
भारतीय वित्तीय तकनीक (फिनटेक) परिदृश्य में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने एक बार फिर ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है जिसने वैश्विक भुगतान प्रणालियों को अचंभे में डाल दिया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा जारी सितंबर महीने के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, यूपीआई के जरिए होने वाले कुल लेन-देन का मूल्य सालाना आधार पर 23 प्रतिशत से अधिक की भारी वृद्धि दर्ज करते हुए ₹29.37 लाख करोड़ के ऐतिहासिक स्तर को पार कर गया है। यह आंकड़ा न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था के तेज गति से डिजिटलीकरण का स्पष्ट संकेत है, बल्कि यह भी साबित करता है कि आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी में यूपीआई अब नकदी का सबसे बड़ा और निर्विवाद विकल्प बन चुका है।
सितंबर के महीने में दर्ज हुई इस रिकॉर्ड उछाल के पीछे प्रमुख कारण तिमाही के अंत में होने वाली कॉर्पोरेट सेटलमेंट्स, त्योहारी सीजन की अग्रिम खरीदारी और स्थानीय बाजारों में सूक्ष्म लेन-देन (माइक्रो-ट्रांजैक्शंस) का तेजी से बढ़ना रहा। गणेश उत्सव, ओणम और नवरात्र की पूर्व संध्या पर खुदरा दुकानों, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स, किराना स्टोर और यात्रा बुकिंग्स में यूपीआई को प्राथमिकता दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रति व्यक्ति मासिक लेन-देन की संख्या में हो रही लगातार वृद्धि यह दर्शाती है कि भारतीय उपभोक्ता अब जेब में नकद रखने की झंझट से पूरी तरह मुक्त होना चाहते हैं।
सितंबर महीने के मध्य में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ समूहों और तकनीकी आलोचकों द्वारा ‘No UPI Day’ यानी एक दिन के लिए यूपीआई का पूर्ण बहिष्कार करने की मुहिम छेड़ी गई थी। इस अभियान के पीछे मुख्य रूप से हाल ही में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से जुड़े भ्रामक संदेश, सर्वर में कभी-कभार आने वाली तकनीकी खराबी और निजता व सुरक्षा से जुड़ी कुछ चिंताएं थीं। अभियान चलाने वालों का दावा था कि यदि आम जनता एक दिन के लिए यूपीआई का इस्तेमाल बंद कर केवल नकदी (Cash) से भुगतान करेगी, तो इससे डिजिटल पेमेंट कंपनियों और बैंकों पर दबाव बनेगा।
हालांकि, जब आंकड़े सामने आए तो यह साफ हो गया कि यह तथाकथित बहिष्कार जमीनी हकीकत से कोसों दूर था और पूरी तरह से फ्लॉप साबित हुआ। जनता ने सोशल मीडिया के इस अभियान को सिरे से नकार दिया। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह रही कि आज यूपीआई सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि देश के करोड़ों नागरिकों की दैनिक जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुबह की चाय और दूध की थैली से लेकर ऑटो रिक्शा के भाड़े और रात के खाने के बिल तक, लोग अब नकदी पर निर्भर ही नहीं हैं। जब उपभोक्ताओं को अपनी जेब में कैश ढूंढ़ने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर दो सेकंड में भुगतान करने की सहूलियत की आदत लग चुकी है, तो महज सोशल मीडिया के किसी हैशटैग के चलते वे एटीएम की लंबी कतारों में खड़ा होने को तैयार नहीं हुए।
लोकल स्तर पर देखें तो इस बहिष्कार के पूरी तरह बेअसर होने की दूसरी सबसे बड़ी वजह छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों की प्रतिक्रिया रही। भारत के टियर-2, टियर-3 शहरों और ग्रामीण कस्बों के लाखों छोटे व्यापारियों ने साफ कर दिया कि यूपीआई उनके कारोबार की रीढ़ बन चुका है। छुट्टे पैसों की चिकचिक से मुक्ति, सीधे बैंक खाते में सुरक्षित पैसा जमा होना और बिना किसी लागत के वित्तीय ट्रैक रिकॉर्ड तैयार होने से व्यापारियों को बैंकों से छोटे व्यापारिक लोन मिलने में आसानी हो रही है।
इसके अतिरिक्त, बैंक ऑफ बड़ौदा और भारतीय स्टेट बैंक (SBI) जैसे अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा यह स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद कि आम नागरिकों और ₹2,000 तक के सामान्य लेन-देन पर कोई एमडीआर चार्ज नहीं लगेगा, जनता के बीच फैली तमाम भ्रांतियां और आशंकाएं पूरी तरह से दूर हो गईं। ग्राहकों को यह भरोसा हो गया कि सरकार और नियामक संस्थाएं आम यूजर पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने नहीं जा रही हैं।
सितंबर के इन अविश्वसनीय आंकड़ों ने एक और महत्वपूर्ण बात साबित की है कि भारतीय बैंकिंग और फिनटेक का तकनीकी ढांचा अब अभूतपूर्व लोड संभालने में पूरी तरह सक्षम हो चुका है। यूपीआई लाइट (UPI Lite) की बढ़ती लोकप्रियता ने बैंकों के मुख्य सर्वरों पर लोड को बहुत कम कर दिया है, जिससे विफल होने वाले लेन-देन (Failed Transactions) की दर घटकर न्यूनतम स्तर पर आ गई है। उपभोक्ता बिना किसी पिन या नेटवर्क विलंब के छोटे भुगतान तुरंत निपटा रहे हैं।
इसके साथ ही, रुपे क्रेडिट कार्ड का यूपीआई लिंकेज और देश भर के सभी टोल प्लाजा, मेट्रो स्टेशनों और नगर पालिका शुल्कों में यूपीआई की अनिवार्य उपलब्धता ने इसे सर्वव्यापी बना दिया है। वैश्विक स्तर पर भी भारत के यूपीआई नेटवर्क का तेजी से विस्तार हो रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले त्योहारी महीनों (अक्टूबर और नवंबर) में धनतेरस और दीपावली की भारी खरीदारी के चलते लेन-देन का मासिक आंकड़ा ₹30 लाख करोड़ के स्तर को भी पार कर नया वैश्विक बेंचमार्क बना सकता है। ‘नो यूपीआई डे’ जैसे अभियान यह साबित करने के लिए काफी रहे कि डिजिटल इंडिया का यह पहिया अब पीछे मुड़ने वाला नहीं है।
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