एकादशी व्रत कथा: एक सपने ने बदल दी राजा इंद्रसेन की जिंदगी, पितरों को यमलोक से मुक्ति दिलाने किया यह महाव्रत

सनातन धर्म में एकादशी के सभी व्रतों में अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली ‘इंदिरा एकादशी’ का स्थान सबसे विशिष्ट और कल्याणकारी माना गया है। यह एकादशी पितृ पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष के ठीक मध्य में आती है, जिसके चलते इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। पौराणिक मान्यता है कि यदि परिवार का कोई पूर्वज या पितर अपने पूर्व जन्मों के किसी जाने-अनजाने पाप कर्म के कारण यमलोक में कष्ट भोग रहा हो, तो उसके वंशज द्वारा सच्चे मन से रखे गए इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसे तत्काल नरक की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है और वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। उत्तर भारत के पवित्र तीर्थों—काशी, प्रयागराज, अयोध्या, गया—से लेकर देश भर के श्रद्धालु पितरों की आत्मिक शांति के लिए इस व्रत का विधि-विधान से अनुष्ठान करते हैं। इस परम पावन व्रत की उत्पत्ति और महत्व से जुड़ी राजा इंद्रसेन की कथा महाभारत काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी, जो मनुष्य के भक्ति और पितृ-ऋण से मुक्ति के संकल्प का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, सत्ययुग में माहिष्मती नगरी पर राजा इंद्रसेन का शासन था। राजा इंद्रसेन बड़े ही धर्मात्मा, प्रजावत्सल, शूरवीर और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके राज्य में प्रजा हर प्रकार के दुख, दरिद्र और भय से मुक्त होकर सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी। राजा स्वयं प्रतिदिन यज्ञ, दान, जप और तप में लीन रहते थे तथा ब्राह्मणों और संतों का यथोचित सत्कार करते थे। उनके धर्मपरायण आचरण के कारण चारों दिशाओं में उनकी कीर्ति फैली हुई थी। उनके महल में कभी किसी वस्तु की कमी नहीं थी और पूरा राजपरिवार श्रीहरि की भक्ति में रंगा रहता था। किंतु, नियति ने राजा की धर्मनिष्ठा की परीक्षा लेने और संसार को पितृ-मुक्ति का दुर्लभ मार्ग दिखाने के लिए एक अद्भुत लीला रची, जिसने राजा के पूरे जीवन की दिशा ही बदल दी।

एक रात जब राजा इंद्रसेन अपनी शय्या पर विश्राम कर रहे थे, तो उन्होंने स्वप्न में एक अत्यंत विचलित कर देने वाला दृश्य देखा। उन्होंने देखा कि उनके पूज्य पिता यमराज की नगरी में घोर यातनाएं सह रहे हैं और अपने पुत्र को पुकारते हुए कह रहे हैं कि हे पुत्र! किसी पूर्व जन्म के पाप के कारण मैं यमदूतों के कष्ट झेल रहा हूं, मुझे यहां से मुक्त कराओ। राजा आधी रात को पसीने से लथपथ होकर जाग उठे। पिता की करुण पुकार उनके कानों में गूंज रही थी और उनका हृदय भारी ग्लानि से भर गया। वे सोचने लगे कि जिस पुत्र के रहते पिता नरक भोग रहे हों, उसका वैभव और राजपाठ सब व्यर्थ है। अगले ही दिन जब राजा दरबार में अत्यंत चिंतित अवस्था में बैठे थे, तभी वीणा की झंकार के साथ ‘नारायण-नारायण’ का जाप करते हुए देवर्षि नारद वहां पधारे। राजा ने आसन छोड़कर देवर्षि के चरण स्पर्श किए और उन्हें पूरे आदर के साथ सिंहासन पर बैठाया।

