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Ganesh Chaturthi 2026 Kalash Sthapana: बप्पा के स्वागत में जरूर स्थापित करें मंगल कलश, स्थापना के समय लोटे में जरूर डालें ये 5 पवित्र चीजें

सनातन धर्म में विघ्नहर्ता, ऋद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव का पावन महापर्व गणेश चतुर्थी पूरे देश में अगाध श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर घरों, पंडालों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में गणपति बप्पा की नई प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। गणेश उत्सव के दौरान भक्त बप्पा की मूर्ति स्थापित करने की तैयारियों में तो लीन रहते हैं, लेकिन कई बार पूजा के सबसे अनिवार्य अंग यानी ‘मंगल कलश स्थापना’ (Kalash Sthapana) के सूक्ष्म नियमों से अनजान रह जाते हैं। वैदिक शास्त्र के अनुसार, बिना कलश स्थापना के कोई भी महापूजा अधूरी मानी जाती है। कलश को तैंतीस कोटि देवी-देवताओं और संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। यदि आप भी इस गणेश चतुर्थी पर घर में गजानन का स्वागत कर रहे हैं, तो कलश स्थापित करते समय उसमें डाली जाने वाली पवित्र वस्तुओं और सही विधि की पूरी जानकारी अवश्य समझ लें।

शास्त्रों में कलश को साक्षात अमृत घट और सुख-समृद्धि का स्रोत कहा गया है। ऋग्वेद और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में देवाधिदेव महादेव, मूल (पेंदी) में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और मध्य भाग में समस्त मातृशक्तियों और देवियों का वास होता है। इसके साथ ही कलश के भीतर भरे जल को पवित्र सप्त नदियों (गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी) का प्रतीक माना जाता है। जब गणेश जी की प्रतिमा के पास विधिपूर्वक कलश स्थापित किया जाता है, तो वह पूजा स्थल की समस्त नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सात्विक तरंगों का संचार करता है। बप्पा के साथ कलश की उपस्थिति घर में धन, आरोग्य, सकारात्मकता और स्थायी शांति सुनिश्चित करती है।

कलश बैठाने से पहले सही धातु के बर्तन का चयन करना जरूरी है। शास्त्रों के अनुसार, पूजा के लिए तांबे (Copper), पीतल (Brass), कांसे या विशुद्ध मिट्टी का कलश ही सर्वोत्तम माना गया है। भूलकर भी स्टील, लोहे, एल्युमिनियम या प्लास्टिक के लोटे का उपयोग पूजा में नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये धातुएं पूजा-पाठ में अशुद्ध मानी गई हैं।

  • स्थान का निर्धारण: भगवान गणेश की चौकी पूजा घर में उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) या पूर्व दिशा में स्थापित करें।

  • कलश की स्थिति: शास्त्रसम्मत नियमों के अनुसार, मंगल कलश को हमेशा भगवान श्री गणेश की प्रतिमा के बाईं ओर (यानी पूजा करने वाले के दाहिने हाथ की तरफ) स्थापित किया जाना चाहिए।

कलश को केवल सादे जल से भरकर नहीं रखा जाता। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उसमें विशिष्ट प्राकृतिक और मांगलिक द्रव्य डाले जाते हैं, जिनके बिना कलश की ऊर्जा जागृत नहीं होती:

  • 1. शुद्ध गंगाजल और अक्षत (चावल): सबसे पहले तांबे के लोटे को शुद्ध जल से भरें और उसमें थोड़ा गंगाजल अवश्य मिलाएं। इसके बाद एक चुटकी बिना टूटे हुए साबुत चावल (अक्षत) डालें। अक्षत को अखंडता और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।

  • 2. सुपारी (Supari): कलश के जल में एक साबुत पूजा की सुपारी डालना अनिवार्य है। सुपारी भगवान गणेश और वरुण देव का साकार स्वरूप मानी जाती है, जो जीवन में स्थिरता और दृढ़ संकल्प लाती है।

