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भारी डीजल वाहनों पर सरकार की सख्ती: 3500 किलो से ऊपर की गाड़ियों में RECD लगाना होगा अनिवार्य, MoRTH ने जारी किया नया ड्राफ्ट नियम

देश के प्रमुख शहरों और राजमार्गों पर बढ़ते वायु प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने भारी डीजल वाहनों को लेकर कड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने एक नया मसौदा (ड्राफ्ट नियम) जारी किया है, जिसके तहत 3,500 किलोग्राम (3.5 टन) से अधिक सकल वाहन भार (Gross Vehicle Weight) वाले भारी डीजल वाहनों में रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइस (RECD) लगाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा गया है। यह कदम पुराने और भारी वाणिज्यिक वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं, विशेष रूप से पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5 और PM 10) को सीधे साइलेंसर और एग्जॉस्ट स्तर पर ही रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है।

प्रस्तावित नियमों के लागू होने के बाद ट्रकों, बसों और भारी मालवाहक वाहनों के मालिकों को अपने वाहनों में यह प्रदूषण नियंत्रण किट लगवानी होगी। सरकार का मानना है कि केवल नई गाड़ियों के मानकों में सुधार करने से प्रदूषण पूरी तरह नहीं रुकेगा, बल्कि सड़कों पर पहले से दौड़ रहे लाखों भारी डीजल वाहनों के उत्सर्जन को कम करना भी बेहद जरूरी है।

सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह नया नियम मुख्य रूप से कंप्रेशन इग्निशन (Compression Ignition) यानी डीजल इंजन से चलने वाले M और N कैटेगरी के मोटर वाहनों पर लागू होगा। ऑटोमोटिव मानकों के मुताबिक M कैटेगरी में यात्रियों को ले जाने वाली बसें और भारी वैन आती हैं, जबकि N कैटेगरी में माल ढुलाई के काम में लगे मीडियम और हेवी कमर्शियल ट्रक, ट्रेलर और डंपर शामिल होते हैं।

प्रस्ताव के अनुसार, जिस भी डीजल वाहन का ग्रॉस व्हीकल वेट 3,500 किलोग्राम से अधिक होगा, उसमें तय मानकों के अनुरूप RECD डिवाइस को रेट्रोफिट यानी बाद में फिट कराना आवश्यक होगा। इससे पहले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में डीजल जनरेटर (DG Sets) के लिए आरईसीडी अनिवार्य किया जा चुका था, लेकिन अब इसे सीधे भारी व्यावसायिक वाहनों की पूरी श्रेणी पर लागू करने की रूपरेखा तैयार की गई है।

सरकार ने इस व्यवस्था को कानूनी दर्जा देने के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली, 1989 (CMVR) में संशोधन का खाका खींचा है। ड्राफ्ट के तहत नियमों में एक नया नियम ‘115-DA’ जोड़ा जाएगा। इस नियम के तहत भारी डीजल वाहनों में उत्सर्जन नियंत्रण उपकरण लगाने की वैधानिक बाध्यता तय की जाएगी और इसके बिना वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट या पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल (PUC) रिन्यू कराने में बाधा आ सकती है।

ड्राफ्ट में स्पष्ट किया गया है कि वाहनों में लगाए जाने वाले RECD उपकरण भारतीय ऑटोमोटिव मानक AIS-228 के अनुरूप प्रमाणित होने चाहिए। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) या इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी (ICAT) जैसी मान्यता प्राप्त एजेंसियों द्वारा स्वीकृत डिवाइस ही गाड़ियों में मान्य होंगे। साथ ही, AIS-228 मानक में भविष्य में होने वाले तकनीकी बदलाव और संशोधन भी इन रेट्रोफिट उपकरणों पर स्वत: लागू होंगे।

रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइस (RECD) एक आधुनिक आफ्टर-ट्रीटमेंट मैकेनिकल व केमिकल फिल्टर सिस्टम होता है, जिसे वाहन के एग्जॉस्ट पाइप (साइलेंसर) में स्थापित किया जाता है। जब इंजन से डीजल जलने के बाद धुआं बाहर निकलता है, तो यह उपकरण उस जहरीले धुएं को वायुमंडल में फैलने से पहले ही शुद्ध कर देता है।

इस तकनीक में डीजल ऑक्सीडेशन कैटलिस्ट (DOC) और डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर (DPF) जैसे फिल्टर लगे होते हैं। यह उपकरण डीजल धुएं में मौजूद हानिकारक पार्टिकुलेट मैटर (काजल और कालिख) को 70 से 90 प्रतिशत तक सोख लेता है। इसके अलावा कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और हाइड्रोकार्बन (HC) जैसी जहरीली गैसों को कम हानिकारक तत्वों में बदलकर बाहर निकालता है। इससे इंजन की मूल संरचना या ईंधन खपत पर कोई खास असर डाले बिना उत्सर्जन को बीएस-6 मानकों के करीब लाया जा सकता है।

इस नियम के प्रस्ताव से पर्यावरण विशेषज्ञों ने राहत की सांस ली है, लेकिन कमर्शियल ट्रांसपोर्ट सेक्टर में चिंता भी बढ़ गई है। ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि भारी ट्रकों और बसों में इस तरह के प्रमाणित उपकरण लगाने पर प्रति वाहन अतिरिक्त वित्तीय लागत आएगी। इसके अलावा पुराने वाहनों के रखरखाव का खर्च भी बढ़ेगा।

मंत्रालय ने साफ किया है कि यह अभी केवल ड्राफ्ट नोटिफिकेशन (प्रस्ताव) है और इसे अंतिम रूप देने से पहले सभी हितधारकों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा। सरकार ने गजट में अधिसूचना प्रकाशित होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर आम जनता, ट्रांसपोर्ट यूनियनों, वाहन निर्माताओं और विशेषज्ञों से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए हैं। 30 दिनों की अवधि पूरी होने और प्राप्त सुझावों की समीक्षा के बाद ही अंतिम नियम को देश भर में लागू करने की तारीख तय की जाएगी।