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RBI क्यों करता है Repo Rate की समीक्षा? जानिए 0.25% के मामूली बदलाव से कैसे बदल जाता है आपकी EMI, महंगाई और बाजार का पूरा गणित

भारतीय अर्थव्यवस्था के सुचारू संचालन और वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास सबसे प्रभावशाली अस्त्र मौद्रिक नीति (Monetary Policy) है। इसका केंद्र बिंदु ‘रेपो रेट’ (Repo Rate) होता है। रेपो रेट वह मानक ब्याज दर है जिस पर देश का केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों (जैसे SBI, HDFC Bank, PNB) को उनकी तात्कालिक जरूरतों के लिए अल्पावधि ऋण उपलब्ध कराता है। आरबीआई अधिनियम के तहत गठित 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) हर दो महीने में बैठक कर देश में मुद्रास्फीति (महंगाई दर) और आर्थिक विकास (GDP Growth) की गति का सूक्ष्म आकलन करती है। केंद्रीय बैंक का प्राथमिक वैधानिक दायित्व खुदरा महंगाई दर (CPI) को 4% (2% के उतार-चढ़ाव मार्जिन के साथ, यानी 2% से 6% के दायरे में) पर सीमित रखना है। जब भी अर्थव्यवस्था में कीमतों का संतुलन बिगड़ता है या बाजार में नकदी (लिक्विडिटी) का असंतुलन पैदा होता है, तब आरबीआई रेपो रेट की समीक्षा कर बाजार को संतुलित दिशा देता है।

आरबीआई द्वारा रेपो रेट में किया जाने वाला निर्णय पूरी तरह बाजार में मौजूद पैसे की तरलता पर निर्भर करता है। जब बाजार में आवश्यक वस्तुओं, कच्चे माल और सेवाओं की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं और मुद्रास्फीति तय सीमा को पार करने का जोखिम पैदा करती है, तो केंद्रीय बैंक बाजार से अतिरिक्त नकदी सोखने के लिए रेपो रेट में बढ़ोतरी (Rate Hike) करता है। दरें बढ़ते ही बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से उधारी लेना महंगा हो जाता है, जिसके चलते बैंक अपने ग्राहकों के लिए भी कर्ज की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। कर्ज महंगा होने से लोग घर, गाड़ी या अन्य व्यक्तिगत खर्चों को टालने लगते हैं और उद्योग जगत नए पूंजीगत विस्तार (Capex) को धीमा कर देता है। परिणामस्वरूप बाजार में कुल मांग (Aggregate Demand) घटती है और महंगाई पर ब्रेक लगता है। इसके विपरीत, जब देश में आर्थिक मंदी या सुस्ती का माहौल होता है, तो विकास को रफ्तार देने के लिए आरबीआई रेपो रेट में कटौती (Rate Cut) करता है, जिससे कर्ज सस्ता होता है, बाजार में निवेश बढ़ता है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

अक्सर आम जनता को लगता है कि 0.25% या 25 बेसिस प्वाइंट्स का बदलाव बेहद मामूली है, लेकिन लंबी अवधि के वित्तीय अनुबंधों में यह गणित लाखों रुपये का अंतर पैदा कर देता है। अक्टूबर 2019 से आरबीआई के आदेशानुसार सभी बैंकों के फ्लोटिंग रिटेल लोन्स सीधे एक्सटर्नल बेंचमार्क (EBLR) यानी रेपो रेट से लिंक्ड हैं। इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।

लोन का विवरण बेस रेट (8.50%) 25 bps बढ़ोतरी के बाद (8.75%) मासिक व कुल अंतर
लोन की कुल राशि ₹30,00,000 ₹30,00,000 मूलधन समान
लोन की अवधि 20 वर्ष (240 माह) 20 वर्ष (240 माह) समय अवधि समान
मासिक ईएमआई (EMI) ₹26,035 ₹26,511 ₹476 प्रति माह अतिरिक्त
20 साल में कुल देय ब्याज ₹32,48,333 ₹33,62,714 ₹1,14,381 का सीधा अतिरिक्त बोझ

यदि बैंक ईएमआई की राशि न बढ़ाकर लोन की अवधि बढ़ा देते हैं, तो 20 वर्ष का लोन बढ़कर लगभग 21.5 वर्ष का हो जाता है, जिससे कर्जदार को डेढ़ साल तक अतिरिक्त किस्तों का भुगतान करना पड़ता है।

रेपो रेट में बदलाव केवल कर्जदारों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट और बचत खातों पर मिलने वाले रिटर्न का समीकरण भी तय करता है। जब केंद्रीय बैंक रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों को फंड जुटाने के लिए अधिक लागत चुकानी पड़ती है। अपनी ऋण वृद्धि की मांग को पूरा करने के लिए बैंक आम नागरिकों और विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से एफडी की ब्याज दरों में तत्काल इजाफा करते हैं। उदाहरण के तौर पर, जब रेपो रेट बढ़ता है तो 1 से 3 साल की एफडी पर ब्याज दरें 7.5% से 8.25% तक पहुंच जाती हैं, जिससे सेवानिवृत्त और जोखिम न लेने वाले रूढ़िवादी निवेशकों की निश्चित मासिक आय में बढ़ोतरी होती है। इसके उलट, जब रेपो रेट घटता है, तो बैंक सबसे पहले जमा दरों (डिपॉजिट रेट्स) में कटौती करते हैं, जिससे सुरक्षित निवेश पर मिलने वाला रिटर्न सिकुड़ जाता है।

रेपो रेट में होने वाले बदलाव का असर देश के शेयर बाजार (Sensex और Nifty) और भारतीय रुपये की विनिमय दर पर भी गहराई से पड़ता है। यदि आरबीआई दरों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी करता है, तो कंपनियों की उधारी लागत बढ़ने से उनके शुद्ध मुनाफे के मार्जिन पर दबाव आता है, जिससे शेयर बाजार में बिकवाली का दबाव देखा जाता है। रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और बैंकिंग सेक्टर के स्टॉक्स रेपो रेट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। दूसरी ओर, जब ब्याज दरें प्रतिस्पर्धी बनी रहती हैं, तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय बॉन्ड बाजार की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये को मजबूती मिलती है। इस प्रकार रेपो रेट की हर द्विमासिक समीक्षा केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक के घरेलू बजट से लेकर संपूर्ण वृहद आर्थिक ढांचे (Macroeconomic Structure) को साधने वाला सबसे अहम पहिया है।