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चीन-पाकिस्तान का नया पैंतरा: इस्लामाबाद में बनाया ‘ज्वाइंट बाउंड्री कमीशन’

भारत के दो पड़ोसी मुल्क—चीन और पाकिस्तान—एक बार फिर भारतीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर चोट करने की नई साजिश को लेकर आमने-सामने आ गए हैं। इस्लामाबाद में पाकिस्तान और चीन के विदेश मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों ने तथाकथित ‘पाकिस्तान-चीन बाउंड्री ज्वाइंट कमीशन’ (Pakistan-China Boundary Joint Commission) की औपचारिक शुरुआत की और इसकी पहली उद्घाटन बैठक आयोजित की।

इस बैठक की सह-अध्यक्षता चीन के विदेश मंत्रालय के सीमा एवं महासागरीय मामलों के उप महानिदेशक ली या (Li Ya) और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में महानिदेशक (चीन) बिलाल महमूद चौधरी ने की। पाकिस्तान ने इसे द्विपक्षीय संबंधों का ‘ऐतिहासिक मील का पत्थर’ बताते हुए दावा किया कि यह आयोग सीमा प्रबंधन (Border Management), संयुक्त सीमा सर्वेक्षण (Joint Border Surveys), सीमा पार व्यापार और दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए काम करेगा। लेकिन जैसे ही इस कमीशन की खबर सार्वजनिक हुई, भारत सरकार ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया और इसे ‘पूरी तरह से गैर-कानूनी और आधारहीन’ करार दिया।

विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस तथाकथित संयुक्त आयोग पर भारत का रुख स्पष्ट करते हुए बेहद सख्त शब्दों में बयान जारी किया। भारत ने साफ कर दिया कि इस आयोग का कोई विधिक या अंतरराष्ट्रीय औचित्य नहीं है।

विदेश मंत्रालय के मुख्य बिंदु:

  • कोई साझा सीमा नहीं: भारत की स्थिति स्पष्ट और अडिग है कि पाकिस्तान और चीन के बीच कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद ही नहीं है। भौगोलिक और कानूनी रूप से दोनों देशों के बीच जो क्षेत्र आता है, वह भारत का अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर और लद्दाख है।

  • पाकिस्तान का कोई अधिकार (Locus Standi) नहीं: पाकिस्तान का भारत के उस भूभाग पर कोई कानूनी हक नहीं है, जिस पर उसने 1947-48 से जबरन और अवैध सैन्य कब्जा (PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान) कर रखा है। जब वह जमीन पाकिस्तान की है ही नहीं, तो वह किसी तीसरे देश के साथ उस पर कोई समझौता या आयोग गठित नहीं कर सकता।

  • अवैध कब्जे की नौटंकी बंद करे और PoK खाली करे: विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा, “इस तरह की नौटंकी (Theatrics) में शामिल होने के बजाय, पाकिस्तान तुरंत अपने अवैध और जबरन कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को खाली करे।”

  • संप्रभुता पर कोई असर नहीं: चीन और पाकिस्तान के बीच अवैध रूप से कब्जाए गए भारतीय क्षेत्रों को लेकर किया गया कोई भी तथाकथित सीमा सहयोग न तो भारत को स्वीकार्य है और न ही इससे इन क्षेत्रों पर भारत की संप्रभुता पर कोई रत्ती भर फर्क पड़ेगा।

इस पूरे विवाद की जड़ 63 साल पुराने एक अवैध समझौते से जुड़ी है। 1962 में भारत-चीन युद्ध के ठीक बाद, पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ बीजिंग के साथ सांठगांठ मजबूत करने के लिए 2 मार्च 1963 को तथाकथित ‘चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता’ (Sino-Pakistan Agreement 1963) किया था।

इस समझौते के तहत:

  • पाकिस्तान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में स्थित शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) की लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर रणनीतिक भारतीय भूमि अवैध रूप से चीन को ‘तोहफे’ के रूप में सौंप दी थी।

  • भारत ने उस समय भी संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस समझौते का कड़ा विरोध किया था और इसे गैर-कानूनी करार दिया था।

  • समझौते के अनुच्छेद 6 में खुद यह लिखा गया था कि जब कभी कश्मीर विवाद का अंतिम निपटारा होगा, तब इस सीमा का नए सिरे से संप्रभु देश के साथ पुनर्निर्धारण किया जाएगा। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान लगातार इस अवैध समझौते की आड़ में निर्माण कार्य और सीमा प्रबंधन के हथकंडे अपनाते रहे हैं।

