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पितृ दोष से तुरंत मुक्ति दिलाता है हरिद्वार का दक्षेश्वर महादेव मंदिर: श्राद्ध पक्ष में कनखल स्थित यज्ञ कुंड और शिवलिंग के दर्शन का दुर्लभ चमत्कार

सनातन संस्कृति में देवभूमि उत्तराखंड के हरिद्वार को मोक्ष का प्रधान द्वार माना गया है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जब कुंडली में पितृ दोष सक्रिय होता है, तो व्यक्ति का जीवन निरंतर आर्थिक बाधाओं, पारिवारिक कलह, संतान कष्ट और मानसिक तनाव से घिर जाता है। इस दोष के निवारण हेतु वैदिक ग्रंथों में कई अनुष्ठान बताए गए हैं, परंतु हरिद्वार के दक्षिणी छोर पर बसे पावन उपनगर कनखल में स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा सिद्ध और चमत्कारी तीर्थ है, जहां दर्शन मात्र और शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करने से पितृ दोष की उग्रता शांत हो जाती है। श्राद्ध पक्ष के दिनों में इस मंदिर का आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि यहां महादेव साक्षात अपने ससुर राजा दक्ष के उद्धारक के रूप में विराजमान हैं।

यह भव्य और जागृत देवालय भगवान शिव और जगज्जननी माता सती के अमर प्रेम, त्याग और आध्यात्मिक मर्यादा का साक्षात प्रतीक है। कनखल की इस पावन भूमि को शिवभक्तों के साथ-साथ समस्त सनातनी अत्यंत आदर की दृष्टि से देखते हैं। पितृ पक्ष के दौरान देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मिक शांति और अपने कुल से पितृ दोष के प्रभाव को मिटाने के लिए दक्षेश्वर महादेव के पावन प्रांगण में पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां किए गए जलाभिषेक से पूर्वजों की अधोगति नष्ट होती है और वे सीधे उत्तम लोकों की ओर प्रस्थान करते हैं।

दक्षेश्वर महादेव मंदिर का वर्तमान स्थापत्य और इतिहास कला तथा आस्था का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। यद्यपि यह स्थल सतयुग के पौराणिक काल से ही अत्यंत पवित्र माना जाता रहा है, परंतु इसके वर्तमान मंदिर ढांचे का ऐतिहासिक निर्माण वर्ष 1810 में रियासत की महारानी धनकौर ने करवाया था। महारानी धनकौर ने कनखल के इस प्राचीन यज्ञ स्थल के आध्यात्मिक महत्व को पहचानते हुए नागर शैली के अनुरूप एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जिसमें नक्काशीदार पत्थरों और विशाल शिखर का संयोजन किया गया था।

समय के थपेड़ों और गंगा की बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए बाद में वर्ष 1962 में महानिर्वाणी अखाड़े और स्थानीय धर्मावलंबियों के सहयोग से मंदिर परिसर का व्यापक स्तर पर जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर परिसर के मुख्य गर्भगृह में प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जहां स्पर्श दर्शन और रुद्राभिषेक करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर परिसर के भीतर ही वह पौराणिक यज्ञ कुंड आज भी सुरक्षित है, जिसे माता सती के आत्मदाह का साक्षी माना जाता है। इस पावन कुंड की भस्म को मस्तक पर लगाने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है।

दक्षेश्वर महादेव मंदिर की महत्ता के पीछे श्रीमद्देवीभागवत और शिवपुराण में वर्णित एक अत्यंत मार्मिक और भीषण पौराणिक घटना जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, प्रजापति राजा दक्ष ने कनखल में एक महाविशाल यज्ञ का अनुष्ठान किया था। अहंकार में अंधे होकर राजा दक्ष ने त्रिलोकीनाथ भगवान शिव को इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया और जानबूझकर उनका भाग नहीं निकाला। जब माता सती को यह ज्ञात हुआ कि उनके पिता एक विराट यज्ञ कर रहे हैं, तो उन्होंने अपने पति देवाधिदेव महादेव से वहां जाने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उन्हें स्पष्ट रूप से सचेत किया कि बिना निमंत्रण के जाना अपमान का कारण बनता है, परंतु पिता के प्रति स्नेहवश माता सती हठपूर्वक यज्ञ में पहुंच गईं।

