
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इन दिनों राजनीतिक सरगर्मियां अपने चरम पर हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व के बीच हाल ही में एक बेहद महत्वपूर्ण और उच्चस्तरीय समन्वय बैठक का आयोजन किया गया। इस महा-बैठक में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों और भाजपा संगठन के चुनिंदा दिग्गजों ने हिस्सा लिया, जहां आगामी राजनीतिक चुनौतियों, सांगठनिक तालमेल और विपक्ष की रणनीतियों का तोड़ निकालने पर गहन मंथन किया गया। राजनीति के गलियारों में इस बैठक को बेहद रणनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है क्योंकि राज्य और देश के स्तर पर जिस प्रकार से विपक्षी दल लगातार सरकार को घेरने के लिए नए-नए नैरेटिव गढ़ रहे हैं, उससे निपटने के लिए अब संघ और भाजपा ने पूरी तरह से कमर कस ली है। बैठक का मुख्य उद्देश्य जमीनी स्तर पर पार्टी और संगठन के बीच आपसी संवाद को और अधिक मजबूत करना तथा जनता के बीच सरकार की कल्याणकारी नीतियों के संदेश को बिल्कुल स्पष्ट रूप से पहुंचाना था। जब भी संघ और बीजेपी की इस तरह की संयुक्त समन्वय बैठकें होती हैं, तो राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें इस बात पर टिकी होती हैं कि आखिर पर्दे के पीछे क्या खिचड़ी पक रही है और आने वाले समय में चुनावी व वैचारिक मोर्चे पर इसका क्या बड़ा असर देखने को मिलने वाला है।
इस उच्चस्तरीय समन्वय बैठक की सबसे बड़ी और खास बात यह रही कि इसमें पार्टी और संगठन के तमाम पदाधिकारियों को बेहद स्पष्ट और सख्त शब्दों में निर्देश दिया गया कि वे किसी भी कीमत पर विपक्ष द्वारा गढ़े जा रहे भ्रामक नैरेटिव (Narrative) के जाल में न फंसें। पिछले कुछ समय से जिस प्रकार से विपक्षी दलों द्वारा सोशल मीडिया, बयानों और विभिन्न मुद्दों के जरिए सरकार की नीतियों को लेकर एक नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, उससे निपटने के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं को आक्रामक और स्पष्ट रुख अपनाने को कहा गया है। बैठक में यह बात खुलकर सामने आई कि अक्सर विपक्ष के उठाए गए मुद्दों पर प्रतिक्रिया देते-देते पार्टी अपना मूल एजेंडा या विकास के काम पीछे छोड़ देती है, जिससे जनता के बीच गलत संदेश जा सकता है। इसलिए, अब यह तय किया गया है कि भाजपा और संघ के पदाधिकारी विपक्ष के झांसे में आने के बजाय अपने कामकाज, जनहित की योजनाओं और वैचारिक दृढ़ता के साथ सीधे जनता के बीच जाएंगे। नेताओं को यह भी समझाया गया कि वे स्थानीय स्तर पर हो रहे दुष्प्रचार का तार्किक और तथ्यात्मक जवाब दें ताकि आम जनता में किसी भी प्रकार का संशय न रहे और विपक्षी एजेंडे की हवा पहले ही निकाली जा सके।
किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसका जमीनी कार्यकर्ता और मजबूत संगठन होता है, और इसी बात को ध्यान में रखते हुए लखनऊ की इस बैठक में संघ और भाजपा के बीच आपसी समन्वय को और अधिक पेनी धार देने पर व्यापक चर्चा हुई। पिछले कुछ चुनावों और राजनीतिक घटनाक्रमों से यह सबक लिया गया है कि संगठन और सरकार के बीच यदि जरा सा भी संवादहीनता या अंतर आता है, तो उसका सीधा नुकसान राजनीतिक जमीन पर उठाना पड़ सकता है। इसे दूर करने के लिए संघ के वरिष्ठ प्रचारकों और भाजपा के सांगठनिक पदाधिकारियों ने मिलकर यह तय किया है कि आने वाले दिनों में बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जाएगा। जिला और मंडल स्तर पर नियमित बैठकों का आयोजन होगा, जिसमें सरकार की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने का रोडमैप तैयार किया जाएगा। इसके साथ ही, आम जनता की छोटी-छोटी समस्याओं और शिकायतों का त्वरित निस्तारण हो सके, इसके लिए प्रशासन और संगठन के बीच एक बेहतर सेतु बनाने पर भी बल दिया गया है। जब संगठन मजबूत होता है, तो विपक्ष के बड़े से बड़े राजनीतिक प्रपंच और नैरेटिव अपने आप बेअसर साबित होने लगते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से देश की मुख्यधारा की राजनीति की दिशा तय करती रही है, और यहां होने वाला हर छोटा-बड़ा बदलाव राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ता है। आगामी राजनीतिक और चुनावी परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए संघ और भाजपा की यह समन्वय बैठक भविष्य की रणनीतियों का एक मजबूत खाका तैयार कर रही है। बैठक में इस बात पर भी मंथन किया गया कि कैसे युवाओं, महिलाओं और ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं के बीच अपनी पैठ को और अधिक मजबूत किया जाए ताकि विपक्षी दलों के किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार का उन पर कोई असर न पड़े। वैचारिक प्रतिबद्धता और विकास के मुद्दों को एक साथ लेकर आगे बढ़ने का जो संकल्प इस बैठक में लिया गया है, वह आने वाले दिनों में पार्टी के रुख में साफ तौर पर दिखाई देगा। नेताओं को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि वे जनता के बीच रहें, उनकी सुनें और सरकार के कामों का ढिंढोरा पीटने के बजाय जमीनी सच्चाई के आधार पर संवाद स्थापित करें। इस प्रकार की अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बैठकें यह साबित करती हैं कि संघ और भाजपा का सांगठनिक ढांचा अपनी रणनीतियों को समय के अनुसार ढालने में कितना माहिर है।
अंत में यह कहा जा सकता है कि लखनऊ में हुई संघ और बीजेपी की यह समन्वय बैठक महज एक सामान्य औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि यह आगामी राजनीतिक संघर्षों के लिए एक फुलप्रूफ रणनीति तैयार करने का बड़ा मंच था। “विपक्ष के नैरेटिव में न फंसने” का जो स्पष्ट संदेश पदाधिकारियों को दिया गया है, वह इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में पार्टी और अधिक आक्रामक, आश्वस्त और सकारात्मक एजेंडे के साथ जनता के बीच उतरने वाली है। जब संगठन के दो सबसे बड़े स्तंभ एक मंच पर आकर इस तरह का वैचारिक और रणनीतिक मंथन करते हैं, तो उसका असर प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों व्यवस्थाओं पर साफ दिखाई देता है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जमीन पर उतरे इन निर्देशों का धरातल पर कितना असर होता है और क्या बीजेपी व संघ का यह नया सियासी दांव विपक्ष के सभी गढ़ों को भेदने में कितना कामयाब हो पाता है।
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