इस विवादित क्षेत्र के कानूनी और रणनीतिक आयामों को इस तालिका के जरिए समझा जा सकता है:

विवाद का पहलू चीन-पाकिस्तान का दावा / कार्रवाई भारत की संवैधानिक एवं कानूनी स्थिति
भौगोलिक स्थिति पीओके व गिलगित-बाल्टिस्तान को साझा सीमा मानते हैं पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं; यह भारत का लद्दाख/कश्मीर है
1963 का समझौता दोनों देशों ने सीमांकन का आधार माना भारत ने इसे कभी मान्यता नहीं दी; यह पूरी तरह ‘अवैध और शून्य’ है
शक्सगाम घाटी (5,180 sq km) चीन इसे अपना संप्रभु इलाका मानता है भारतीय क्षेत्र, जिसे पाकिस्तान ने अवैध रूप से चीन को सौंपा था
नया बाउंड्री कमीशन सीमा सर्वेक्षण, व्यापार व कनेक्टिविटी के लिए गठित कब्जे को वैध बनाने की नाकाम कोशिश; पूरी तरह अस्वीकार्य
CPEC इंफ्रास्ट्रक्चर काराकोरम हाईवे और आर्थिक गलियारा निर्माण भारतीय संप्रभुता का खुला उल्लंघन; भारत लगातार विरोध दर्ज कराता रहा है

रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस समय ‘ज्वाइंट बाउंड्री कमीशन’ को सक्रिय करने के पीछे चीन और पाकिस्तान के गहरे रणनीतिक और सामरिक हित छिपे हैं:

  • 1. अवैध कब्जे को ‘वैश्विक मान्यता’ दिलाने की कोशिश: दोनों देश संयुक्त आयोग और औपचारिक बैठकों के जरिए दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके बीच एक वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा है। ऐसा करके वे संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय के सामने अवैध कब्जे को ‘स्थायी यथास्थिति’ (Legitimise Illegal Occupation) के रूप में पेश करना चाहते हैं।

  • 2. CPEC और काराकोरम हाईवे की सुरक्षा: 62 अरब डॉलर का ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPEC) सीधे गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके से होकर गुजरता है। हाल के दिनों में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में चीनी इंजीनियरों पर हुए आत्मघाती हमलों के बाद चीन बेहद घबराया हुआ है। वह सीमा प्रबंधन और संयुक्त गश्त के नाम पर अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और चीनी सुरक्षा एजेंसियों की मौजूदगी को इस इलाके में आधिकारिक कवच देना चाहता है।

  • 3. शक्सगाम घाटी में चीनी सैन्य निर्माण: हाल ही में सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ था कि चीन शक्सगाम घाटी में सियाचिन ग्लेशियर के बिल्कुल करीब नई पक्की सड़कें, हेलीपैड और सैन्य चौकियां बना रहा है। इस बाउंड्री कमीशन के जरिए चीन इस निर्माण कार्य को कानूनी जामा पहनाना चाहता है।

  • 4. भारत के खिलाफ ‘टू-फ्रंट वॉर’ का संयुक्त तंत्र: पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी सैन्य तनाव के बीच काराकोरम पास के पश्चिमी छोर पर चीन और पाकिस्तान का साझा तालमेल भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए दोहरे मोर्चे (Two-Front Threat) की चुनौती को बढ़ाने की सोची-समझी साजिश है।

भारत सरकार ने इस मामले पर जिस तल्खी के साथ जवाब दिया है, वह नई दिल्ली की बदलती और आक्रामक विदेश नीति का परिचायक है। 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद भारत ने संसद के दोनों सदनों में पारित संकल्प को पुनः दोहराया है कि पूरा पीओके और अक्साई चिन भारत का अविभाज्य अंग है।

भारत ने साफ संकेत दे दिया है कि बीजिंग और इस्लामाबाद चाहे जितने आयोग बना लें या कागजी समझौते कर लें, जमीनी और अंतरराष्ट्रीय कानून की हकीकत नहीं बदलेगी। भारत न केवल सीपीईसी के किसी भी विस्तार का विरोध करता रहेगा, बल्कि गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके में किसी भी तीसरे पक्ष के दखल को अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला मानेगा। भारत का स्पष्ट संदेश है कि सीमा पर शांति की बात करने वाले चीन को पहले भारत की संवेदनशीलता और क्षेत्रीय सीमाओं का सम्मान करना सीखना होगा।