
वैश्विक तकनीकी और रोजगार जगत से अमेरिका के रास्ते एक बेहद चिंताजनक और बड़ी खबर सामने आ रही है, जो विशेष रूप से उन लाखों भारतीय पेशेवरों (Indian Professionals) के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकती है जो हर साल अपने अमेरिकी सपने को पूरा करने के लिए एच-1बी (H-1B) वीजा के सहारे समंदर पार जाते हैं। अमेरिकी संसद में आव्रजन नियमों को और अधिक कठोर बनाने के उद्देश्य से एक नया और बेहद सख्त बिल पेश किया गया है, जिसके प्रावधानों के तहत यदि कोई कंपनी या प्रायोजक नियोक्ता एच-1बी वीजा के नियमों या श्रमिक कानूनों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उस पर 2.40 करोड़ रुपये यानी लगभग 300,000 डॉलर तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जा सकता है। इस नए विधायी प्रस्ताव के सामने आने के बाद से ही सिलिकॉन वैली से लेकर भारत के तकनीकी हब बेंगलुरु, हैदराबाद और नोएडा तक की टेक कंपनियों और आईटी प्रोफेशनल्स के बीच हड़कंप मच गया है, क्योंकि इससे अमेरिका में नौकरी और वीजा की स्थिरता पर एक बार फिर बड़ा संकट मंडराने लगा है।
अमेरिका में लंबे समय से यह राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है कि विदेशी कामगारों विशेषकर एशियाई देशों के टेक प्रोफेशनल्स को कम वेतन पर काम पर रखकर अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीनी जा रही हैं, और इसी स्थानीय दबाव के चलते अमेरिकी सांसदों ने इस नए बिल का प्रस्ताव रखा है। इस नए बिल में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई कंपनी एच-1बी वीजा धारक कर्मचारी को तय न्यूनतम सैलरी से कम भुगतान करती है, स्थानीय स्तर पर अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देने के बजाय विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देती है या फिर वीजा नियमों के किसी भी अन्य प्रावधान की अवहेलना करती है, तो उस पर वित्तीय दंड के रूप में करोड़ों रुपये का जुर्माना थोप दिया जाएगा। इसके अलावा, इस बिल के कानून बनने पर श्रम विभाग (Department of Labor) को कंपनियों के ऑडिट और दस्तावेजों की जांच करने के लिए और अधिक व्यापक अधिकार मिल जाएंगे, जिससे अमेरिकी धरती पर काम कर रहे विदेशी कर्मचारियों और उनकी प्रायोजक कंपनियों दोनों की जवाबदेही कई गुना बढ़ जाएगी।
अमेरिका के इस नए और आक्रामक आव्रजन रुख का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष असर भारत के उन हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियरों, डेटा वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों पर पड़ने वाला है जो हर साल लॉटरी सिस्टम के जरिए एच-1बी वीजा हासिल करके अमेरिका जाते हैं। चूंकि जुर्माने का प्रावधान बहुत अधिक सख्त है, इसलिए अब अमेरिका की बड़ी और छोटी टेक कंपनियां भारतीय कर्मचारियों को हायर करने से पहले दो बार सोचेंगी और वीजा स्पॉन्सरशिप की जटिल प्रक्रियाओं से बचने के लिए स्थानीय नागरिकों को नौकरी देना ज्यादा सुरक्षित समझेंगी। इसके अलावा, जो भारतीय पेशेवर पहले से ही अमेरिका में नौकरी कर रहे हैं, उन्हें भी अपने जॉब स्विच करने या वीजा ट्रांसफर कराने के दौरान अतिरिक्त कानूनी अड़चनों और कंपनियों की हिचकिचाहट का सामना करना पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के नियमों से भारतीय टेक टैलेंट के लिए अमेरिकी श्रम बाजार में टिके रहना और आगे बढ़ना पहले के मुकाबले काफी ज्यादा चुनौतीपूर्ण और पेचीदा हो जाएगा।
जैसे-जैसे अमेरिका में चुनावी और राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, आव्रजन नीतियों (Immigration Policies) का कड़ा होना एक ट्रेंड बनता जा रहा है, और इस नए बिल ने यह साबित कर दिया है कि आने वाले दिनों में अमेरिका की राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है। हालांकि, अभी यह केवल एक बिल के रूप में पेश किया गया है और इसे अमेरिकी कांग्रेस तथा सीनेट के दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बनने की लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा, लेकिन इसकी गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता। जो भारतीय पेशेवर या छात्र अमेरिका में अपना करियर बनाने की योजना बना रहे हैं, उन्हें अब अपनी कानूनी और तकनीकी योग्यताओं को और अधिक मजबूत करना होगा तथा पूरी तरह से नियमों का पालन करने वाली कंपनियों के साथ ही जुड़ना होगा। यह समय यह सोचने का भी है कि अब भारतीय टेक सेक्टर को अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था और वैकल्पिक ग्लोबल डेस्टिनेशंस पर भी गंभीरता से ध्यान देना चाहिए ताकि अमेरिकी नीतियों के ऐसे झटकों से करियर पर कोई बुरा असर न पड़े।
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