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SIR Row on Election Commission: “ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करो…” CEC पर भड़कीं ममता बनर्जी, उमर अब्दुल्ला ने बताया संविधान और लोकतंत्र पर सीधा हमला!

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया को लेकर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पर विपक्ष के तीखे हमलों के बीच देश की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में यह सनसनीखेज दावा सामने आने के बाद कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं, विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है।

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने बेहद आक्रामक तेवर अपनाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने और उन्हें तुरंत गिरफ्तार करने की मांग कर दी है। वहीं, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एकजुट होकर इसे भारतीय संविधान, चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला करार दिया है।

कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और वीडियो संदेश जारी करते हुए ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि आयोग के अंदर दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा बार-बार आपत्ति जताए जाने के बावजूद एकतरफा फैसले लेना यह साबित करता है कि निष्पक्ष संस्था को ‘एकतरफा’ तरीके से चलाया जा रहा है।

ममता बनर्जी ने तीखे शब्दों में कहा:

  • “यह इतिहास का सबसे चौंकाने वाला और अभूतपूर्व घोटाला है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। उनके पास इस संवैधानिक पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बचा है।”

  • उन्होंने आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट के एसआईआर के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। उन्होंने दावा किया कि बंगाल में चुनाव के दौरान वोटरों को मताधिकार से वंचित किया गया, इसलिए उन सभी राज्यों में पुरानी वोटर लिस्ट के आधार पर दोबारा निष्पक्ष चुनाव कराए जाने चाहिए।

  • ममता ने चेतावनी दी कि जब तक ज्ञानेश कुमार पद पर रहेंगे, विपक्ष का ‘इंडिया’ गठबंधन देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करेगा और इस मुद्दे को लेकर सड़क से संसद तक बड़ा आंदोलन छेड़ेगा।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चुनाव आयोग के भीतर उपजे मतभेदों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे अत्यंत चिंताजनक बताया। श्रीनगर में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा:

  • “यदि यह संविधान पर खुला हमला नहीं है, तो फिर क्या है? राहुल गांधी बिल्कुल सही कह रहे थे। हमने तो पहले भी परिसीमन (Delimitation) के समय आयोग की अपारदर्शी कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठाए थे।”

  • उमर अब्दुल्ला ने आगे कहा कि जब संवैधानिक संस्था के शीर्ष तीन आयुक्तों में से दो वरिष्ठ सदस्य ही फैसलों पर 14 बार लिखित असहमति जता रहे हों, तो यह साफ हो जाता है कि सब कुछ ठीक नहीं है।

  • उन्होंने सवाल उठाया कि यदि देश की जनता का निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से ही भरोसा उठ जाएगा, तो फिर भारतीय लोकतंत्र में बचेगा ही क्या?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए आरोप लगाया कि संस्थागत स्तर पर नागरिकों के मतों की चोरी संविधान पर गंभीर आघात है। उन्होंने कहा कि चुनावी मशीनरी को मनमाने ढंग से चलाने वालों की जवाबदेही तय की जाएगी।

वहीं, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पूरे एसआईआर प्रोसेस को तत्काल रद्द करने और पिछले वर्षों की मूल वोटर लिस्ट को बहाल करने की मांग की। उद्धव ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था को किसी राजनीतिक दल की शाखा की तरह काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

विपक्षी दलों के इन तीखे हमलों और मीडिया रिपोर्ट पर चुनाव आयोग ने भी अपना आधिकारिक पक्ष रखा है:

  • संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा: चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि फाइलों पर लिखित आपत्तियां, कानूनी सुझाव, तकनीकी आपत्तियां और आंतरिक जांच-पड़ताल किसी भी बहु-सदस्यीय संवैधानिक आयोग की सामान्य और पारदर्शी कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं।

  • सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय: आयोग ने कहा कि एसआईआर सहित सभी अंतिम नीतिगत निर्णय तय नियमों, कानूनी प्रावधानों और आयोग के सभी सदस्यों की सामूहिक सहमति से ही लागू किए गए हैं। सुझावों का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को त्रुटिहीन और मतदाताओं के अधिकारों को सुरक्षित बनाना था, जिसे अनावश्यक रूप से विवाद का रूप दिया जा रहा है।

इस पूरे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और एसआईआर नोटिसों पर सख्त रुख अपनाए जाने के बाद, अब चुनाव आयोग की अंदरूनी कार्यप्रणाली का मुद्दा देश के सबसे बड़े सियासी टकराव का केंद्र बन चुका है।