
भारतीय कमर्शियल रियल एस्टेट बाजार में एक समय वह था जब शॉपिंग मॉल के डेवलपर्स दुकानें बनाकर सीधे व्यक्तिगत निवेशकों या दुकानदारों को बेच दिया करते थे। इसे रियल एस्टेट की भाषा में ‘स्ट्रैटा सेल’ (Strata Sale) कहा जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में इस मॉडल के गंभीर नुकसान सामने आए। अलग-अलग दुकानों के अलग-अलग मालिक होने की वजह से मॉल्स में टेनेंट मिक्स (Tenant Mix) बिगड़ गया, मेंटेनेंस की समस्याएं खड़ी हुईं और बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स ने ऐसे मॉल्स से दूरी बना ली। परिणामस्वरूप, देश के दर्जनों मॉल्स ‘घोस्ट मॉल’ (Ghost Malls) में तब्दील हो गए।
इस विफलता से सबक लेते हुए अब भारतीय रिटेल रियल एस्टेट सेक्टर में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। आज डीएलएफ, फीनिक्स मिल्स, प्रेस्टीज और नेक्सस जैसे देश के शीर्ष मॉल डेवलपर्स दुकानें बेचने के बजाय उन्हें पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखकर ‘रेवेन्यू शेयरिंग कम लीज मॉडल’ (Revenue Sharing cum Lease Model) पर काम कर रहे हैं। यह नया बिजनेस मॉडल न केवल मॉल्स को आबाद रख रहा है, बल्कि पारंपरिक निश्चित किराए की तुलना में संपत्ति मालिकों और निवेशकों को 40 से 50 फीसदी अधिक रेंटल रिटर्न (Rental Yield) भी दिला रहा है।
पारंपरिक मॉडल में किसी दुकान को एक तय मासिक किराए पर दे दिया जाता था, जिसका ब्रांड की वास्तविक बिक्री से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता था। वहीं, आधुनिक रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल मूल रूप से साझेदारी के सिद्धांत पर काम करता है। इसमें मॉल डेवलपर और रिटेल ब्रांड के बीच दो घटकों का समझौता होता है:
-
मिनिमम गारंटी (MG – Minimum Guarantee): यह एक आधारभूत तय किराया होता है, जिसे ब्रांड को हर महीने देना ही होता है, भले ही उसकी बिक्री कम हो। यह डेवलपर या इनवेस्टर की डाउनसाइड रिस्क (नुकसान का जोखिम) को पूरी तरह सुरक्षित करता है।
-
रेवेन्यू शेयर (टर्नओवर का प्रतिशत): जब स्टोर की कुल मासिक बिक्री एक निश्चित सीमा से ऊपर निकल जाती है, तो ब्रांड अपनी कुल बिक्री का एक तय हिस्सा (आमतौर पर 7% से 15% तक) डेवलपर के साथ साझा करता है।
समझौते में यह स्पष्ट शर्त होती है कि “मिनिमम गारंटी या रेवेन्यू शेयर, जो भी अधिक हो” (Whichever is higher), उसका भुगतान किया जाएगा। इसका सीधा लाभ यह होता है कि जब त्योहारी सीजन, वीकेंड्स या सेल के दौरान स्टोर पर ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ती है और बिक्री कई गुना बढ़ जाती है, तो संपत्ति मालिक का किराया अपने-आप 40% से 50% तक बढ़ जाता है।
| मानक | स्ट्रैटा सेल मॉडल (दुकान बेचना) | शुद्ध फिक्स्ड रेंटल मॉडल | रेवेन्यू शेयरिंग + MG मॉडल |
