
भारत में शहरीकरण की रफ्तार, बढ़ते ट्रैफिक जाम और सड़क हादसों की चुनौतियों के बीच परिवहन व्यवस्था एक ऐतिहासिक बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय सड़कों पर न केवल आधुनिक इलेक्ट्रिक और कनेक्टेड गाड़ियां दौड़ती नजर आएंगी, बल्कि ड्राइवरलेस यानी ऑटोनॉमस वाहनों की आवाजाही भी एक आम हकीकत बनने जा रही है। दुनिया भर में ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित परिवहन तंत्र का प्रसार तेजी से हो रहा है, लेकिन भारत जैसी विविध भौगोलिक स्थिति और मिश्रित ट्रैफिक वाली सड़कों पर बिना ड्राइवर वाली गाड़ियों को सुरक्षित रूप से उतारना एक बेहद जटिल कार्य माना जाता है। इसी जरूरत को भांपते हुए देश की राष्ट्रीय मानक संस्था भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards – BIS) ने स्मार्ट ट्रांसपोर्टेशन और ऑटोनॉमस मोबिलिटी को सुरक्षित, सुव्यवस्थित और एकीकृत बनाने के लिए एक व्यापक तकनीकी रूपरेखा तैयार कर दी है। BIS द्वारा तैयार किए गए ये नए मानक देश के छोटे कस्बों से लेकर महानगरों तक सार्वजनिक परिवहन, ट्रैफिक सिग्नल प्रणाली, पार्किंग प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को एक आधुनिक इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम (ITS) के ढांचे में पिरोने का काम करेंगे।
भारतीय मानक ब्यूरो ने देश के अलग-अलग आकार के शहरों और उनकी विशिष्ट भौगोलिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तीन प्रमुख राष्ट्रीय मानक आधिकारिक तौर पर अधिसूचित किए हैं। इनमें सबसे पहला मानक IS 18312 है, जिसे विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 यानी छोटे शहरों की स्मार्ट ट्रांसपोर्टेशन आवश्यकताओं के लिए डिजाइन किया गया है। इस मानक का उद्देश्य छोटे शहरों में सीमित संसाधनों और संकरी सड़कों के बीच आधुनिक ट्रैफिक सेंसर, जीपीएस ट्रैकिंग और डिजिटल पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को किफायती तरीके से लागू करना है। दूसरा महत्वपूर्ण मानक IS 18311 है, जो बड़े महानगरीय क्षेत्रों और उनके उप-नगरीय व सैटेलाइट शहरों के बीच ‘स्मार्ट रैपिड ट्रांजिट’ (Smart Rapid Transit) कनेक्टिविटी स्थापित करने के लिए तैयार किया गया है। यह मानक हाई-स्पीड बस कॉरिडोर, रीजनल रैपिड रेल और एक्सप्रेसवे पर चलने वाले वाहनों के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग और बाधा-मुक्त आवाजाही को सुनिश्चित करता है। तीसरा मानक IS 17546 है, जो आधुनिक शहरों में पार्किंग की भीषण किल्लत से निपटने के लिए ‘स्मार्ट पार्किंग लॉट आवंटन’ की व्यवस्था तय करता है। इस मानक के जरिए वाहनों में लगे सेंसर और शहर के सेंट्रल ट्रैफिक सर्वर के बीच तालमेल बैठेगा, जिससे चालक को खाली पार्किंग स्लॉट की सटीक जानकारी और अग्रिम बुकिंग सीधे मोबाइल स्क्रीन या कार के डैशबोर्ड पर मिल सकेगी।
सिर्फ घरेलू मानक बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर बन रही नई ऑटोमोबाइल तकनीकों और भारत में आयात या निर्माण होने वाले ऑटोमेशन टूल्स के बीच सामंजस्य बिठाना भी उतना ही आवश्यक है। बीआईएस ने अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) के तीन अत्यंत महत्वपूर्ण मानकों को भारतीय परिवहन व्यवस्था के अनुरूप ढालने पर काम किया है। इनमें सबसे प्रमुख ISO 34503 है, जो ऑटोमेटेड ड्राइविंग सिस्टम्स (ADS) यानी ड्राइवरलेस वाहनों के सुरक्षा परीक्षण और टेस्टिंग परिदृश्यों (Testing Scenarios) का वैश्विक पैमाना तय करता है। यह मानक तय करता है कि कोई भी सेल्फ-ड्राइविंग कार अचानक सड़क पर आने वाले पैदल यात्री, साइकिल चालक या मवेशियों के सामने किस तरह फैसला लेगी और उसका एल्गोरिदम कितनी जल्दी इमरजेंसी ब्रेक लगाएगा। इसके अलावा ISO 21217 मानक इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स के कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर को परिभाषित करता है, ताकि कारें सीधे सड़क किनारे लगे ट्रैफिक सिग्नलों, सर्विलांस कैमरों और अन्य गाड़ियों से डेटा साझा कर सकें। वहीं ISO 23354 मानक माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स फ्लो की एंड-टू-एंड विजिबिलिटी के लिए बिजनेस फ्रेमवर्क तैयार करता है, जिससे वेयरहाउस से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक माल ले जाने वाले स्वचालित ट्रकों की सटीक ट्रैकिंग संभव हो सकेगी।