  • 3. हल्दी की गांठ या कुमकुम: लोटे के भीतर एक साबुत सूखी हल्दी की गांठ डालें। यदि गांठ उपलब्ध न हो, तो चुटकी भर पिसी हल्दी और कुमकुम मिलाएं। हल्दी बृहस्पति ग्रह का प्रतीक है और यह घर से वास्तु दोषों को मिटाकर सौभाग्य में वृद्धि करती है।

  • 4. सिक्का या चांदी का टुकड़ा: कलश के जल में तांबे, पीतल या चांदी का एक सिक्का (या सामान्य सिक्का) जरूर डालें। जल में धातु का सिक्का डालना धन की देवी माता लक्ष्मी के स्थायी वास और आर्थिक संपन्नता का आह्वान करता है।

  • 5. दूर्वा (दूब घास) और इत्र: भगवान गणेश को दूर्वा अत्यंत प्रिय है। कलश के जल में 5 या 7 गांठ दूर्वा डालें और साथ ही दो बूंद शुद्ध इत्र (गुलाब या चंदन) अर्पित करें। सुगंध और दूर्वा से कलश का जल दिव्य औषधीय ऊर्जा से भर जाता है।

सामग्रियां डालने के बाद कलश को पूर्ण रूप दिया जाता है:

  • स्वास्तिक का अंकन: लोटे के बाहरी हिस्से पर रोली या सिंदूर से शुद्ध ‘स्वास्तिक’ का चिह्न बनाएं और उसके चारों कोनों पर चार बिंदियां लगाएं। कंठ पर कलावा (मौली) कम से कम तीन बार लपेटें।

  • पल्लव (पत्ते) सजाना: कलश के मुख पर आम के 5 या 7 ताजे पत्ते (अशोक या पान के पत्ते भी ले सकते हैं) इस तरह रखें कि पत्तों का सिरा ऊपर और डंठल जल में डूबा रहे।

  • पूर्णपात्र और नारियल: पत्तों के ऊपर एक छोटी कटोरी (पूर्णपात्र) रखें, जिसमें साबुत चावल या गेहूं भरा हो। अब एक जटा वाला सूखा नारियल लें, उसे लाल कपड़े या कलावा में लपेटें।

  • नारियल की सही दिशा: नारियल को पूर्णपात्र के ऊपर इस प्रकार रखें कि उसका मुख (जिस तरफ जटाएं और तीन आंखें होती हैं) साधक या आगे की ओर रहे। नारियल का मुख कभी भी ऊपर या पीछे की तरफ नहीं होना चाहिए।

पूजा की चौकी पर लाल या पीला नया वस्त्र बिछाएं। सबसे पहले कलश स्थापित करने वाले स्थान पर थोड़े से साबुत अक्षत या गेहूं की ढेरी बनाएं, जिसे ‘अष्टदल कमल’ कहा जाता है। इसके बाद अपने हाथ में जल और पुष्प लेकर वरुण देवता और समस्त तीर्थों का आह्वान करें कि वे इस घट में आकर वास करें। इसके बाद कलश को अनाज की उस ढेरी पर आदरपूर्वक स्थापित करें।

कलश स्थापित करने के बाद हाथ में गंध, अक्षत और पुष्प लेकर “ॐ अपां पतये वरुणाय नमः” और “ॐ कलशाय नमः” मंत्र का जप करते हुए कलश पर समर्पित करें। इसके बाद ही भगवान श्री गणेश की षोडशोपचार पूजा (स्नान, वस्त्र, जनेऊ, चंदन, दूर्वा, मोदक, लड्डू और आरती) प्रारंभ करें।

अनंत चतुर्दशी या जितने दिन भी आपके घर बप्पा विराजते हैं, तब तक कलश का जल वहीं स्थापित रहने दें। बप्पा के विसर्जन के बाद कलश के जल को आम के पत्तों से पूरे घर के कमरों और कोनों में छिड़कें। बचा हुआ जल घर के तुलसी के पौधे या किसी पवित्र वृक्ष की जड़ में अर्पित करें। कलश में रखे सिक्के को अपनी तिजोरी या पर्स में सुरक्षित रख लें, यह पूरे साल बरकत बनाए रखता है। सुपारी को पूजा घर में स्थापित रहने दें या विसर्जित कर दें, और अनाज को पक्षियों को खिला दें।