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Apple iOS 18 Update Controversy: 75 शिकायतों के बाद Apple पर भारत सरकार का बड़ा एक्शन! CCPA ने शुरू की विस्तृत जांच; क्या iPhone यूजर्स को वापस मिलेंगे स्क्रीन रिपेयरिंग के ₹27,900?

दुनिया की सबसे मूल्यवान टेक कंपनियों में शुमार एप्पल (Apple) के लिए भारतीय बाजार में मुश्किलें अचानक बढ़ गई हैं। भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अधीन काम करने वाली सर्वोच्च नियामक संस्था केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने एप्पल के खिलाफ अपनी जांच को हाई-लेवल पर ले जाते हुए ‘डिटेल इन्वेस्टिगेशन’ (विस्तृत जांच) का आदेश दे दिया है। पूरा विवाद एप्पल के ऑपरेटिंग सिस्टम अपडेट ‘iOS 18’ के रोलआउट और उसके बाद आईफोन यूजर्स के साथ हुई कथित नाइंसाफी से जुड़ा हुआ है। देश भर के अलग-अलग शहरों—जैसे दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ—से आईफोन उपभोक्ताओं ने राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन और प्राधिकरण के पास आधिकारिक शिकायतें दर्ज कराई थीं। कुल 75 औपचारिक शिकायतों का संज्ञान लेते हुए सीसीपीए ने माना है कि यह मामला केवल कुछ व्यक्तियों का नहीं, बल्कि ‘उपभोक्ताओं के एक संपूर्ण वर्ग’ (Consumers as a Class) के अधिकारों के हनन का है। नियामक ने अपनी जांच शाखा (Investigation Wing) को निर्देश दिया है कि वह एप्पल की सॉफ्टवेयर वारंटी शर्तों और सर्विस सेंटर पर ग्राहकों से वसूले जाने वाले भारी-भरकम चार्ज की बारीकी से पड़ताल करे।

उपभोक्ताओं की शिकायतों की जड़ में वह तकनीकी खामी है जो आईफोन में आधिकारिक iOS 18 अपडेट इंस्टॉल करने के बाद सामने आई। ग्राहकों का आरोप है कि फोन में जैसे ही नया ऑपरेटिंग सिस्टम अपडेट किया गया, डिस्प्ले पर अचानक हरी, गुलाबी या सफेद धारियां (Green, Pink, or White Lines) उभर आईं, जिससे स्क्रीन पूरी तरह खराब हो गई। इसके अतिरिक्त, कई मॉडलों में माइक्रोफोन ने काम करना बंद कर दिया और कॉल के दौरान आवाज आना-जाना पूरी तरह ठप हो गया। जब पीड़ित उपभोक्ता अपने फोन को लेकर एप्पल के अधिकृत सर्विस सेंटर्स (Authorised Service Centers) पर पहुंचे, तो उन्हें भारी वित्तीय झटका लगा। कंपनी के सर्विस इंजीनियरों ने यह कहकर फ्री रिपेयरिंग या वारंटी देने से साफ इनकार कर दिया कि एप्पल की वारंटी पॉलिसी केवल हार्डवेयर तक सीमित है और सॉफ्टवेयर से जुड़े किसी भी नुकसान को कवर नहीं करती। स्थिति यह बनी कि आईफोन 15 (iPhone 15) की नई स्क्रीन डलवाने के लिए ग्राहकों से लगभग 27,900 रुपये (करीब 291 डॉलर) तक का बिल वसूला गया, जो कि उस स्मार्टफोन की कुल मूल कीमत के एक-तिहाई से भी अधिक है। ग्राहकों का कहना है कि जब उन्होंने फोन में बाहर से कोई छेड़छाड़ नहीं की और खराबी सीधे कंपनी के आधिकारिक अपडेट से आई, तो फिर जेब से इतना भारी खर्च क्यों कराया गया।

उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने एप्पल की इस कार्यप्रणाली को ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ (Unfair Trade Practice) और निष्पक्ष व्यापार सिद्धांतों का खुला उल्लंघन माना है। एप्पल को भेजे गए आधिकारिक नोटिस में सीसीपीए ने सख्त लहजे में सवाल उठाया कि ‘यदि कंपनी के अपने सॉफ्टवेयर अपडेट या तकनीकी लापरवाही के कारण किसी डिवाइस की कार्यक्षमता नष्ट होती है, तो उसका आर्थिक बोझ निर्दोष उपभोक्ता पर क्यों डाला जाना चाहिए?’ नियामक का मानना है कि सॉफ्टवेयर अपडेट्स को तकनीकी सुधार, सुरक्षा पैच और बेहतर परफॉर्मेंस के नाम पर यूजर्स को पुश किया जाता है। ऐसे में यदि उस आधिकारिक अपडेट के बाद फोन के कोर कंपोनेंट्स (जैसे डिस्प्ले या माइक) काम करना बंद कर देते हैं, तो कंपनी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। सीसीपीए इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या एप्पल अपने यूजर लाइसेंस एग्रीमेंट में जानबूझकर ऐसी भ्रामक और एकतरफा शर्तें जोड़ता है जिससे उपभोक्ता कानूनी रूप से लाचार हो जाएं।

