नोटबंदी के दौरान बैंक में 15 लाख कैश जमा करना पड़ा भारी

भारतीय वित्तीय गलियारों में साल 2016 की ऐतिहासिक नोटबंदी के दौरान बैंक खातों में भारी मात्रा में नकदी जमा करने वाले लोगों की मुश्किलें अभी भी पूरी तरह कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। हाल ही में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण यानी ITAT के एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़े फैसले ने उन तमाम टैक्सपेयर्स की नींद उड़ा दी है जिन्होंने उस दौरान अपनी अघोषित आय को बैंक के खातों में खपाने की कोशिश की थी। यह पूरा मामला एक ऐसे करदाता से जुड़ा है जिसने नोटबंदी के दौर में अचानक अपने बैंक खाते में 15 लाख रुपये नकद जमा करवा दिए थे, जिसके बाद आयकर विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए भारी-भरकम टैक्स और पेनल्टी का नोटिस थमा दिया था। इस मामले की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जब यह केस ITAT की बेंच के सामने पहुंचा, तो ट्रिब्यूनल ने करदाता को कोई राहत देने से साफ इनकार करते हुए विभाग के फैसले पर मुहर लगा दी। इस सनसनीखेज अदालती फैसले ने देश भर के उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी कर दी है जो सोचते हैं कि बैंकिंग प्रणाली में कैश जमा करने के बाद वे जांच एजेंसियों की नजरों से हमेशा के लिए बच निकलेंगे।

क्या था 15 लाख रुपये कैश जमा करने का पूरा मामला और क्यों रडार पर आए टैक्सपेयर

साल 2016 के नवंबर महीने में जब सरकार ने अचानक 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने का ऐतिहासिक और चौंकाने वाला फैसला लिया था, तब पूरे देश में अफरा-तफरी का माहौल बन गया था। सरकार ने नागरिकों को अपने पुराने नोट बैंक खातों में जमा कराने के लिए एक निश्चित समय सीमा दी थी, जिसके तहत काले धन को सफेद करने वालों पर लगाम कसने के लिए आयकर विभाग और वित्तीय खुफिया इकाइयों (FIU) को पूरी तरह मुस्तैद कर दिया गया था। इसी अफरा-तफरी के दौर में संबंधित करदाता ने अपने बैंक खाते में कुल 15 लाख रुपये की मोटी नकदी अचानक लाकर जमा करवा दी। सामान्य दिनों में इस तरह की नगदी जमा पर शायद बैंक की तरफ से तुरंत कोई सवाल न उठता, लेकिन नोटबंदी के उस विशेष और संवेदनशील कालखंड में हर एक बैंक खाते के ट्रांजैक्शन पर सरकार की पैनी नजर टिकी हुई थी। जब आयकर विभाग के डेटा एनालिटिक्स सॉफ्टवेयर ने इस असामान्य रूप से बड़े कैश डिपॉजिट को स्कैन किया, तो यह मामला सीधे तौर पर संदिग्ध आय की श्रेणी में आ गया और जांच का दायरा तेजी से आगे बढ़ने लगा।

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की सख्त जांच और नोटिस की कार्रवाई

जब आयकर विभाग ने इस मामले की प्राथमिक जांच शुरू की, तो करदाता से इस 15 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि के स्रोत यानी सोर्स ऑफ इनकम के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया। विभाग का नियम बिल्कुल स्पष्ट था कि नोटबंदी के दौरान जमा की गई हर एक पाई का हिसाब देना अनिवार्य था और यदि कोई व्यक्ति अपनी आय के वैध स्रोत को साबित नहीं कर पाता है, तो उसे भारी टैक्स और जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। जांच के दौरान करदाता विभाग को इस बात का कोई भी संतोषजनक और ठोस प्रमाण या दस्तावेज नहीं सौंप पाया कि यह नकदी उसकी वैध कमाई का हिस्सा थी या उसने इस पर पहले से ही सही टैक्स चुकाया हुआ था। इस असंतोषजनक जवाब से संतुष्ट न होकर इनकम टैक्स ऑफिसर ने इस पूरी 15 लाख की राशि को अज्ञात आय या बेहिसाब धन मानते हुए उस पर भारी-भरकम टैक्स और पेनल्टी असेसमेंट ऑर्डर पास कर दिया और करदाता को आधिकारिक रूप से डिमांड नोटिस थमा दिया। इस कार्रवाई के बाद से ही करदाता के कानूनी संघर्ष का लंबा दौर शुरू हो गया।

ITAT (आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण) का ऐतिहासिक और कड़ा फैसला

आयकर विभाग के इस नोटिस और टैक्स डिमांड से राहत पाने के लिए करदाता ने उच्च स्तर पर अपील करते हुए आईटीएटी (ITAT) का दरवाजा खटखटाया। करदाता को पूरी उम्मीद थी कि शायद अपीलीय स्तर पर उसे कुछ रियायत मिल जाएगी, लेकिन ट्रिब्यूनल की बेंच ने इस मामले के सभी दस्तावेजों और तथ्यों की बेहद बारीकी से समीक्षा करने के बाद जो फैसला सुनाया, उसने सभी को चौंका दिया। ITAT ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि नोटबंदी का वह दौर देश की वित्तीय व्यवस्था के इतिहास का एक बेहद संवेदनशील और असाधारण समय था, और उस दौरान बैंक खातों में अचानक इस तरह भारी मात्रा में कैश जमा करना अपने आप में एक संदिग्ध गतिविधि है। ट्रिब्यूनल ने यह भी टिप्पणी की कि केवल मौखिक रूप से यह कह देना कि यह पैसा पुरानी बचतों या व्यापारिक लेन-देन का है, कानून की नजर में पर्याप्त सबूत नहीं माना जा सकता जब तक कि उसके समर्थन में पुख्ता खाता बही, बिल या बैंक स्टेटमेंट पेश न किए जाएं। इस प्रकार, ITAT ने करदाता की अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के उस फैसले को सही ठहराया जिसके तहत 15 लाख रुपये पर टैक्स और पेनल्टी लगाई गई थी।

भविष्य के लिए सबक और करदाताओं को सख्त संदेश

यह पूरा कानूनी प्रकरण देश के तमाम उन लोगों के लिए एक बहुत बड़ा सबक और आईना है जो अभी भी टैक्स चोरी या अघोषित आय को छुपाने के शॉर्टकट तलाशने की कोशिश करते हैं। आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा माइनिंग के इस दौर में अब किसी भी नागरिक के लिए बैंक खातों में किए जाने वाले बड़े वित्तीय लेनदेन को छुपाना असंभव होता जा रहा है। सरकार और कर विभाग लगातार अपनी निगरानी प्रणालियों को और अधिक उन्नत बना रहे हैं ताकि वित्तीय अनुशासन को पूरी सख्ती से लागू किया जा सके। इस फैसले के बाद टैक्स एक्सपर्ट्स की भी यही सलाह है कि हर नागरिक को अपनी आय का पूरा और सच्चा हिसाब रखना चाहिए तथा किसी भी संदिग्ध या बेहिसाब नकदी को बैंक में जमा करने से बचना चाहिए, अन्यथा उन्हें भी इस तरह के महंगे कानूनी पचड़ों और भारी पेनल्टी का सामना करना पड़ सकता है।