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आज प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि का दुर्लभ महासंयोग: शिव जी को प्रसन्न करने का डबल मौका, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा

सनातन हिंदू पंचांग में भगवान आशुतोष महादेव की आराधना के लिए हर माह पड़ने वाला प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि दोनों ही अत्यंत पवित्र और फलदायी दिन माने जाते हैं। जब कभी ये दोनों पावन तिथियां एक ही दिन एक साथ पड़ती हैं, तो इसे शास्त्रों में अत्यंत दुर्लभ और महाकल्याणकारी संयोग माना गया है। त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को समर्पित प्रदोष व्रत के रूप में संध्याकाल में पूजी जाती है, वहीं चतुर्दशी तिथि का आगमन मासिक शिवरात्रि के रूप में रात्रि कालीन निशिता पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। आज के दिन महादेव के साथ जगतजननी माता पार्वती की संयुक्त आराधना करने से कुंडली के बड़े से बड़े ग्रह दोष शांत होते हैं, जीवन से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है। ज्योतिष विद्वानों के अनुसार, इस पावन तिथि पर भोलेनाथ अत्यंत सौम्य रूप में पृथ्वी पर विचरण करते हैं और मात्र एक लोटा शुद्ध जल और बेलपत्र अर्पित करने वाले भक्त पर भी अपनी दोनों भुजाएं उठाकर कृपा बरसाते हैं।

इस महासंयोग का पूर्ण लाभ उठाने के लिए सही समय और मुहूर्त में पूजा-अर्चना करना बेहद आवश्यक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा हमेशा सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक के समय यानी ‘प्रदोष काल’ में की जाती है। आज शाम प्रदोष काल का श्रेष्ठ पूजा मुहूर्त शाम 05 बजकर 48 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भगवान शिव का रुद्राभिषेक और पंचाक्षरी मंत्र का जप सर्वोत्तम फल प्रदान करेगा। वहीं दूसरी ओर, मासिक शिवरात्रि की प्रधान पूजा मध्य रात्रि में की जाती है, जिसे तंत्र और शिव साधना में ‘निशिता काल मुहूर्त’ कहा जाता है। निशिता काल की पूजा का विशेष समय आज रात 11 बजकर 42 मिनट से लेकर देर रात 12 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। जो भक्त इन दोनों कालों में क्रमशः शिवजी की पूजा और रात्रि जागरण करते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

आज के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ हल्के रंग के वस्त्र धारण करें और मन ही मन भगवान शिव का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन फलाहार रहकर मन को शांत और विकारमुक्त रखें। शाम को प्रदोष काल शुरू होने से पहले पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। इसके बाद शिवलिंग को उत्तर दिशा की ओर मुख करके स्थापित करें और सबसे पहले तांबे या चांदी के लोटे से गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल चढ़ाएं। फिर क्रमशः गाय के कच्चे दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद और खांड (पंचामृत) से ‘ॐ नमः शिवाय’ अथवा महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान का अभिषेक करें। अभिषेक के पश्चात पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर भस्म, चंदन और त्रिपुंड लगाएं। भगवान आशुतोष को 11 या 21 अखंडित (बिना कटे-फटे) बेलपत्र पर सफेद चंदन से ‘राम’ या ‘ॐ’ लिखकर अर्पित करें। इसके साथ ही शमी पत्र, धतूरा, भांग, मंदार के पुष्प, सफेद मिष्ठान और मौसमी फल श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, एक समय एक अत्यंत दीन-हीन ब्राह्मणी थी, जिसके पति का देहांत हो चुका था। वह अपने छोटे पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर किसी तरह अपना जीवन यापन करती थी। एक दिन भिक्षाटन से लौटते समय उसे रास्ते में विदर्भ देश का एक बालक मिला, जो घायल और भूखा था। वह बालक वास्तव में विदर्भ का राजकुमार था, जिसके पिता का राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था और पिता की मृत्यु हो चुकी थी। ब्राह्मणी दयावश उस राजकुमार को भी अपने घर ले आई और अपने पुत्र की तरह दोनों का पालन-पोषण करने लगी। कुछ समय पश्चात एक ऋषि के निर्देश पर ब्राह्मणी ने विधि-विधान से प्रदोष व्रत करना शुरू किया। कुछ दिनों बाद राजकुमार वन में भ्रमण कर रहा था, तभी उसकी भेंट गंधर्व कन्या अंशुमती से हुई। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए। गंधर्व राज को जब यह ज्ञात हुआ कि यह विदर्भ का राजकुमार है, तो उन्होंने भगवान शिव की कृपा से अपनी पुत्री का विवाह उस राजकुमार से करा दिया। इसके बाद गंधर्वों की विशाल सेना की सहायता से राजकुमार ने अपने पैतृक राज्य पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया और उसने उस वृद्ध ब्राह्मणी तथा उसके पुत्र को राजमहल में सर्वोच्च सम्मान और वैभव प्रदान किया। इस प्रकार जो भी श्रद्धालु इस दिन निष्काम या सकाम भाव से व्रत व कथा का श्रवण करते हैं, उनकी समस्त दरिद्रता समाप्त हो जाती है।

यदि जीवन में लंबे समय से कोई बाधा, रोग या आर्थिक तंगी बनी हुई है, तो आज के इस दोहरे महासंयोग में कुछ सरल ज्योतिषीय उपाय अवश्य करने चाहिए। सबसे पहला उपाय यह है कि आज शाम के समय किसी प्राचीन शिव मंदिर में जाकर 11 मुखी घी का दीपक या कम से कम एक चौमुखी दीपक जलाएं और वहीं बैठकर शिव चालीसा का पाठ करें। दूसरा उपाय, शिवलिंग पर 108 अक्षत (अखंडित चावल) यह प्रार्थना करते हुए अर्पित करें कि घर में अन्न और धन का भंडार सदा भरा रहे। तीसरा उपाय, वैवाहिक जीवन में मधुरता और शीघ्र विवाह की कामना के लिए माता पार्वती को लाल चुनरी और श्रृंगार सामग्री तथा महादेव को सफेद आंकड़े के फूल अर्पित करें। चौथा उपाय, शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से पीड़ित लोग शिवलिंग पर थोड़े से काले तिल और शमी के पत्ते जल में मिलाकर चढ़ाएं। पांचवां और सबसे प्रभावशाली उपाय, रात के निशिता काल में रुद्राक्ष की माला से कम से कम 5 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। यह साधना मानसिक तनाव को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और रुके हुए कार्यों को गति देती है।