| मॉल का नियंत्रण | बिखर जाता है (अनेक मालिक) | डेवलपर के पास | पूरी तरह डेवलपर / ऑपरेटर के पास |
| वार्षिक रेंटल यील्ड | 4% – 6% (अनिश्चित) | 6% – 8% (स्थिर) | 9% – 13%+ (सकल रिटर्न) |
| ब्रांड्स की पसंद | बड़े ब्रांड्स प्रवेश नहीं करते | मध्यम स्वीकार्यता | एंकर और इंटरनेशनल ब्रांड्स की पहली पसंद |
| फुटफॉल और मेंटेनेंस | समय के साथ खराब | सामान्य | विश्वस्तरीय प्रबंधन और निरंतर मार्केटिंग |
| महंगाई और सेल से लाभ | शून्य | केवल वार्षिक एस्केलेशन (3-5%) | बिक्री बढ़ते ही तत्काल 30-50% तक अतिरिक्त किराया |
यह मॉडल खुदरा विक्रेताओं (Zara, H&M, Starbucks, Reliance Retail, Tanishq आदि) और मॉल ऑपरेटरों दोनों के लिए एक संतुलित साझेदारी तैयार करता है:
-
ब्रांड्स के लिए वित्तीय लचीलापन: यदि बाजार में मंदी हो या किसी महीने फुटफॉल कम रहे, तो ब्रांड को भारी-भरकम अवास्तविक किराया नहीं भरना पड़ता। उनकी रेंटल लागत सीधे उनके बिजनेस वॉल्यूम के अनुपात में रहती है।
-
डेवलपर की सक्रिय भागीदारी: जब डेवलपर की कमाई स्टोर की बिक्री पर निर्भर होती है, तो मॉल प्रबंधन केवल किराया वसूलने तक सीमित नहीं रहता। वे मॉल में ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को खींचने के लिए लाइव इवेंट्स, फेस्टिव डेकोरेशन, मुफ्त पार्किंग डिस्काउंट और व्यापक विज्ञापन अभियान चलाते हैं।
-
बेहतर क्युरेशन और जोनिंग: डेवलपर यह तय कर पाता है कि ग्राउंड फ्लोर पर लग्जरी फैशन रहेगा, पहली मंजिल पर एथनिक वियर, टॉप फ्लोर पर मल्टीप्लेक्स और फूड कोर्ट रहेगा। इस व्यवस्थित जोनिंग से मॉल का हर कोना जीवंत बना रहता है।
पहले जहां कमर्शियल मॉल में निवेश करने के लिए ₹5 करोड़ से ₹50 करोड़ की भारी पूंजी की जरूरत होती थी, वहीं अब छोटे और खुदरा निवेशक भी इस उच्च-यील्ड वाले मॉडल का हिस्सा बन रहे हैं:
-
रिटेल आरईआईटी (Retail REITs): नेक्सस सेलेक्ट ट्रस्ट जैसे रिटेल आरईआईटी के जरिए आम निवेशक मात्र ₹300 से ₹500 के छोटे निवेश से देश के बेहतरीन ग्रेड-ए मॉल्स की यूनिट्स खरीद सकते हैं। इन मॉल्स से मिलने वाला बढ़ा हुआ रेवेन्यू शेयर हर तिमाही सीधे डिविडेंड के रूप में निवेशकों के खाते में आता है।
-
फ्रैक्शनल ओनरशिप (SM REITs): सेबी (SEBI) द्वारा विनियमित नए स्मॉल एंड मीडियम आरईआईटी फ्रेमवर्क के तहत अब ₹10 लाख से ₹25 लाख के बजट वाले निवेशक भी प्रीमियम कमर्शियल एसेट्स में सीधे हिस्सेदारी ले सकते हैं और 9% से 11% का शुद्ध वार्षिक रिटर्न कमा रहे हैं।
कमर्शियल स्पेस को केवल ‘ईंट-गारे’ की तरह बेचने का युग अब समाप्त हो चुका है। रिटेल रियल एस्टेट अब एक शुद्ध वित्तीय सेवा और पार्टनरशिप बिजनेस बन चुका है, जहां ग्राहक का बढ़ता खर्च सीधे निवेशक की जेब में अतिरिक्त मुनाफे के रूप में पहुंच रहा है।
girls globe