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18वें ब्रिक्स समिट में सर्वसम्मति से पारित हुआ ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’, पीएम मोदी के कूटनीतिक संदेश ने दुनिया को चौंकाया

वैश्विक स्तर पर जारी गंभीर भू-राजनीतिक उथल-पुथल, चौथे साल में खिंच चुके रूस-यूक्रेन सैन्य गतिरोध, लाल सागर से लेकर खाड़ी क्षेत्र तक फैले पश्चिम एशिया के भीषण संकट और वाशिंगटन में ट्रंप प्रशासन की आक्रामक टैरिफ नीतियों के साए में भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता के साथ संपन्न हुआ। सम्मेलन की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि सभी सदस्य देशों द्वारा पूर्ण सहमति से ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ को अंगीकार किया जाना रहा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषक सम्मेलन से पहले यह कयास लगा रहे थे कि चीन, रूस, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और खाड़ी देशों के आंतरिक अंतर्विरोधों के कारण कोई साझा प्रस्ताव पारित होना नामुमकिन होगा, लेकिन भारतीय कूटनीति के कुशल संचालन ने इन सभी आशंकाओं पर पूर्ण विराम लगा दिया।

शिखर सम्मेलन के उद्घाटन और पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियादी विसंगतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों के मौजूदा ढांचे को ‘विशेषाधिकारों का पिरामिड’ करार दिया, जहां कुछ चुनिंदा शक्तिशाली देश बाकी दुनिया के भविष्य का फैसला अपने संकीर्ण हितों के आधार पर करते हैं। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब इस असंतुलित पिरामिड को ध्वस्त करके समानता और आपसी सम्मान पर आधारित ‘साझेदारी का मंच’ खड़ा किया जाए। भारत का यह विजन केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में मानव कल्याण, सतत विकास और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व होना अनिवार्य है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ब्रिक्स ब्लॉक को लगातार खारिज करने, इसे प्रभावहीन बताने और सदस्य राष्ट्रों पर दंडात्मक सीमा शुल्क लगाने की खुली चेतावनियों के बावजूद नई दिल्ली के मंच ने एक सर्वथा विपरीत और सशक्त संदेश दिया। सदस्य देशों ने स्पष्ट किया कि दुनिया अब किसी एकध्रुवीय दबाव में काम करने वाली नहीं है। नई दिल्ली घोषणापत्र में बहुपक्षवाद, बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय कानून की सर्वोच्चता और राष्ट्रीय संप्रभुता के सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। यह घोषणापत्र इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि व्यापारिक प्रतिबंधों और टैरिफ की दीवारों के जरिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बंधक नहीं बनाया जा सकता, बल्कि संवाद और नियम-आधारित व्यवस्था ही आर्थिक स्थिरता का एकमात्र आधार है।

सम्मेलन के दौरान यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि ब्रिक्स अब केवल कुछ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की वार्षिक चाय-नाश्ता बैठक नहीं रह गया है, बल्कि यह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के ‘ग्लोबल साउथ’ देशों का सबसे बुलंद और संगठित मंच बन चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने रेखांकित किया कि विकासशील और अल्पविकसित देशों का ब्रिक्स के प्रति अटूट विश्वास इसलिए लगातार बढ़ रहा है क्योंकि यहां उनकी प्राथमिकताओं, चिंताओं और विकास की जरूरतों को बिना किसी भू-राजनीतिक शर्त के सुना जाता है। ब्लॉक के भीतर मौजूद वैचारिक और भौगोलिक विविधता को किसी कमजोरी के रूप में देखने के बजाय भारत ने इसे ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत और सामूहिक सहमति का इंजन साबित कर दिखाया।

नई दिल्ली का यह कूटनीतिक मंच जटिल अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में संवाद का पुल बनाने में भी बेहद कारगर साबित हुआ। सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूरोपीय देशों को कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि रूस से यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है, बशर्ते उनकी वैध सुरक्षा चिंताओं का सम्मान किया जाए। पुतिन ने यूक्रेन युद्ध की मौजूदा स्थिति पर रूस का रुख अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने स्पष्ट किया। इसके साथ ही, सम्मेलन के समानांतर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई सीधी आमने-सामने की बैठक को कूटनीति की असाधारण उपलब्धि माना जा रहा है। भले ही पश्चिम एशिया के दशकों पुराने विवाद एक रात में हल न हों, लेकिन दोनों क्षेत्रीय शक्तियों का एक ही टेबल पर बैठकर बातचीत करना यह दर्शाता है कि कूटनीतिक रास्ते हमेशा खुले रहते हैं।