुआ है, ऐसे में 0.40% का यह कट व्यापारियों के शुद्ध मुनाफे का 20 से 25 फीसदी हिस्सा सीधे छीन लेगा।

व्यापारी संगठनों ने वित्त मंत्रालय को भेजे अपने विस्तृत ज्ञापन में आगाह किया है कि 0.40% एमडीआर लगाने का फैसला प्रधानमंत्री के ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘कैशलेस इकोनॉमी’ के विजन को गहरा झटका देगा। व्यापारियों का कहना है कि उन्होंने सरकार की अपील पर ही वर्षों पुराने नकदी के लेन-देन को छोड़कर हर काउंटर पर क्यूआर कोड और साउंडबॉक्स लगाए थे। सरकार यदि बैंकों और फिनटेक कंपनियों की परिचालन लागत की भरपाई करना ही चाहती है, तो इसके लिए बजट में डिजिटल इंसेंटिव फंड का आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए, न कि इसका बोझ छोटे दुकानदारों के मत्थे मढ़ा जाना चाहिए। पत्र में साफ चेतावनी दी गई है कि अगर इस प्रस्तावित व्यवस्था को 15 अक्टूबर से जबरन लागू किया गया, तो देश के करोड़ों रिटेलर्स सामूहिक रूप से क्यूआर कोड स्टैंड हटाकर दोबारा नकद लेन-देन शुरू करने के लिए मजबूर होंगे। इससे न केवल बैंकों में फिर से नकदी का भारी दबाव बढ़ेगा, बल्कि टैक्स चोरी पर लगाम लगाने की सरकारी कोशिशों को भी बड़ा नुकसान पहुंचेगा।

इस पूरे घटनाक्रम में आम जनता के लिए सबसे राहत की बात यह है कि पर्सन-टू-पर्सन (P2P) यानी आम लोगों के बीच होने वाले आपसी फंड ट्रांसफर पर किसी प्रकार का कोई चार्ज नहीं लगेगा। यदि आप अपने किसी रिश्तेदार, दोस्त या परिचित को यूपीआई के जरिए कोई भी धनराशि भेजते हैं, तो वह पहले की तरह ही सौ फीसदी मुफ्त रहेगी। हालांकि, इसका अप्रत्यक्ष असर आम खरीदार पर जरूर पड़ सकता है। व्यापारिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दुकानदारों पर 0.40% एमडीआर का आर्थिक बोझ थोपा गया, तो वे इस नुकसान को अपनी जेब से सहने के बजाय सामान के खुदरा दाम बढ़ा देंगे या फिर डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए ग्राहक से अतिरिक्त ‘सुविधा शुल्क’ (कन्वीनियंस चार्ज) की मांग करेंगे। इससे रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल और गारमेंट्स की खरीदारी सीधे तौर पर महंगी हो जाएगी।

उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर इस फैसले के खिलाफ गहरा असंतोष देखा जा रहा है। दिल्ली के चांदनी चौक, सदर बाजार और करोल बाग से लेकर लखनऊ के अमीनाबाद, हजरतगंज, आलमबाग और कानपुर के नयागंज तक के व्यापारी संगठनों ने आपात बैठकें बुला ली हैं। व्यापारियों का कहना है कि पहले से ही महंगाई और जीएसटी की जटिलताओं से जूझ रहे खुदरा बाजार पर इस तरह का चार्ज लगाना कुठाराघात जैसा है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में जहां छोटे कारोबारी अभी-अभी डिजिटल भुगतान के अभ्यस्त हुए हैं, वहां बैंक चार्ज के डर से दुकानदार ग्राहकों से सीधे कैश मांगने की तैयारी में हैं। स्थानीय व्यापार मंडलों ने दो टूक कह दिया है कि यदि सरकार ने 15 अक्टूबर से पहले इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से खारिज नहीं किया, तो वे चरणबद्ध विरोध प्रदर्शन और ‘नो क्यूआर डे’ जैसे आंदोलनों की शुरुआत करेंगे। अब सबकी निगाहें वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई की आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं।