
भारत में कॉर्पोरेट दिवालियापन और फंसे हुए कर्जों (NPA) के समाधान के लिए मई 2016 में लागू किए गए ऐतिहासिक कानून इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) ने अपने सफल 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं। आजादी के बाद भारतीय बैंकिंग और कॉर्पोरेट जगत के सबसे बड़े आर्थिक सुधारों में गिने जाने वाले इस कानून ने दशकों पुरानी “प्रमोटर-नियंत्रित” व्यवस्था को बदलकर “क्रेडिटर-नियंत्रित” (Creditor-in-Control) मॉडल में तब्दील कर दिया।
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, इस एक दशक में शेड्यूल कमर्शियल बैंकों और वित्तीय लेनदारों ने अनुमोदित समाधान योजनाओं (Resolution Plans) के जरिए ₹4.32 लाख करोड़ (₹4.32 Trillion) से अधिक की प्रत्यक्ष वसूली दर्ज की है। जहां पहले सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज एक्ट (SICA/BIFR) और डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) में मामलों को सुलझने में 6 से 8 साल लग जाते थे और वसूली मात्र 15% से 20% तक सिमट जाती थी, वहीं आईबीसी ने समाधान की रफ्तार और संस्कृति दोनों को पूरी तरह बदल कर रख दिया।
आईबीसी के 10 वर्षों के आधिकारिक आंकड़े भारतीय वित्तीय तंत्र में एक अभूतपूर्व परिवर्तन की गवाही देते हैं:
| प्रमुख पैमाना (Metric) | 10 वर्षों का कुल आंकड़ा (2016 – 2026) | वास्तविक संदर्भ व प्रभाव |
| कुल स्वीकृत मामले (Admitted Cases) | 8,987 मामले | एनसीएलटी द्वारा कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी (CIRP) में दर्ज |
| निस्तारित मामले (Closed Cases) | 7,102 मामले | कुल दर्ज मामलों का लगभग 79% सफलतापूर्वक क्लोज |
| सफल समाधान योजनाएं (Resolution Plans) | 1,419 कंपनियां | दिवालिया होने से बचाई गईं और दोबारा चालू की गईं |
| लिक्विडेशन (परिसमापन) में गई कंपनियां | 3,003 कंपनियां | जहां कोई खरीदार नहीं मिला और संपत्तियां बेची गईं |
| कुल प्रत्यक्ष वसूली (Realised by Creditors) | ₹4.32 लाख करोड़ | फेयर वैल्यू का 95% और लिक्विडेशन वैल्यू का 167% |
| प्री-एडमिशन सेटलमेंट (Fear of IBC) | 30,000+ मामले | ₹14 लाख करोड़ के बकाये का अदालत के बाहर समझौता |
इस सख्त कानून का सबसे बड़ा परिणाम यह रहा कि भारतीय बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात (Gross NPA Ratio), जो वर्ष 2017 में 11.8% के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया था, वह घटकर ऐतिहासिक निचले स्तर 2.1% पर आ गया है।
आईबीसी की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल अदालत के भीतर हुई वसूली नहीं है, बल्कि डिफाल्टर प्रमोटरों के व्यवहार में आया मनोवैज्ञानिक बदलाव है। 2016 से पहले डिफॉल्ट करने वाले प्रमोटर सालों तक अदालतों में मामले लटकाए रखते थे और कंपनी पर उनका नियंत्रण बना रहता था। आईबीसी ने धारा 29A लागू करके डिफॉल्टर प्रमोटरों को अपनी ही कंपनी की नीलामी में बोली लगाने से प्रतिबंधित कर दिया।
इसका परिणाम यह हुआ कि कंपनी का मालिकाना हक छिन जाने के डर से देनदार दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही बैंकों की देय रकम चुकाने के लिए मजबूर हुए। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में अर्जी स्वीकार (Admission) होने से पहले ही 30,000 से अधिक मामलों में लगभग ₹14 लाख करोड़ के दावों का निपटारा हो गया। आईआईएम बैंगलोर के एक अध्ययन के अनुसार, डिफॉल्ट खातों के बकाया रहने का औसत समय 344 दिनों से घटकर मात्र 30 से 87 दिन रह गया है।
