
देश के राजनीतिक परिदृश्य में जब भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) जैसे संवेदनशील और वैचारिक मुद्दों पर चर्चा छिड़ती है, तो देश के तमाम क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच पाबंदियों और गठबंधनों के समीकरण तेजी से बदलने लगते हैं। बिहार की राजनीति में इन दिनों एक बार फिर से सनसनीखेज भूचाल आया हुआ है, क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) को लेकर एक ऐसा तीखा और रणनीतिक राजनीतिक बयान दिया है जिसने सियासी पंडितों को भी हैरान कर दिया है। राजद का यह आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा लाए जाने वाले यूसीसी (UCC) कानून के नाम पर अप्रत्यक्ष रूप से नीतीश कुमार को पूरी तरह से ‘भगवामय’ करने यानी बीजेपी की हिंदुत्ववादी विचारधारा में पूरी तरह विलीन करने की सुनियोजित तैयारी चल रही है। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की छवि हमेशा से एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) और समाजवादी नेता की रही है, जो कभी बीजेपी के साथ तो कभी आरजेडी के साथ मिलकर सरकार चलाते रहे हैं। ऐसे में, आरजेडी द्वारा यह दावा किया जाना कि नीतीश कुमार अब अपनी वैचारिक पहचान खोते जा रहे हैं, आने वाले राजनीतिक दिनों के लिए एक बहुत बड़े दंगल का संकेत दे रहा है।
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेताओं का यह तर्क है कि यूसीसी जैसे मुद्दों पर जेडीयू का जो मौन समर्थन या ढुलमुल रवैया रहता है, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पार्टी अब वैचारिक रूप से पूरी तरह कमजोर हो चुकी है और बीजेपी के दबाव में अपने पुराने समाजवादी सिद्धांतों से समझौता कर रही है। आरजेडी का मुख्य निशाना यह साबित करना है कि नीतीश कुमार की पार्टी अब अपने दम पर कोई स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है और धीरे-धीरे उन्हें पूरी तरह से भगवा रंग में रंगने का खेल खेला जा रहा है, ताकि उनके मूल मुस्लिम और पिछड़ों के वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके। बिहार जैसे राज्य में जहां जातीय समीकरण और सामाजिक न्याय की राजनीति चुनावी हार-जीत की दिशा तय करती है, वहां किसी भी नेता पर वैचारिक पलटी मारने का आरोप लगाना सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार माना जाता है। आरजेडी इस मुद्दे को हवा देकर यह जताना चाहती है कि जो लोग कल तक धर्मनिरपेक्षता की बड़ी-बड़ी बातें करते थे, वे आज सत्ता के लालच में बीजेपी के हर उस एजेंडे का समर्थन कर रहे हैं जो देश के बहुसांस्कृतिक ताने-बाने के खिलाफ है।
दूसरी ओर, आरजेडी के इन तीखे हमलों पर पलटवार करते हुए जनता दल यूनाइटेड (JDU) के वरिष्ठ नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा है कि नीतीश कुमार किसी के दबाव में काम नहीं करते हैं, बल्कि वे हमेशा से ‘सबका साथ, सबका विकास’ और न्याय के साथ विकास के रास्ते पर चलने वाले नेता रहे हैं। जेडीयू का यह कहना है कि यूसीसी या किसी भी अन्य राष्ट्रीय मुद्दे पर पार्टी का स्टैंड पूरी तरह से पारदर्शी रहा है और वे विधि आयोग या संबंधित मंचों पर अपनी बात मजबूती से रखते आए हैं। हालांकि, राजनीति के जानकार अच्छी तरह समझते हैं कि नीतीश कुमार के सामने वर्तमान में अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखने और राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने की एक बड़ी चुनौती है, जिसके चलते उन्हें कई बार ऐसे मुद्दों पर संतुलन बनाकर चलना पड़ता है जो उनके पुराने सहयोगियों को रास नहीं आते। आरजेडी इसी मजबूरी को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बना रही है और वह लगातार यह प्रचारित करने में जुटी है कि नीतीश कुमार अब जेडीयू को बचाने में नाकाम साबित हो रहे हैं और उनकी पार्टी का भगवाकरण अपरिहार्य हो चुका है।
बिहार में होने वाले आगामी चुनावों और राजनीतिक उठापटक के लिहाज से यूसीसी और भगवाकरण का यह नैरेटिव बहुत दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला है। राज्य का मुस्लिम मतदाता और पारंपरिक समाजवादी वोटर इस बात पर बारीक नजर बनाए हुए है कि कौन सा दल वैचारिक रूप से उनके हितों के साथ खड़ा है और कौन अवसरवादी राजनीति कर रहा है। आरजेडी इस प्रकार के बयानों के जरिए अल्पसंख्यक और पिछड़ों के उस कोर वोटर को फिर से अपने पाले में एकजुट करने की कोशिश कर रही है जो कभी नीतीश कुमार के सुशासन के नाम पर उनके साथ जुड़ा करता था। यदि आरजेडी इस रणनीति में कामयाब हो जाती है, तो जेडीयू के लिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को सहेजे रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि जेडीयू भी अब आक्रामक रुख अपनाते हुए आरजेडी के परिवारवाद और भ्रष्टाचार के पुराने मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है ताकि जनता का ध्यान भटकाया जा सके।
अंततः, यूसीसी के नाम पर नीतीश कुमार को ‘भगवामय’ करने का यह आरजेडी का सियासी शिगूफा महज एक बयान नहीं है, बल्कि यह बिहार के आगामी राजनीतिक रण का एक सुनियोजित शंखनाद है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, वैचारिक और जातीय समीकरणों की यह लड़ाई और अधिक तीव्र होती जाएगी। जनता अब बहुत समझदार हो चुकी है और वह भली-भांति जानती है कि किस दल का निशाना वास्तव में जनहित का है और किसका मकसद सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेकना है। इस सियासी घमासान में किसकी जीत होती है और कौन किस पर भारी पड़ता है, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति में गर्माहट अभी और बढ़ने वाली है।
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