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बिहार में टेंडर टेंपरिंग का बड़ा खुलासा: 5 करोड़ से अधिक के सभी ठेकों की उच्चस्तरीय जांच शुरू

बिहार के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों उस वक्त भारी खलबली मच गई है जब राज्य सरकार और जांच एजेंसियों ने टेंडर टेंपरिंग यानी ठेकों में बड़े पैमाने पर हेराफेरी और धांधली के खिलाफ एक बहुत बड़ा और निर्णायक अभियान छेड़ दिया है। भ्रष्टाचार की इन गहरी जड़ों पर प्रहार करते हुए प्रदेश सरकार ने पांच करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के सभी सरकारी ठेकों और विज्ञापित टेंडरों की पारदर्शी और गहराई से जांच के आदेश दे दिए हैं। इस अचानक हुई कड़ी कार्रवाई के दायरे में फिलहाल राज्य के 9 सबसे महत्वपूर्ण और मलाईदार विभाग सीधे तौर पर आ गए हैं, जहां पिछले कुछ सालों में जारी हुए टेंडरों की फाइलों को खंगाला जा रहा है। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद से न सिर्फ ठेकेदारों और बिचौलियों में हड़कंप मचा हुआ है, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों की नींद भी उड़ चुकी है, क्योंकि माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में कई बड़े चेहरे इस जांच की आंधियों में बेनकाब हो सकते हैं।

बिहार में सरकारी योजनाओं के नाम पर मचे लूट-खसोट और भाई-भतीजेवाद पर लगाम कसने के लिए सरकार ने अब तक का सबसे कड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। जिन ठेकों की लागत पांच करोड़ रुपये या उससे अधिक है, उनमें किस तरह से नियमों को ताक पर रखकर चहेती कंपनियों को उपकृत किया गया, इसकी एक-एक परत अब एंटी करप्शन ब्यूरो और अन्य उच्चस्तरीय जांच एजेंसियों द्वारा खोली जा रही है। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां टेंडर की शर्तों में जानबूझकर ऐसे बदलाव किए गए ताकि चुनिंदा सिंडिकेट के अलावा कोई दूसरी कंपनी प्रतियोगिता में हिस्सा ही न ले सके। इस प्रकार की टेंडर टेंपरिंग से न केवल सरकारी खजाने को भारी-भरकम वित्तीय चूना लगा है, बल्कि विकास कार्यों की गुणवत्ता भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई है, जिसे अब और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में सरकार नहीं दिखाई दे रही है।

इस व्यापक जांच अभियान के तहत जिन नौ प्रमुख विभागों को सबसे पहले घेरे में लिया गया है, वे राज्य के बुनियादी ढांचे, सड़क निर्माण, भवन निर्माण, जल संसाधन और ग्रामीण विकास जैसे अति-संवेदनशील और भारी बजट वाले विभाग माने जाते हैं। इन विभागों के पिछले कुछ वित्तीय वर्षों के दौरान जारी किए गए बड़े टेंडरों का पूरा कच्चा-चिट्ठा अब जांच अधिकारियों की मेज पर पहुंच चुका है, जहां डिजिटल टेंडर अपलोडिंग से लेकर वित्तीय बिड्स खोलने की प्रक्रियाओं तक की फॉरेंसिक जांच की जा रही है। जानकारों का कहना है कि इन विभागों में कुछ खास ठेकेदार और सिंडिकेट बरसों से जड़े जमाए बैठे थे जो हर बड़े प्रोजेक्ट को आपस में बांट लिया करते थे। अब जब इन तमाम फाइलों की स्क्रूटनी शुरू हो चुकी है, तो यह साफ नजर आने लगा है कि अंदरखाने किस सुनियोजित तरीके से नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं।

बिहार के ठेकेदारी बाजार में यह बात लंबे समय से खुली चर्चा का विषय रही है कि बिना किसी राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर टेंडर टेंपरिंग होना असंभव है। जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण टास्क इसी गहरे गठजोड़ को बेनकाब करने का है, जो फाइल मूवमेंट से लेकर टेंडर अलॉटमेंट तक अपनी धौंस जमाए रखता था। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि कागजों पर सबसे कम बोली लगाने वाली योग्य कंपनियों को तकनीकी खामी बताकर बाहर कर दिया जाता था और मनचाही फर्म को ठेका थमा दिया जाता था। इस तरह के कारनामों ने राज्य की पारदर्शी कार्यप्रणाली पर एक बड़ा धब्बा लगा रखा था, जिसे साफ करने के लिए इस सामूहिक और निष्पक्ष जांच की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी।

इस बड़े भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के धरातल पर उतरने के बाद से बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में एक नई सुगबुगाहट शुरू हो गई है और ईमानदार अधिकारियों तथा जनता के बीच इसकी सराहना हो रही है। लोगों को उम्मीद है कि इस बार जांच केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दोषियों के खिलाफ मिसाल कायम करने वाली सख्त कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाएगी। जैसे-जैसे इन नौ विभागों की फाइलों की जांच आगे बढ़ेगी, कई जूनियर और सीनियर इंजीनियरों, टेंडर प्रबंधकों तथा बड़े ठेकेदारों पर कानूनी शिकंजा कसने की पूरी संभावना है। यह पूरा प्रकरण न सिर्फ बिहार की राजनीति में एक नया भूचाल ला सकता है, बल्कि भविष्य के लिए सरकारी ठेकों की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी और डिजिटल बनाने की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।