
भारतीय सिनेमा के गलियारों में जब भी कभी मनोरंजन के साथ-साथ समाज को झकझोरने वाले किसी गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर फिल्म बनाई जाती है, तो दर्शक हमेशा सिनेमाघरों की ओर खिंचे चले आते हैं। इन दिनों बॉलीवुड की दुनिया में एक ऐसी ही बेहद साहसिक, विचारोत्तेजक और सामयिक फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जिसने रिलीज होते ही समीक्षकों और आम दर्शकों का दिल जीत लिया है। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल सतही मनोरंजन परोसने के बजाय हमारे समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक मानसिकता यानी मर्दवादी सोच पर सीधे तौर पर कड़ा प्रहार करती है। फिल्म के मुख्य पटल पर आधुनिक दौर की चुनौतियों, महिलाओं की सुरक्षा, उनकी स्वतंत्रता और मानसिक संघर्ष को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पिरोया गया है। जाने-माने कलाकारों के अभिनय से सजी इस मूवी ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी एक अलग ही धाक जमा ली है। आज के इस विस्तृत और गहन मूवी रिव्यू में हम आपको ‘पूजा मेरी जान’ की कहानी, इसके निर्देशन, कलाकारों के दमदार अभिनय और समाज को देने वाले संदेश के बारे में पूरी जानकारी देने जा रहे हैं, ताकि आप यह समझ सकें कि क्यों यह फिल्म इस वक्त हर दर्शक के लिए देखना अनिवार्य हो गया है।
फिल्म की कहानी का ताना-बाना और समाज की कड़वी सच्चाई
‘पूजा मेरी जान’ की पटकथा एक ऐसी कहानी के इर्द-गिर्द घूमती है जो देश के हर एक शहर, हर एक मोहल्ले और आधुनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रोजाना घटित होने वाली घटनाओं की बानोई तस्वीर पेश करती है। फिल्म की कहानी एक ऐसी युवा महिला के संघर्ष को बयां करती है जिसे अनचाहे कॉल्स, धमकियों और डिजिटल उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, और कैसे यह मानसिक प्रताड़ना उसके पूरे जीवन को हिलाकर रख देती है। निर्देशक ने बहुत ही करीने से यह दिखाने की कोशिश की है कि जब एक सामान्य लड़की को समाज के इन अवांछित तत्वों और पितृसत्तात्मक सोच का सामना करना पड़ता है, तो उसके परिवार और उसके अपने आत्मसम्मान पर क्या बीतती है। कहानी सिर्फ एक पीड़ित महिला तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम और सामाजिक ताने-बाने पर सवाल खड़े करती है जो अक्सर ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज कर देता है या फिर पीड़ित की गलती मानकर चुप्पी साध लेता है। फिल्म का हर एक सीन दर्शकों के भीतर एक गहरी सोच पैदा करता है और उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या हम वाकई एक सुरक्षित और सभ्य समाज में रहने का दावा कर सकते हैं।
मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी का दमदार अभिनय और बेजोड़ स्क्रीन प्रेजेंस
किसी भी सामाजिक मुद्दे पर आधारित फिल्म की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पर्दे पर काम करने वाले कलाकार उस किरदार को कितनी प्रामाणिकता और गहराई के साथ जीते हैं। ‘पूजा मेरी जान’ में मुख्य भूमिकाओं में नजर आ रही मृणाल ठाकुर (Mrunal Thakur) और हुमा कुरैशी (Huma Qureshi) ने अपने अभिनय से इस फिल्म को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। मृणाल ठाकुर ने अपने किरदार के जरिए एक आम लड़की के भीतर के डर, उसके संघर्ष और आखिरकार अन्याय के खिलाफ खड़े होने के साहस को जिस खूबी से पर्दे पर उतारा है, वह तारीफ के काबिल है। वहीं, हुमा कुरैशी ने अपने सशक्त और परिपक्व अभिनय से यह साबित कर दिया है कि वे किसी भी चुनौतीपूर्ण भूमिका को कितनी सहजता से निभा सकती हैं। दोनों ही अभिनेत्रियों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री और उनका संवाद अदायगी का अंदाज दर्शकों को पूरी फिल्म के दौरान अपनी सीट से बांधे रखता है। उनके अलावा फिल्म के अन्य सहायक कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं में पूरी ईमानदारी दिखाई है, जिससे पूरी कहानी बेहद जीवंत और वास्तविक प्रतीत होती है।
पितृसत्तात्मक और मर्दवादी सोच पर करारा प्रहार करती है यह फिल्म
इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका वह वैचारिक संदेश है जो यह समाज की पुरुष-प्रधान या यूं कहें कि विकृत मर्दवादी सोच को आईना दिखाता है। आज भी हमारे समाज में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके पहनावे, उनके कार्यक्षेत्र और उनकी स्वतंत्र आवाज़ को दबाने के लिए अपनी संकीर्ण मानसिकता का सहारा लेता है। ‘पूजा मेरी जान’ बहुत ही बेबाकी से यह दिखाती है कि कैसे यह सोच न केवल अपराधों को जन्म देती है, बल्कि महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह प्रभावित करती है। फिल्म यह संदेश देने में पूरी तरह सफल रही है कि महिलाओं को कमजोर या केवल उपभोग की वस्तु समझने वाली इस घटिया मानसिकता को बदलने की सख्त जरूरत है। जब तक समाज के पुरुष वर्ग अपनी सोच में बदलाव नहीं लाएंगे और महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव पैदा नहीं करेंगे, तब तक देश में पूर्ण समानता और सुरक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। फिल्म के संवाद (Dialogues) इतने तीखे और प्रभावशाली हैं कि वे सीधे दर्शकों के दिल पर जाकर लगते हैं और सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद भी लंबे समय तक याद रहते हैं।
निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी और संगीत का बेहतरीन तालमेल
एक अच्छी कहानी को पर्दे पर जीवंत करने के लिए एक कुशल निर्देशक और तकनीकी टीम की उतनी ही जरूरत होती है जितनी मजबूत पटकथा की। ‘पूजा मेरी जान’ के निर्देशक ने जिस संयम और संवेदनशीलता के साथ इस संवेदनशील विषय को संभाला है, वह सराहनीय है। फिल्म में किसी भी जगह अति-नाटकीयता (Melodrama) का सहारा नहीं लिया गया है, बल्कि हर दृश्य को उतनी ही वास्तविकता के साथ परोसा गया है जितनी की उसकी मांग थी। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कहानी के मूड और उसके तनावपूर्ण माहौल के साथ पूरी तरह न्याय करती है, और इसका बैकग्राउंड स्कोर तथा संगीत दर्शकों को कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ भावनात्मक रूप से जोड़े रखता है। साफ नीयत से बनाई गई यह फिल्म यह साबित करती है कि यदि कला का उपयोग समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए किया जाए, तो उसका प्रभाव कितना दूरगामी होता है। यदि आप भी एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ आपको सोचने पर मजबूर कर दे और समाज को एक मजबूत संदेश दे, तो ‘पूजा मेरी जान’ आपके लिए इस हफ्ते सिनेमाघरों में देखने लायक एक बेहतरीन और मस्ट-वाच फिल्म है।
girls globe