यज्ञमंडप में पहुंचने पर प्रजापति दक्ष ने पूरी सभा के सामने भगवान शिव के प्रति अत्यंत अपमानजनक और कटु शब्दों का प्रयोग किया। अपने आराध्य और पति के इस घोर निरादर को माता सती सहन न कर सकीं। अपनी मर्यादा और शिव-तत्व के सम्मान की रक्षा हेतु देवी सती ने उसी यज्ञ मंडप में योगाग्नि प्रज्वलित की और यज्ञ की पावन अग्नि में स्वयं को भस्म कर दिया। यह समाचार सुनते ही कैलाश पर भगवान शिव अत्यंत कुपित हो उठे। उनके क्रोध की ज्वाला से समस्त ब्रह्मांड कांप उठा और उन्होंने अपनी जटा से उग्र रूपी वीरभद्र और भद्रकाली को उत्पन्न कर दिया।

भगवान शिव के आदेश पर वीरभद्र ने अपनी प्रलयंकारी सेना के साथ कनखल के यज्ञ स्थल पर धावा बोल दिया। यज्ञशाला को तहस-नहस कर दिया गया, देवताओं को उनके अधर्म का दंड मिला और वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष का मस्तक धड़ से अलग करके उसी यज्ञ कुंड की अग्नि में स्वाहा कर दिया। सृष्टि में मचे हाहाकार को देखकर भगवान ब्रह्मा और अन्य सभी देवताओं ने महादेव की स्तुति की और उनके क्रोध को शांत करने की याचना की।

देवताओं की विनम्र प्रार्थना और पश्चाताप को देखकर करुणासागर महादेव का हृदय पसीज गया। शिवजी ने राजा दक्ष को क्षमादान दिया, परंतु चूंकि उनका मूल शीश अग्नि में जल चुका था, इसलिए राजा दक्ष के धड़ पर एक बकरे (अज) का सिर लगाकर उन्हें पुनः जीवित किया गया। राजा दक्ष ने पुनर्जीवन पाते ही महादेव के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और ‘शिव महिम्न स्तोत्र’ से उनकी वंदना की। महादेव ने प्रसन्न होकर यह वरदान दिया कि यह स्थान ‘दक्षेश्वर’ के नाम से संसार में विख्यात होगा और जो भी प्राणी यहां आकर शिवजी की पूजा करेगा, उसके समस्त अपराध और पूर्वजों के दोष भस्म हो जाएंगे।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राजा दक्ष स्वयं प्रजापति और समस्त जीवों के मूल पूर्वजों (पितरों) के अधिपति माने जाते हैं। जब भगवान शिव ने अपने ससुर दक्ष के अपराधों को क्षमा कर उन्हें सद्गति और मोक्ष प्रदान किया, तभी से यह सिद्ध हो गया कि दक्षेश्वर महादेव पितृ ऋण और पितृ दोष से मुक्ति के सर्वोच्च अधिष्ठाता देव हैं। यही कारण है कि आश्विन मास के पितृ पक्ष के दौरान यहां तर्पण और पिंडदान करने का फल गया तीर्थ के समान माना जाता है।

श्राद्ध पक्ष के दिनों में श्रद्धालु प्रातःकाल हरिद्वार के पवित्र हर की पौड़ी या कनखल के सती घाट पर गंगा स्नान करते हैं। इसके उपरांत श्वेत वस्त्र धारण कर, हाथ में कुश की पवित्री पहनकर और तांबे के पात्र में गंगाजल, कच्चा गाय का दूध, काले तिल, जौ, शहद और बेलपत्र लेकर दक्षेश्वर शिवलिंग का विधिवत अभिषेक करते हैं। अभिषेक के समय ‘ॐ नमः शिवाय’ और महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जप किया जाता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बाद श्रद्धालु प्राचीन यज्ञ कुंड की परिक्रमा करते हैं और अपने ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त प्रार्थना करते हैं। ऐसा करने से पितरों को शांति मिलती है, कुल में चली आ रही बाधाएं दूर होती हैं और साधक के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का स्थायी वास होता है।