
वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन की बाधाओं और आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश की आर्थिक सेहत पर एक अहम संबोधन में स्पष्ट किया है कि भारत ने पिछले चार वर्षों के दौरान दुनिया भर में आए बड़े आर्थिक झटकों को न केवल सफलतापूर्वक झेला है, बल्कि अपनी बुनियादी वित्तीय ताकत को भी पूरी तरह सुरक्षित रखा है। वित्त मंत्री ने कहा कि भारत की वृहद आर्थिक बुनियाद (Macroeconomic Fundamentals) इतनी सुदृढ़ है कि देश विपरीत परिस्थितियों में भी नीतियां बनाने और जरूरी वित्तीय कदम उठाने में पूरी तरह सक्षम रहा है।
वित्त मंत्री ने अपने संबोधन में देश की आर्थिक वृद्धि दर के ताजा आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत ने 7.8 फीसदी की शानदार जीडीपी ग्रोथ दर्ज की है। यह आंकड़ा दुनिया की सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज विकास दर का प्रतिनिधित्व करता है।
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घरेलू मांग का सहारा: वैश्विक मंदी के माहौल में भारत की यह वृद्धि मुख्य रूप से मजबूत घरेलू मांग, निजी उपभोग और सर्विस सेक्टर के असाधारण विस्तार पर टिकी हुई है।
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रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार: उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) $766 बिलियन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है, जो बाहरी वित्तीय जोखिमों और मुद्रा के उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए एक मजबूत ढाल प्रदान करता है।
सरकार के आगे के आर्थिक रोडमैप में सबसे बड़ा आधार पूंजीगत व्यय यानी कैपेक्स (Capital Expenditure) है। वित्त मंत्री ने दोहराया कि बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं के लिए ₹12.22 लाख करोड़ का भारी-भरकम पूंजीगत व्यय आवंटित किया गया है।
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जीडीपी का 3.1% हिस्सा: यह प्रत्यक्ष कैपेक्स देश की जीडीपी का लगभग 3.1 फीसदी है। यदि राज्यों को दी जाने वाली पूंजीगत परिसंपत्ति अनुदान सहायता को जोड़ दिया जाए, तो प्रभावी कैपेक्स बढ़कर 4.4 फीसदी तक पहुंच जाता है।
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मल्टीप्लायर इफेक्ट: वित्त मंत्री के अनुसार, सार्वजनिक पूंजीगत निवेश केवल सड़कें या रेलवे ट्रैक बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीमेंट, स्टील, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण जैसे प्रमुख उद्योगों में नई मांग पैदा करता है। इससे अर्थव्यवस्था में ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ देखने को मिलता है, जो रोजगार के लाखों नए अवसर सृजित करता है।
वित्त मंत्री ने देश के वित्तीय क्षेत्र और बैंकिंग प्रणाली में आए ऐतिहासिक सुधारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने रेखांकित किया कि सरकारी और निजी बैंकों की बैलेंस शीट आज पहले से कहीं अधिक मजबूत, पारदर्शी और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के न्यूनतम स्तर पर है।
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क्रेडिट ग्रोथ में रिकॉर्ड उछाल: बैंकिंग सुधारों का असर यह रहा कि नॉन-फूड बैंक क्रेडिट में 18.8 फीसदी की जबर्दस्त वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह साबित करती है कि उद्योग और एमएसएमई सेक्टर नई परियोजनाओं के लिए खुलकर कर्ज ले रहे हैं।
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पीएम मुद्रा योजना का प्रभाव: जमीनी स्तर पर स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत अब तक 52 करोड़ से अधिक गारंटी-मुक्त (Collateral-free) लोन स्वीकृत किए जा चुके हैं। इससे छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में वित्तीय समावेशन को अभूतपूर्व बढ़ावा मिला है।
भविष्य की रणनीति साझा करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने निजी क्षेत्र से आह्वान किया कि वे भी सार्वजनिक कैपेक्स के साथ कदम से कदम मिलाकर अपने निवेश में तेजी लाएं।
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निजी क्षेत्र की भागीदारी: उन्होंने कहा कि सरकार ने अनुकूल नीतियां, आकर्षक टैक्स ढांचा और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाएं देकर रास्ता साफ कर दिया है; अब कॉरपोरेट सेक्टर को क्षमता विस्तार के लिए बड़े निवेश करने होंगे।
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रणनीतिक संसाधन सुरक्षा: ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए रणनीतिक संसाधन सुरक्षा (Strategic Resource Security) पर विशेष बल दिया जा रहा है।
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इनोवेशन और टेक्नोलॉजी: वित्त मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि अगर भारत तकनीकी नवाचार और विनिर्माण पर लगातार ध्यान केंद्रित रखता है, तो मध्यम अवधि में 8 से 10 फीसदी की सतत विकास दर को छूना पूरी तरह संभव है।
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