फर्जी CBI अफसर और जज बनकर ₹7 करोड़ की ठगी: नेपाल से वियतनाम तक फैले डिजिटल अरेस्ट सिंडिकेट का मास्टरमाइंड कोलकाता से गिरफ्तार

साइबर अपराध की दुनिया से एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अंतरराष्ट्रीय मामला सामने आया है, जहां खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का वरिष्ठ अधिकारी और अदालत का जज बताकर मासूम नागरिकों से ₹7 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम रकम ऐंठ ली गई। इस हाई-प्रोफाइल संगठित अपराध के तार केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि नेपाल, वियतनाम और कंबोडिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक फैले हुए हैं। जांच एजेंसियों और साइबर क्राइम पुलिस ने एक सटीक और गुप्त ऑपरेशन के तहत इस पूरे सिंडिकेट के मुख्य सरगना को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से रंगे हाथों धर दबोचा है।

आरोपी लंबे समय से पहचान छिपाकर अलग-अलग राज्यों के लोगों को अपना शिकार बना रहा था। गिरफ्तारी के वक्त आरोपी के पास से कई फर्जी पहचान पत्र, मोबाइल फोन, अंतरराष्ट्रीय सिम कार्ड, दर्जनों म्यूल बैंक खातों की पासबुक और चेकबुक के साथ महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य जब्त किए गए हैं, जो सीमा पार बैठे वित्तीय माफियाओं से उसके सीधे जुड़ाव की पुष्टि करते हैं।

इस गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद शातिर, संगठित और तकनीकी रूप से परिष्कृत थी। ठग सीधे आम लोगों को निशाना नहीं बनाते थे, बल्कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों, बुजुर्गों, डॉक्टरों और व्यापारियों का डेटाबेस तैयार कर पूरी योजना के साथ जाल बिछाते थे।

  • कूरियर और मनी लॉन्ड्रिंग का बहाना: सबसे पहले पीड़ित को फोन कॉल आती थी कि उनके नाम से भेजे गए एक अंतरराष्ट्रीय पार्सल में अवैध ड्रग्स, पासपोर्ट और जाली दस्तावेज पकड़े गए हैं।

  • नकली पुलिस स्टेशन और सीबीआई सेटअप: इसके तुरंत बाद पीड़ित को वीडियो कॉल से जोड़ा जाता था, जिसके बैकग्राउंड में सीबीआई का आधिकारिक लोगो, राष्ट्रीय प्रतीक, पुलिस वायरलेस की आवाजें और खाकी वर्दी में बैठे फर्जी अफसर दिखाई देते थे।

  • फर्जी जज की ऑनलाइन पेशी: डर को चरम पर पहुंचाने के लिए कॉल को एक तथाकथित ‘जज’ की वर्चुअल कोर्ट में ट्रांसफर किया जाता था, जहां जज के वेश में बैठा ठग पीड़ित को तुरंत जेल भेजने और संपत्ति कुर्क करने का फर्जी वारंट दिखाता था।

  • सुरक्षित खाते के नाम पर लूट: गिरफ्तारी से बचने और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा क्लीयरेंस’ के बहाने पीड़ित को अपनी सारी जमा-पूंजी एक कथित सरकारी आरबीआई सुरक्षित एस्क्रो खाते में ट्रांसफर करने को विवश किया जाता था।

जांच में सामने आया कि ठगी गई ₹7 करोड़ की रकम को भारत के विभिन्न हिस्सों में खोले गए दर्जनों फर्जी और किराये के (Mule) बैंक खातों में टुकड़ों में जमा करवाया जाता था। जैसे ही पैसा खातों में आता, तकनीकी एल्गोरिदम और स्थानीय एजेंटों की मदद से उसे मिनटों के भीतर निकाल लिया जाता था।

इस गिरोह के वित्तीय तार सीधे तौर पर नेपाल और वियतनाम से जुड़े मिले हैं। भारत से उड़ाई गई रकम को पहले नेपाल के रास्ते हवाला चैनलों में भेजा जाता था और फिर वहां से वियतनाम और थाईलैंड में बैठे चीनी सिंडिकेट के कंट्रोलर्स को क्रिप्टोकरेंसी (USDT) के रूप में ट्रांसफर कर दिया जाता था। कोलकाता से गिरफ्तार हुआ मास्टरमाइंड भारत में म्यूल अकाउंट्स का बंदोबस्त करने, सिम कार्ड उपलब्ध कराने और कमीशन काटकर फंड को विदेशी हैंडलर्स तक पहुंचाने की मुख्य धुरी था।

चाहे आप लखनऊ, कानपुर, दिल्ली, जयपुर, कोलकाता या मुंबई में हों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि भारत की कानून व्यवस्था में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम का कोई कानूनी प्रावधान मौजूद ही नहीं है।

  • कोई एजेंसी वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करती: सीबीआई, ईडी (ED), कस्टम्स, एनआईए या राज्य पुलिस कभी भी व्हाट्सएप या स्काइप वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही बयान दर्ज करती है।

  • सरकारी एस्क्रो खाता पूरी तरह फर्जी है: कोई भी जांच एजेंसी या अदालत कभी भी सत्यापन के नाम पर नागरिकों से अपने निजी या सरकारी खातों में पैसे ट्रांसफर करने की मांग नहीं करती।

  • तत्काल 1930 पर करें रिपोर्ट: यदि किसी के पास ऐसी कोई धमकी भरी कॉल आती है, तो घबराने या कॉल पर बने रहने के बजाय तुरंत फोन काटें और गृह मंत्रालय के साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 या आधिकारिक पोर्टल (cybercrime.gov.in) पर तुरंत शिकायत दर्ज कराएं।