देवर्षि नारद ने राजा से उनकी उदासी का कारण पूछा, तो राजा इंद्रसेन ने हाथ जोड़कर अपने स्वप्न की व्यथा सुनाई। इस पर देवर्षि नारद मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “हे राजन! तुम्हारा स्वप्न कोई भ्रम नहीं, बल्कि सत्य है। कुछ समय पूर्व जब मैं यमलोक की यात्रा पर था, तब यमराज की सभा में मेरी भेंट तुम्हारे धर्मात्मा पिता से हुई थी। पूर्व जन्म में व्रत भंग होने के दोष के कारण वे यमलोक में रुके हुए हैं। तुम्हारे पिता ने अत्यंत व्यथित होकर मुझसे कहा था कि मैं उनके पुत्र इंद्रसेन को उनका संदेश दूं। उन्होंने कहा है कि यदि मेरा पुत्र अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की ‘इंदिरा एकादशी’ का व्रत रखे और उस व्रत का समस्त पुण्य मुझे समर्पित कर दे, तो मुझे तुरंत यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी और मैं स्वर्ग लोक प्रस्थान कर सकूंगा।” देवर्षि नारद की यह बात सुनकर राजा इंद्रसेन की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बहने लगे। उन्होंने नारद जी से इस व्रत की पूर्ण विधि और नियम बताने की प्रार्थना की।

देवर्षि नारद ने राजा को व्रत की शास्त्रीय विधि विस्तार से समझाते हुए कहा कि दशमी तिथि के दिन प्रातःकाल पवित्र नदी या जलाशय में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। दशमी को मध्याह्न में पितरों का तर्पण करें और केवल एक बार सात्विक भोजन ग्रहण करें। इसके बाद एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर शौच-स्नान से निवृत्त हों और भगवान शालिग्राम अथवा श्रीहरि विष्णु के चतुर्भुज रूप का विधिवत पंचोपचार या षोडशोपचार से पूजन करें। धूप, दीप, गंध, पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पित करते हुए दिन भर पूर्ण निराहार या फलाहार रहकर उपवास का संकल्प लें। दोपहर के समय पितरों के निमित्त धूप-दीप देकर श्राद्ध और तर्पण करें तथा गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए भोजन का अंश निकालें। इसके उपरांत योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा प्रदान करें। नारद जी ने निर्देश दिया कि दिन भर भगवान विष्णु के नामों का कीर्तन करते हुए रात्रि में जागरण करें और द्वादशी के दिन प्रातः पुनः पूजन कर ब्राह्मणों को दान देने के पश्चात व्रत का पारण करें।

देवर्षि नारद के बताए अनुसार, राजा इंद्रसेन ने अश्विन कृष्ण एकादशी के आने पर अपनी रानियों, मंत्रियों और परिजनों सहित अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा से इंदिरा एकादशी का संपूर्ण उपवास किया। द्वादशी के दिन राजा ने शालिग्राम जी के सम्मुख हाथ में कुश, अक्षत और गंगाजल लेकर संकल्प पढ़ा और अपने व्रत से अर्जित समस्त पुण्यों को अपने दिवंगत पिता के चरणों में अर्पित कर दिया। जैसे ही राजा ने जल धरती पर छोड़ा, उसी क्षण आकाश में दिव्य दुंदुभियां बजने लगीं। राजा ने देखा कि उनके पिता यमलोक के बंधनों से मुक्त होकर एक अत्यंत सुंदर, प्रकाशवान दिव्य विमान में आरूढ़ हो चुके हैं। उनके पिता ने प्रसन्नचित्त होकर अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और कहा, “पुत्र! तुम्हारे इस निष्काम और पावन व्रत के प्रभाव से केवल मेरा ही नहीं, बल्कि हमारे कुल की कई पीढ़ियों का उद्धार हो गया है।” इसके बाद उनके पिता बैकुंठ लोक की ओर प्रस्थान कर गए। राजा इंद्रसेन ने भी आजीवन धर्मपूर्वक राजकाज संभाला और अंत समय में अपने समस्त परिवार सहित भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुए।