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फिर रुलाने की तैयारी में प्याज: ₹35 की सरकारी सब्सिडी के बावजूद नहीं थम रहे दाम, मेट्रो शहरों में ₹60 से ₹70 प्रति किलो तक पहुंचे भाव

आगामी त्योहारों के सीजन से ठीक पहले रसोई के बजट पर एक बार फिर महंगाई की मार पड़ती नजर आ रही है। भारतीय थाली का अनिवार्य हिस्सा मानी जाने वाली प्याज की कीमतें आम उपभोक्ताओं की आंखों में आंसू लाने को तैयार हैं। केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के मकसद से अपने बफर स्टॉक से नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन (NCCF) और नैफेड (NAFED) के जरिए ₹35 प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर प्याज की बिक्री शुरू की है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी हस्तक्षेप और सब्सिडी के बावजूद देश के प्रमुख महानगरों और खुदरा बाजारों में प्याज के दाम लगातार चढ़ते जा रहे हैं। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जहां कीमतें ₹53 से ₹60 प्रति किलो दर्ज की गई हैं, वहीं स्थानीय मंडियों और किराना दुकानों पर अच्छी गुणवत्ता वाली प्याज ₹60 से लेकर ₹70 प्रति किलो तक बिक रही है।

केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय के ताजा आंकड़ों और स्थानीय बाजार रिपोर्टों के अनुसार, देश के प्रमुख मेट्रो शहरों में प्याज के दामों की स्थिति इस प्रकार है:

  • राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली: सरकारी आंकड़ों में दिल्ली में औसत खुदरा भाव ₹53 प्रति किलो दर्ज हुआ है, लेकिन कॉलोनियों और खुदरा मंडियों में यह ₹60 से ₹70 प्रति किलो तक पहुंच चुका है।

  • मुंबई: आर्थिक राजधानी में प्याज के आधिकारिक खुदरा दाम ₹58 प्रति किलो दर्ज किए गए हैं, जबकि प्रीमियम क्वालिटी ₹65 प्रति किलो पार कर चुकी है।

  • कोलकाता और चेन्नई: पूर्वी और दक्षिणी भारत के इन दोनों महानगरों में प्याज के आधिकारिक दाम सबसे ऊंचे यानी ₹60 प्रति किलो पर बने हुए हैं। स्थानीय बाजारों में यह ₹65 से ₹75 प्रति किलो तक बिक रही है।

  • अखिल भारतीय औसत: देशभर में प्याज की औसत खुदरा कीमत ₹54.2 प्रति किलो के आसपास पहुंच गई है, जबकि देश के कुछ संवेदनशील हिस्सों में अधिकतम भाव ₹100 प्रति किलो तक भी दर्ज किया गया है।

कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 के लिए लगभग 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक तैयार किया है। नासिक (महाराष्ट्र) और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों से उपभोग केंद्रों तक प्याज तेजी से पहुंचाने के लिए रेलवे की विशेष मालगाड़ी यानी ‘कांदा एक्सप्रेस’ (Kanda Express) और ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बावजूद खुदरा कीमतों में राहत न दिखने के पीछे ये प्रमुख कारण सामने आए हैं:

  • सीमित सरकारी आउटलेट्स: NCCF, NAFED और केंद्रीय भंडार की मोबाइल वैन और स्टोर्स मुख्य रूप से चुनिंदा इलाकों तक सीमित हैं। देश की विशाल आबादी और कॉलोनियों के लाखों खुदरा खरीदार अब भी निजी सब्जी मंडियों और स्थानीय रेहड़ी-पटरी वालों पर निर्भर हैं, जहां सब्सिडी वाली प्याज उपलब्ध नहीं है।

  • आपूर्ति और लीन पीरियड (Lean Period) का असर: सितंबर और अक्टूबर का समय प्याज की आपूर्ति के लिहाज से ‘लीन सीजन’ माना जाता है। इस दौरान रबी फसल का पुराना स्टॉक मंडियों में कम होने लगता है, जबकि खरीफ की नई आवक में अभी कुछ हफ्तों का समय बाकी है।

  • मौसम का मिजाज और लॉजिस्टिक्स में बाधा: मानसून के अंतिम दौर में भारी बारिश और चक्रवाती दबाव के कारण महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्यों से होने वाले सड़क परिवहन में देरी हुई है, जिससे स्थानीय मंडियों में तात्कालिक आपूर्ति की कमी पैदा हुई।

  • बिचौलियों की मुनाफाखोरी और जमाखोरी: उत्पादक मंडियों में किसानों से मिलने वाले थोक भाव और शहरों में उपभोक्ताओं द्वारा चुकाए जाने वाले खुदरा भाव के बीच एक बहुत बड़ा अंतर (Price Gap) बना हुआ है। व्यापारी और आढ़ती त्योहारों में मांग बढ़ने की उम्मीद में पुराना स्टॉक रोककर कृत्रिम किल्लत बना रहे हैं।

कृषि और उपभोक्ता मामलों के जानकारों का मानना है कि त्योहारी सीजन (दशहरा और दिवाली) के दौरान मांग में और तेजी आने की संभावना है। हालांकि सरकार ने 50 से अधिक शहरों में रियायती प्याज की आपूर्ति बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर बफर स्टॉक से और अधिक खेप रेल मार्गों के जरिए भेजने का फैसला किया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक मंडियों में खरीफ सीजन की नई प्याज की आवक पूरी तरह शुरू नहीं हो जाती, तब तक खुदरा कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। यदि सरकार ने स्थानीय स्तर पर जमाखोरी के खिलाफ सख्त निगरानी और वैनों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी नहीं की, तो आने वाले दिनों में प्याज के दाम मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट और बिगाड़ सकते हैं।