
बिहार की राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर से सुगबुगाहट तेज हो गई है और इस बार चर्चा किसी चुनाव परिणाम या सीट शेयरिंग को लेकर नहीं, बल्कि सूबे की सत्ता और संगठन की धुरी रहे जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नाम को बदलने को लेकर चल रही है। पार्टी के भीतर से ही यह मांग उठने लगी है कि दो दशक से अधिक पुरानी इस पार्टी के नाम से ‘यूनाइटेड’ यानी ‘यू’ को हटाकर इसकी जगह देश और राज्य के जाने-माने समाजवादी नेता के नाम को जोड़ा जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव अमलीजामा पहनता है, तो यह पार्टी के इतिहास में एक बहुत बड़ा वैचारिक और सांगठनिक बदलाव साबित होगा। जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा दिए गए इस अचानक आए प्रस्ताव ने न सिर्फ पार्टी के भीतर बल्कि विरोधी खेमे में भी हलचल पैदा कर दी है। हर कोई यह जानने को बेताब है कि आखिर इस नाम परिवर्तन के कयासों के पीछे पार्टी का कौन सा छिपा हुआ संदेश या सियासी मकसद काम कर रहा है।
#जेडीयू के नाम बदलने की सुगबुगाहट और संजय झा का प्रस्ताव
जनता दल यूनाइटेड के भीतर पार्टी के नाम में संशोधन करने की यह पूरी चर्चा पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा द्वारा दिए गए एक बयान और अपील के बाद शुरू हुई है। खगड़िया में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने खुलकर यह बात कही थी कि पार्टी ने अपने सफर में जो मुकाम हासिल किया है और इसकी जो भी वैचारिक पहचान बनी है, उसके केंद्र में सर्वमान्य नेता का अमूल्य योगदान रहा है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह सुझाव दिया था कि जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू का नाम बदलकर अब ‘जनता दल नीतीश’ कर दिया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद से ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच इस पर प्रतिक्रियाएं आने का सिलसिला शुरू हो गया। पार्टी के कई कद्दावर मंत्रियों और नेताओं ने इस सुझाव का पुरजोर समर्थन करते हुए यह तक कह दिया है कि यह फैसला पूरी तरह से न्यायसंगत है क्योंकि पार्टी की पहचान और उसका अस्तित्व एक ही चेहरे के इर्द-गिर्द घूमता रहा है।
#पार्टी के भीतर समर्थन और वरिष्ठ नेताओं की प्रतिक्रियाएं
जैसे ही संजय झा का यह प्रस्ताव सार्वजनिक हुआ, पार्टी के भीतर इस पर समर्थन और नपे-तुले बयानों का दौर शुरू हो गया। ग्रामीण विकास मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता श्रवण कुमार ने इस सुझाव का खुले दिल से स्वागत किया और यहां तक कह दिया कि इस प्रस्ताव को पार्टी के मंच पर लाकर जल्द से जल्द सर्वसम्मति से पारित किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि पार्टी का हर एक कार्यकर्ता और नेता उसी व्यक्तित्व के नाम और काम के बलबूते राजनीति में पहचान बनाए हुए है। वहीं दूसरी तरफ, राज्य के उपमुख्यमंत्री और पार्टी के पुराने समाजवादी नेता विजेंद्र प्रसाद यादव ने इस मामले पर काफी संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव एक अच्छी सोच और व्यक्तिगत भावना पर आधारित हो सकता है, लेकिन जब यह आधिकारिक रूप से पार्टी के फोरम या संगठन के सामने आएगा, तभी इस पर विधिवत विचार करके कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा। जानकारों का मानना है कि पार्टी के भीतर इस तरह की खुली चर्चा इस बात का संकेत है कि नेतृत्व इसे लेकर एक नई दिशा में सोचने का मन बना रहा है।
#कैसी है पार्टी के नाम बदलने की पूरी प्रक्रिया और इतिहास
यह जानना भी बेहद दिलचस्प है कि वर्तमान जेडीयू का वजूद अस्तित्व में कैसे आया था। आज से करीब तेरह साल पहले यानी 30 अक्टूबर 2003 को जॉर्ज फर्नांडीस और अन्य समाजवादी नेताओं के साथ मिलकर समता पार्टी और शरद यादव के नेतृत्व वाले जनता दल का आपस में विलय हुआ था, जिसके बाद इस नए राजनीतिक दल का नाम ‘जनता दल यूनाइटेड’ रखा गया था। इसके बाद से लगातार पार्टी ने बिहार की राजनीति में एक मजबूत ताकत के रूप में अपनी जगह बनाई। अब यदि पार्टी का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ किया जाता है, तो इसके लिए एक लंबी कानूनी और सांगठनिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। राजनीतिक दलों के नियमों के मुताबिक, किसी भी राष्ट्रीय या प्रांतीय दल को अपना नाम बदलने के लिए सबसे पहले पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में औपचारिक प्रस्ताव पास कराना होता है। इसके बाद पार्टी के संविधान में संशोधन का विवरण और सभी बड़े पदाधिकारियों के समर्थन का हलफनामा भारत के चुनाव आयोग को सौंपना पड़ता है। चुनाव आयोग की तमाम तकनीकी और विधिक जांच के बाद ही पार्टी के नए नाम पर अंतिम मुहर लगती है।
#विपक्ष का तीखा हमला और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं
जेडीयू के नाम बदलने की इन चर्चाओं ने विपक्षी दलों को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा थमा दिया है। मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और अन्य राजनीतिक संगठनों ने इस पर तंज कसना शुरू कर दिया है। विपक्षी नेताओं का यह दावा है कि इस तरह की बातें पार्टी के भीतर चल रही आंतरिक उठापटक और भविष्य के राजनीतिक संकट की ओर इशारा करती हैं। राजद के कई नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक कह दिया है कि जो लोग आज पार्टी का नाम बदलने की बात कर रहे हैं, वे असल में संगठन को अंदर से कमजोर कर रहे हैं। हालांकि, जेडीयू के मुख्य प्रवक्ताओं ने इन तमाम विपक्षी दावों को सिरे से खारिज करते हुए दो टूक कहा है कि पार्टी पूरी तरह से एकजुट है और विपक्षी दलों को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। एक तरफ जहां बख्तियारपुर का नाम बदलकर ‘नीतीशपुर’ करने जैसी मांगें पहले से ही हवा में तैर रही थीं, वहीं अब पार्टी के खुद के नाम में बदलाव के इस प्रस्ताव ने राज्य की राजनीति का पारा पूरी तरह से हाई कर दिया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वाकई आने वाले दिनों में जनता दल यूनाइटेड का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ कर दिया जाएगा या फिर यह केवल राजनीतिक चर्चाओं तक ही सीमित रहकर रह जाएगा।
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