शानदार सफलताओं के बावजूद आईबीसी की रीढ़ मानी जाने वाली समय-सीमा (Time-Bound Resolution) आज इस कानून की सबसे कमजोर कड़ी बन चुकी है। कानून के मुताबिक किसी भी कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) को अधिकतम 330 दिनों (मुकदमेबाजी की अवधि सहित) के भीतर पूरा होना चाहिए।
रेटिंग एजेंसी आईसीआरए (ICRA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2026 तक आते-आते एनसीएलटी में औसतन रेजोल्यूशन टाइम बढ़कर 744 दिन हो चुका है, जो तय कानूनी सीमा से दोगुने से भी अधिक है। एनसीएलटी में वर्तमान में विचाराधीन 78% से अधिक मामले 270 दिनों की समय-सीमा पार कर चुके हैं।
इस अत्यधिक देरी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
-
जजों और न्यायिक क्षमता की भारी कमी: देश भर में एनसीएलटी की 16 बेंचों में जजों और तकनीकी सदस्यों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। केसलोड की तुलना में जजों की सीमित संख्या के कारण मामलों की पहली सुनवाई (Admission) में ही महीनों लग जाते हैं।
-
लगातार मुकदमेबाजी (Litigation Bottlenecks): अनसक्सेसफुल बिडर्स, ऑपरेशनल क्रेडिटर्स और प्रमोटर रेजोल्यूशन प्लान को रोकने के लिए एनसीएलटी, एनसीएलएटी (NCLAT) और सुप्रीम कोर्ट तक याचिकाओं की बाढ़ ला देते हैं।
-
संपत्ति मूल्य में गिरावट (Asset Value Erosion): अदालती देरी जितनी लंबी खिंचती है, प्लांट, मशीनरी और चालू कारोबार का मूल्य उतना ही गिरता जाता है, जिससे अंततः बैंकों को भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ता है।
लंबे समय तक चलने वाली कानूनी खींचतान का सीधा असर बैंकों की रिकवरी दरों पर पड़ा है। वित्त वर्ष 2024-25 में जहां बैंकों की रिकवरी दर 46% थी, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह गिरकर मात्र 23% रह गई, यानी वसूली दर एक ही साल में लगभग आधी हो गई।
इसका मतलब यह है कि बैंकों को स्वीकृत दावों पर औसतन 68% से 77% तक का हेयरकट (घाटा) सहना पड़ रहा है, और कुछ तिमाहियों में यह हेयरकट 80% के उच्चतम स्तर को छू गया। विशेष रूप से ₹1,000 करोड़ से बड़े मेगा डिफॉल्ट मामलों में देरी के कारण रिकवरी दर केवल 24% के आसपास सिमट कर रह गई है।
इसके अलावा, बंद हुए कुल 7,102 मामलों में से 3,003 कंपनियां (लगभग 42%) परिसमापन (Liquidation) में चली गईं। लिक्विडेशन में बैंकों की रिकवरी मात्र 4% रह जाती है, जो यह साबित करता है कि यदि प्रक्रिया में देरी हुई तो कंपनी को जिंदा बचाना असंभव हो जाता है।
एनसीएलटी के गतिरोध और घटती रिकवरी दरों को दूर करने के लिए संसद द्वारा पारित सातवां आईबीसी संशोधन (Seventh IBC Amendment) लागू किया गया है। इस संशोधन के तहत निम्नलिखित बड़े बदलाव किए जा रहे हैं:
-
तय समय में अनिवार्य एडमिशन: एनसीएलटी को डिफॉल्ट साबित होने पर 14 दिनों के भीतर केस एडमिट करने के नियमों को और अधिक बाध्यकारी बनाया गया है।
-
डिजिटल बेंच और स्पेशल ट्रिब्यूनल: रियल एस्टेट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए विशेष बेंचों का गठन, ताकि आम होमबॉयर्स और जटिल प्रोजेक्ट्स सामान्य मुकदमों में न उलझें।
-
प्री-पैकेज्ड इंसॉल्वेंसी (PPIRP) का सरलीकरण: एमएसएमई और छोटे उद्योगों के लिए समय बचाने वाले प्री-पैक सिस्टम को और अधिक लचीला बनाया जा रहा है।
-
अनावश्यक अपीलों पर रोक: समाधान योजना स्वीकृत होने के बाद प्रमोटरों द्वारा बेवजह की जाने वाली अपीलों को सीमित करने के कड़े प्रावधान जोड़े गए हैं।
आईबीसी के 10 सालों ने यह साबित कर दिया है कि यह कानून भारत के डिफॉल्ट कल्चर को खत्म करने में बेहद सफल रहा है। हालांकि, इसके अगले दशक की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार एनसीएलटी में जजों की पर्याप्त नियुक्ति करके 330 दिनों की समय-सीमा की गरिमा को कैसे दोबारा बहाल करती है।
girls globe