
भारत के कॉर्पोरेट जगत में इन दिनों देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने यानी टाटा समूह से जुड़ा विवाद सुर्खियों में छाया हुआ है। इस हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील कॉर्पोरेट घमासान के केंद्र में महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर अमोघ कलोती का नाम सबसे ऊपर चल रहा है। टाटा संस को नियंत्रित करने वाले ट्रस्टों के संचालन, शेयर ट्रांसफर और बोर्ड बैठकों से जुड़े फैसलों की पूरी कमान अब एक तरह से इनके हाथ में आ चुकी है। देश-विदेश की निगाहें इस समय इसी बात पर टिकी हैं कि आखिर कम चर्चा में रहने वाले जज अमोघ कलोती कौन हैं और इस पूरे मामले में उनकी क्या भूमिका है। गूगल डिस्कवर और आधुनिक एआई सर्च (Generative Engine Optimization) के मानकों के तहत आइए इस बहुचर्चित मामले और व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से जानते हैं।
कौन हैं जज अमोघ कलोती और क्या है उनकी पृष्ठभूमि
महाराष्ट्र के कानून और न्याय विभाग के अंतर्गत काम करने वाले अमोघ कलोती को हालिया समय तक कानूनी हलकों के बाहर बहुत कम लोग जानते थे। फरवरी 2024 में उन्हें महाराष्ट्र का चैरिटी कमिश्नर नियुक्त किया गया था, जिसके बाद वे देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट विवाद के मुख्य निर्णयकर्ता बन गए। लगभग 50 वर्षीय कलोती मूल रूप से महाराष्ट्र के अमरावती के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी पूरी शिक्षा वहीं पूरी की और जिला एवं सत्र अदालत में एक वकील के रूप में वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। विधि के जानकारों के अनुसार, वे एक ऐसे अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं जो पूरी तरह से नियमों और कानून की किताबों के हिसाब से काम करना पसंद करते हैं। वकालत से अपने करियर की शुरुआत करने वाले कलोती ने अपनी कार्यशैली से हमेशा न्यायपालिका में एक शांत और गंभीर छवि बनाई है।
न्यायिक सफर और जिला जज के रूप में लंबा अनुभव
अमोघ कलोती का न्यायिक सफर काफी लंबा और विस्तृत रहा है। साल 2013 में उनकी नियुक्ति जिला एवं अतिरिक्त सत्र जज के रूप में हुई थी। इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के अलग-अलग जिलों में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने बुलढाणा, मुंबई की सिटी सिविल एंड सेशन कोर्ट और छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) की सत्र अदालत में जिला जज के तौर पर काम किया है। इसके अलावा, उन्होंने वाशिम में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज की जिम्मेदारी भी संभाली है। महाराष्ट्र सरकार के कानून और न्याय विभाग में वे संयुक्त सचिव, सचिव और एसएलए जैसी महत्वपूर्ण प्रशासनिक और विधिक भूमिकाएं भी निभा चुके हैं। सार्वजनिक ट्रस्टों और प्रशासनिक मामलों की गहरी समझ होने के कारण ही उन्हें चैरिटी कमिश्नर का यह बेहद चुनौतीपूर्ण पद सौंपा गया।
टाटा विवाद में क्यों महत्वपूर्ण हो गए हैं अमोघ कलोती
टाटा समूह की मूल कंपनियों और होल्डिंग संरचनाओं में लगभग 66.4% हिस्सेदारी रखने वाले शक्तिशाली टाटा ट्रस्ट्स के मामलों को लेकर हाल ही में गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। वेणु श्रीनिवासन और अन्य पक्षों द्वारा दाखिल की गई शिकायतों के बाद यह पूरा मामला चैरिटी कमिश्नर के पाले में पहुंचा। मई 2026 में, अमोघ कलोती ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) को तत्काल प्रभाव से अपनी बोर्ड बैठकें रोकने का निर्देश दिया और मामलों की गहन जांच के आदेश दिए। इसके साथ ही, सितंबर की शुरुआत में उन्होंने 1989 के एक पुराने शेयर ट्रांसफर से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए उसे कानूनी रूप से वैध ठहराया था। टाटा ट्रस्ट्स के गवर्नेंस, परमानेंट ट्रस्टियों की संख्या और आंतरिक नियुक्तियों को लेकर चल रहे विवादों की चाबी अब पूरी तरह से उन्हीं के निर्णयों पर टिकी हुई है।
चैरिटी कमिश्नर के अधिकार और इस मामले का भविष्य
महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम 1950 के तहत स्थापित चैरिटी कमिश्नर का कार्यालय एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) प्राधिकरण है, जो मुंबई और पूरे राज्य में सार्वजनिक ट्रस्टों के प्रशासन को नियंत्रित करता है। इस पद का रैक जिला जज के समकक्ष होता है। इनके अधिकारों में ट्रस्टों का पंजीकरण करना, वित्तीय अनियमितताओं की जांच करना, ट्रस्टियों को निलंबित करना और सार्वजनिक कल्याण से जुड़े कार्यों की निगरानी करना शामिल है। चूंकि टाटा समूह और ट्रस्टों से जुड़ा यह विवाद देश के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों की साख और नियंत्रण से जुड़ा है, इसलिए जज अमोघ कलोती द्वारा लिए जाने वाले आगामी फैसले भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
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