
भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक, पौराणिक और आध्यात्मिक महापुरुषों के जीवन दर्शन को बड़े पर्दे पर उतारने का एक नया और समृद्ध दौर शुरू हो चुका है। उत्तराखंड की पावन भूमि से पूरे विश्व में ख्याति पाने वाले कैंची धाम के परम संत बाबा नीब करौरी (नीम करोली बाबा) के जीवन और उनके आध्यात्मिक प्रभाव पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ को बॉक्स ऑफिस और दर्शकों के बीच मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद, अब फिल्म इंडस्ट्री ने राजस्थान के मरुधरा अंचल की ओर रुख किया है। राजस्थान के जन-जन के आराध्य, सामाजिक समरसता के अप्रतिम प्रतीक और कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात अवतार माने जाने वाले महान लोक देवता बाबा श्री रामदेव पीर के अलौकिक जीवन पर एक भव्य पैन-इंडिया फिल्म बनने जा रही है। जिस प्रकार नीम करोली बाबा को आधुनिक युग में भगवान हनुमान का अंश मानकर देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालु नमन करते हैं, उसी प्रकार राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और सिंध तक बाबा रामदेव जी को जनमानस भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में पूजता है। यह बायोपिक न केवल भारतीय सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत करेगी, बल्कि सदियों पुरानी लोक आस्था को सिनेमाई कैनवास पर जीवंत करेगी।
सिनेमाई गलियारों में इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की पहली आधिकारिक पुष्टि प्रसिद्ध ट्रेड एनालिस्ट और फिल्म क्रिटिक तरण आदर्श ने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से की। उन्होंने बताया कि इस धार्मिक और ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का निर्माण ‘त्रिशा स्टूडियोज’ के प्रतिष्ठित बैनर तले किया जा रहा है, जिसके निर्माता जाने-माने फिल्ममेकर तिलोक कोठारी हैं। इस घोषणा के साथ ही फिल्म का पहला आधिकारिक टीजर पोस्टर भी जारी कर दिया गया है। फिल्म का शीर्षक आधिकारिक रूप से ‘कृष्ण अवतार: श्री रामदेव पीर’ (Krishna Avatar: Shri Ramdev Pir) रखा गया है। रिलीज किए गए पहले पोस्टर में मुख्य अभिनेता का चेहरा गोपनीय रखा गया है, जिससे सिनेप्रेमियों के बीच भारी उत्सुकता पैदा हो गई है। पोस्टर में दिखाए गए सिल्हाउट और आभामंडल में पीतांबर धारी भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य छवि, हाथ में मोरपंख और भाला, तथा सिर पर मुकुट का तेज साफ झलकता है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि यह फिल्म बाबा के अवतार लेने से लेकर उनके चमत्कारों और सामाजिक क्रांतियों तक के सफर को भव्य वीएफएक्स और यथार्थवादी सेटों के साथ पेश करेगी।
निर्माताओं ने फिलहाल फिल्म के मुख्य कलाकारों, संगीतकार और निर्देशक के नामों को एक सुनियोजित सस्पेंस के तहत गुप्त रखा है। प्रोडक्शन हाउस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बाबा रामदेव पीर के इस ऐतिहासिक और पूज्य किरदार के लिए बॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा के कई शीर्ष अभिनेताओं के ऑडिशन और लुक टेस्ट किए जा रहे हैं, ताकि पर्दे पर लोक देवता की गरिमा, तेज और दिव्यता के साथ पूरा न्याय किया जा सके। हालांकि, निर्माताओं ने यह साफ कर दिया है कि प्री-प्रोडक्शन, व्यापक ऐतिहासिक शोध, राजस्थान की लोक संगीत परंपराओं के संकलन और वीएफएक्स डिजाइनिंग में कोई जल्दबाजी नहीं की जाएगी। यही कारण है कि फिल्म को बड़े पैमाने पर तैयार करके वर्ष 2027 के मध्य तक दुनिया भर के सिनेमाघरों में रिलीज करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। माना जा रहा है कि फिल्म को हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी, गुजराती और अन्य प्रमुख भारतीय भाषाओं में डब करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज किया जाएगा।
चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजस्थान के पोकरण और रुणिचा की पावन धरा पर अवतरित हुए बाबा रामदेव जी केवल एक राजा या योद्धा नहीं थे, बल्कि वे मध्यकालीन भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और आध्यात्मिक संत थे। उन्होंने अपना संपूर्ण नश्वर जीवन छुआछूत, जातिगत भेदभाव, ऊंच-नीच और धार्मिक आडंबरों को मिटाने में समर्पित कर दिया था। तत्कालीन समाज में जब सामंतवाद और सामाजिक कुरीतियां चरम पर थीं, तब बाबा ने वंचित, शोषित और दलित समाज को गले लगाया और उन्हें समानता का अधिकार दिलाया। उनकी इसी असीम करुणा और दैवीय चमत्कारों (परचों) के कारण हिंदू समाज उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानकर ‘बाबा रामदेव’ के नाम से पूजता है, वहीं मुस्लिम समुदाय उनके सत्य, न्याय और मानवतावादी विचारों से प्रभावित होकर उन्हें ‘रामशाह पीर’ या ‘हिंदुआ पीर’ का दर्जा देता है। भारत में वे ऐसे विरले संत हैं जिनकी समाधि पर एक साथ हिंदू धूप-दीप जलाते हैं और मुस्लिम अकीदत की चादर पेश करते हैं।
राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित रुणिचा (रामदेवरा) का धाम आज भी लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। हर वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (बाबे री बीज) से लेकर एकादशी तक आयोजित होने वाले ऐतिहासिक ‘रामदेवरा मेले’ में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और विदेशों से लाखों पैदल जातरू अपनी मन्नतें लेकर पहुंचते हैं। बाबा के घोड़े (लीला घोड़ा), उनकी अनन्य भक्त डाली बाई की पावन गाथा, भैरव राक्षस का वध करके क्षेत्र को भयमुक्त बनाना और मक्का से आए पांच पीरों को अपनी अलौकिक शक्ति से संतुष्ट कर उनसे ‘पीरों के पीर’ की उपाधि प्राप्त करने जैसे ऐतिहासिक और चमत्कारी प्रसंग लोकगीतों और भजनों में सदियों से गाए जाते रहे हैं। अब इन सभी गौरवशाली और प्रेरणादायक ऐतिहासिक घटनाओं को अत्याधुनिक सिनेमैटोग्राफी के साथ सिल्वर स्क्रीन पर देखना दर्शकों के लिए एक अविस्मरणीय और रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव साबित होगा।
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