इस मामले में एप्पल ने नियामकों के आरोपों का जोरदार खंडन किया है और जांच के औचित्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसी को भेजे गए अपने 20 अगस्त के औपचारिक जवाब में एप्पल ने स्पष्ट किया कि उसने भारत में iOS 18 के साथ किसी भी प्रकार की ‘सिस्टमैटिक’ (व्यापक या बुनियादी) तकनीकी विसंगति या सुरक्षा खतरे की पहचान नहीं की है। कंपनी ने दलील दी कि भारत में मौजूद करोड़ों आईफोन यूजर्स के मुकाबले केवल 75 शिकायतों का आधार बनाकर पूरे ऑपरेटिंग सिस्टम को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। एप्पल के अनुसार, जून 2026 तक केवल 11 फीसदी आईफोन ही iOS 18 पर चल रहे थे। वारंटी शर्तों के बचाव में टेक दिग्गज ने कहा कि सॉफ्टवेयर लाइसेंस एग्रीमेंट में स्पष्ट लिखा होता है कि सॉफ्टवेयर ‘बिना किसी वारंटी’ (Without warranty of any kind) के दिया जाता है और यह नीति पूरी वैश्विक इंडस्ट्री का मानक है। एप्पल ने सैमसंग और सोनी जैसी अन्य दिग्गज कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी कंपनी को सॉफ्टवेयर अपडेट से जुड़े हर जोखिम की पूर्ण वारंटी देने पर मजबूर किया जाएगा, तो कोई भी टेक कंपनी सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर के बजाय पूरे तकनीकी जोखिम की ‘बीमा कंपनी’ (Insurer) बनकर रह जाएगी।

यह जांच एप्पल के लिए ऐसे संवेदनशील मोड़ पर सामने आई है जब भारत उसके वैश्विक कारोबार का सबसे बड़ा और रणनीतिक केंद्र बन चुका है। काउंटरपॉइंट रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय स्मार्टफोन बाजार में एप्पल की हिस्सेदारी 2022 के लगभग 4 फीसदी से बढ़कर 2025 में 9 फीसदी तक पहुंच चुकी है। भारत में आईफोन का निर्माण (Made in India iPhones) तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के संयंत्रों में रिकॉर्ड स्तर पर हो रहा है। ऐसे में उपभोक्ता अधिकारों को लेकर सरकार की यह सख्ती एप्पल की ब्रांड छवि और प्रीमियम ग्राहकों के भरोसे को चोट पहुंचा सकती है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि सीसीपीए की जांच विंग अपनी अंतिम रिपोर्ट में एप्पल के वारंटी क्लॉज को गैर-कानूनी और उपभोक्ता-विरोधी पाती है, तो नियामक के पास उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत कंपनी पर भारी वित्तीय जुर्माना लगाने, प्रभावित ग्राहकों को रिपेयरिंग का पूरा पैसा रिफंड करने का आदेश देने और वारंटी नियमों में बदलाव करने का स्पष्ट अधिकार है। इसके अलावा, एप्पल पहले से ही भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के एंटीट्रस्ट जांच के दायरे में भी है।

यह पूरा कानूनी विवाद केवल 75 ग्राहकों की स्क्रीन बदलने का नहीं है, बल्कि दुनिया भर के टेक इकोसिस्टम के लिए एक नजीर बन सकता है। अब तक टेक कंपनियां अपने जटिल ‘एंड यूजर लाइसेंस एग्रीमेंट’ (EULA) की आड़ में सॉफ्टवेयर से होने वाले किसी भी हार्डवेयर डैमेज की जिम्मेदारी से बचती रही हैं। लेकिन भारतीय कानून के तहत यदि यह साबित होता है कि कंपनी द्वारा जारी किया गया अपडेट ही हार्डवेयर के खराब होने का प्राथमिक कारण था, तो ग्राहक उपभोक्ता आयोग (Consumer Court) में मुआवजे के हकदार होंगे। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी अनुबंध की एकतरफा और अनुचित शर्तें भारतीय उपभोक्ता संरक्षण कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं। यदि सीसीपीए एप्पल को अपनी सॉफ्टवेयर वारंटी पॉलिसी बदलने के लिए बाध्य करता है, तो यह वैश्विक स्तर पर स्मार्टफोन कंपनियों के रवैये को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा। आने वाले महीनों में जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष यह तय करेगा कि भारत में प्रीमियम गैजेट्स खरीदने वाले आम नागरिकों को विदेशी कंपनियों की मनमानी शर्तों से वास्तविक सुरक्षा कैसे मिलेगी।