
देश की सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और कॉलेजियम सिस्टम (Collegium System) को लेकर चलने वाली सार्वजनिक बहसों के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दो टूक टिप्पणी की है। उन्होंने उस व्यापक धारणा और नैरेटिव को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें अक्सर यह दावा किया जाता है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में केवल ‘जज ही जज को नियुक्त करते हैं’। जस्टिस दत्ता ने न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया का विस्तृत संवैधानिक संदर्भ प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि वास्तविक धरातल पर न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका कार्यपालिका (सरकार) की तुलना में दूसरे नंबर यानी गौण (Secondary) स्थान पर होती है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई के हवाले से सामने आए इस बयान में जस्टिस दत्ता ने इस बात पर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया कि जब पूरी चयन और नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के पास इतने व्यापक अधिकार, वीटो और अंतिम मुहर लगाने की शक्ति पहले से मौजूद है, तो फिर चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण में किसी बाहरी व्यक्ति (Outsider) या गैर-न्यायिक प्रतिनिधि को शामिल करने की लगातार मांग क्यों उठाई जाती है। उन्होंने सरकार द्वारा कॉलेजियम में बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी की मांग को कार्यपालिका की अपनी प्रशासनिक कमियों और विफलताओं से ध्यान भटकाने की एक कमजोर कोशिश करार दिया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कॉलेजियम पर ‘अपने मनमुताबिक कानून चलाने’ के आरोपों का तथ्यात्मक रूप से जवाब देते हुए जजों की नियुक्ति की पूरी कार्यप्रणाली जनता के सामने रखी। उन्होंने बताया कि किसी भी वकील या न्यायिक अधिकारी के नाम की सिफारिश उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा किए जाने से पहले कई चरणों की अत्यंत कड़ी और बहुस्तरीय जांच होती है। इस प्रक्रिया में संबंधित राज्य सरकार, केंद्र सरकार का कानून मंत्रालय, खुफिया ब्यूरो (Intelligence Bureau – IB) और अन्य संबंधित जांच एजेंसियां उम्मीदवार की पृष्ठभूमि, चरित्र, वित्तीय ईमानदारी और पेशेवर सत्यनिष्ठा की गहन पड़ताल करती हैं।
जब तक खुफिया ब्यूरो और गृह मंत्रालय की सकारात्मक रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक किसी भी नाम पर औपचारिक सहमति नहीं बनती है। इसके उपरांत, कॉलेजियम की सिफारिश पर केंद्र सरकार की कैबिनेट और प्रधानमंत्री कार्यालय की संस्तुति के बाद भारत के राष्ट्रपति द्वारा अंतिम हस्ताक्षर और वारंट जारी किया जाता है। भारत के राष्ट्रपति की औपचारिक और संवैधानिक सहमति के बिना देश में किसी भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति संभव ही नहीं है। ऐसे में यह कहना कि पूरी प्रक्रिया केवल जजों के एक बंद कमरे के फैसले तक सीमित है, तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने जैसा है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने कार्यपालिका के उस रवैये पर भी खुलकर चिंता जताई जिसमें कॉलेजियम द्वारा भेजी गई सिफारिशों को चुनिंदा तरीके से (Cherry-picking) लागू किया जाता है। जस्टिस दत्ता ने कहा कि बार-बार यह देखने में आता है कि कार्यपालिका कॉलेजियम के भेजे गए नामों के पूरे पैनल को एक साथ मंजूरी देने के बजाय अपनी पसंद के अनुसार फैसलों को लागू करती है और लगभग हर बार कम से कम एक या दो नामों को बिना किसी ठोस कारण के रोक (Withhold) लेती है।
उन्होंने इस बात का भी खुलासा किया कि न्यायपालिका कार्यपालिका के इस चुनिंदा रवैये के बावजूद सीधे संवैधानिक टकराव से बचने और देश भर के न्यायालयों में रिक्तियों के कारण चरमरा रहे न्यायिक ढांचे को सुचारू रूप से संचालित रखने के लिए कई बार व्यावहारिक लचीलापन दिखाती है। कॉलेजियम ऐसे मामलों में आगे बढ़ने का निर्णय इसलिए लेता है ताकि देश में कोई गंभीर संवैधानिक संकट या गतिरोध पैदा न हो और आम जनता को त्वरित न्याय मिलने में कोई बाधा न पहुंचे। उन्होंने दोहराया कि न्यायपालिका की इस गरिमापूर्ण चुप्पी और संस्थागत समझदारी को उसकी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सार्वजनिक विमर्श और मीडिया में कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना करने की प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज के दौर में न्यायपालिका के किसी भी प्रतिकूल या गलत निर्णय के लिए पूरी कॉलेजियम व्यवस्था को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर देना एक तरह का फैशन बन चुका है। आलोचक और विश्लेषक बहुत आसानी से इस बुनियादी सत्य को भुला देते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में गलतियां हमेशा अपवाद (Exceptions) होती हैं, वे कोई सामान्य नियम नहीं होती हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया की कोई भी प्रणाली या संस्थागत ढांचा इंसानी निर्णयों के सौ प्रतिशत अचूक या त्रुटिहीन होने की गारंटी कभी नहीं दे सकता। किसी एक मामले में अगर कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों पर खरा नहीं उतरता, तो इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि पूरी चयन प्रणाली ही दोषपूर्ण है। जनता के बीच जानबूझकर यह आधा-अधूरा सच फैलाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज केवल अपने विवेक से नियुक्तियां करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कार्यपालिका की विस्तृत जांच और अंतिम संवैधानिक संस्तुति के बिना किसी भी व्यक्ति के लिए अदालत की बेंच तक पहुंचना असंभव है।
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