भविष्य के इस स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की असली रीढ़ V2X यानी व्हीकल-टू-एवरीथिंग (Vehicle-to-Everything) कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी है। BIS द्वारा तय किए जा रहे मानकों के तहत अब भारतीय सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों को इस तरह तैयार किया जा रहा है कि वे सिर्फ अकेले चलने वाले साधन न रहकर एक जुड़े हुए डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा बनें। व्हीकल-टू-व्हीकल (V2V) तकनीक के तहत जब आगे चल रही किसी गाड़ी में अचानक ब्रेक लगेगा, तो उसके पीछे आ रही सभी गाड़ियों को मिलीसेकंड के भीतर चेतावनी संदेश मिल जाएगा, जिससे एक्सप्रेसवे पर धुंध या तेज रफ्तार के कारण होने वाली कई गाड़ियों की सामूहिक टक्कर पूरी तरह रुक सकेगी। इसी तरह व्हीकल-टू-इंफ्रास्ट्रक्चर (V2I) तकनीक से गाड़ियां रेड लाइट और ग्रीन लाइट के समय को पहले से भांपकर अपनी स्पीड को अपने-आप धीमा या तेज कर लेंगी, जिससे ईंधन और बैटरी की खपत में भारी कमी आएगी। इन मानकों के लागू होने से भारत का पूरा रोड नेटवर्क एक ‘जीवंत डिजिटल ग्रिड’ में तब्दील हो जाएगा जहां हर वाहन अपनी स्थिति, गति और दिशा के बारे में आसपास के माहौल को जागरूक रखेगा।
पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में ड्राइवरलेस और ऑटोनॉमस टेक्नोलॉजी को लागू करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण माना जाता है। विदेशों में लेन अनुशासन और सुव्यवस्थित ट्रैफिक नियम होते हैं, जबकि भारत में ऑटो-रिक्शा, ई-रिक्शा, दोपहिया वाहन, भारी ट्रक और पैदल यात्री एक ही सड़क पर साथ-साथ चलते हैं। इस वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए देश के प्रमुख शोध संस्थान जैसे आईआईटी हैदराबाद ने ‘टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब ऑन ऑटोनॉमस नेविगेशन’ (TiHAN) के तहत भारत का पहला डेडिकेटेड टेस्टबेड तैयार किया है, जहां जमीन और हवा दोनों में चलने वाले ऑटोनॉमस व्हीकल्स की वास्तविक भारतीय परिस्थितियों में टेस्टिंग की जा रही है। आईआईटी हैदराबाद के कैंपस में पहले से ही स्वदेशी तकनीक पर आधारित एआई पावर्ड ड्राइवरलेस बसें सफलतापूर्वक दौड़ रही हैं, जिन्होंने हजारों यात्रियों को सुरक्षित सफर कराया है। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) और इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी (ICAT) भी बीआईएस के इन मानकों के आधार पर देश में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) और ऑटोनॉमस ड्राइविंग फीचर्स की लैब और ऑन-रोड जांच को अंतिम रूप दे रहे हैं।
बीआईएस के इन मानकों के जमीन पर उतरते ही आम नागरिकों के दैनिक जीवन में व्यापक सुधार देखने को मिलेगा। पहला और सबसे सीधा फायदा सड़क सुरक्षा में होगा; चूंकि 80 प्रतिशत से अधिक सड़क हादसे इंसानी गलतियों, तेज गति, शराब पीकर गाड़ी चलाने या झपकी आने की वजह से होते हैं, ऐसे में ऑटोनॉमस इमरजेंसी ब्रेकिंग और लेन डिपार्चर वॉर्निंग जैसी तकनीकें जानमाल के नुकसान को न्यूनतम कर देंगी। दूसरा बड़ा बदलाव यात्रा के समय में कटौती के रूप में दिखेगा। स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल्स वास्तविक समय में जिस लेन में गाड़ियों की भीड़ अधिक होगी, वहां की ग्रीन लाइट की अवधि अपने-आप बढ़ा देंगे, जिससे चौराहों पर लंबा जाम नहीं लगेगा। इसके साथ ही, सार्वजनिक परिवहन में समय की पाबंदी बढ़ेगी और लोग मोबाइल ऐप पर अपनी बस या कैब का सटीक अराइवल समय सेकंडों में देख सकेंगे। देश के लॉजिस्टिक्स सेक्टर को भी इसका भारी लाभ मिलेगा, क्योंकि बंदरगाहों, हवाई अड्डों और वेयरहाउसों में सामान की लोडिंग-अनलोडिंग और लंबी दूरी के माल परिवहन में स्वचालित प्रणालियों का उपयोग होने से लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी के वैश्विक मानकों के करीब पहुंच जाएगी।
हालांकि यह तकनीक बेहद क्रांतिकारी और रोमांचक है, लेकिन इसके सामने कानूनी और साइबर सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां भी खड़ी हैं। यदि किसी ड्राइवरलेस गाड़ी से कोई दुर्घटना हो जाती है, तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी कार निर्माता पर होगी, सॉफ्टवेयर डेवलपर पर या गाड़ी के मालिक पर, इसे लेकर मोटर व्हीकल एक्ट में नए प्रावधानों पर मंथन चल रहा है। इसके साथ ही, कनेक्टेड कारों पर साइबर हमले या हैकिंग के खतरे से निपटने के लिए बीआईएस और ऑटोमोटिव इंडस्ट्री ने मजबूत डेटा एन्क्रिप्शन और साइबर सिक्योरिटी मैनेजमेंट सिस्टम (CSMS) के नियम तय किए हैं। आने वाले समय में जैसे-जैसे 5G और 6G नेटवर्क का विस्तार होगा, भारत का ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह स्मार्ट होता चला जाएगा। बीआईएस द्वारा तैयार किए गए ये ठोस मानक न केवल भारत को भविष्य की मोबिलिटी का वैश्विक लीडर बनाने की दिशा में मजबूत नींव रख रहे हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि भारतीय सड़कों पर हाई-टेक सफर पूरी तरह सुरक्षित, पर्यावरण के अनुकूल और आम आदमी की पहुंच के भीतर हो।
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