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Cyber Crime: मोबाइल में APK फाइल भेजकर करते थे बैंक खाली, CBI के ‘ऑपरेशन चक्र-6’ में 5 बड़े ठग गिरफ्तार; डिजिटल अरेस्ट सिंडिकेट पर शिकंजा

देश भर में पैर पसार चुके संगठित और सीमा पार साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की मुहिम और तेज हो गई है। ‘ऑपरेशन चक्र-6’ के तहत कार्रवाई करते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी ने एक अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े साइबर सिंडिकेट के 5 और मुख्य सदस्यों को गिरफ्तार करने में बड़ी सफलता हासिल की है। यह संगठित गिरोह आम नागरिकों, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और महिलाओं को ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) के जाल में फंसाकर और उनके फोन में मैलिशियस APK (एंड्रॉयड पैकेज किट) फाइल इंस्टॉल करवाकर बैंक खातों से पूरी जीवनभर की जमा-पूंजी उड़ा लेता था।

सीबीआई के अधिकारियों के मुताबिक, जांच एजेंसी को देश के कई हिस्सों से पीड़ितों द्वारा करोड़ों रुपये की ठगी की शिकायतें मिली थीं। तकनीकी निगरानी और डिजिटल फुटप्रिंट्स का गहन विश्लेषण करने के बाद एजेंसी ने दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक के कई ठिकानों पर एक साथ सुनियोजित छापेमारी की। इस दौरान सिंडिकेट के पांचों प्रमुख आरोपियों को रंगे हाथों धर दबोचा गया। इनके पास से भारी मात्रा में विदेशी सिम कार्ड, अत्याधुनिक लैपटॉप, मोबाइल हैंडसेट, फर्जी बैंक पासबुक और दर्जनों म्यूल बैंक खातों के डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं।

जांच में खुलासा हुआ है कि यह गिरोह पारंपरिक कॉल फ्रॉड से कहीं आगे बढ़कर आधुनिक ‘रिमोट एक्सेस ट्रोजन’ और स्पाईवेयर युक्त एपीके (APK) फाइलों का इस्तेमाल कर रहा था। ठग सबसे पहले पीड़ितों को पार्सल में प्रतिबंधित नशीले पदार्थ पकड़े जाने, मनी लॉन्ड्रिंग में नाम आने, बैंक अकाउंट ब्लॉक होने या आयकर विभाग का नोटिस आने का डर दिखाते थे। पीड़ित जब घबरा जाता था, तो जालसाज खुद को सीबीआई, मुंबई पुलिस, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) या प्रवर्तन निदेशालय (ED) का उच्च अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर आते थे।

इसके बाद वे ‘केस वेरिफिकेशन’ या ‘सुरक्षा जांच’ के नाम पर व्हाट्सएप, टेलीग्राम या एसएमएस के जरिए एक फाइल (जैसे CBI_Verify.apk, Police_Clearance.apk या e-Challan.apk) भेजते थे। जैसे ही पीड़ित अपने फोन में उस फाइल को डाउनलोड कर इंस्टॉल करता था, वह फाइल बैकग्राउंड में सक्रिय होकर डिवाइस की तमाम परमिशन—जैसे एसएमएस, कॉल लॉग, कैमरा और कॉन्टैक्ट्स—अपने नियंत्रण में ले लेती थी। इसके बाद पीड़ित के फोन पर आने वाले सभी बैंक ओटीपी (OTP) सीधे ठगों के डार्क वेब सर्वर पर फॉरवर्ड होने लगते थे, जिससे पीड़ित को खाते से पैसे कटने की भनक तक नहीं लगती थी।

सीबीआई की पूछताछ में इस गिरोह की कार्यप्रणाली के कई रोंगटे खड़े कर देने वाले पहलू सामने आए हैं। ठगों ने अपने गुप्त ठिकानों पर असली पुलिस स्टेशन, कस्टम ऑफिस और कोर्ट रूम जैसे सेटअप तैयार कर रखे थे। वीडियो कॉल के दौरान बैकग्राउंड में पुलिस लोगो, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज, वायरलेस सेट की आवाजें और खाकी वर्दी पहने फर्जी पुलिसकर्मी नजर आते थे।

पीड़ित को कैमरे के सामने 24 से 72 घंटों तक लगातार बैठे रहने का दबाव बनाया जाता था, जिसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। ठग दावा करते थे कि यदि उसने कॉल काटी या किसी परिजन को सूचना दी, तो उसे तुरंत जेल भेज दिया जाएगा। डर के इस माहौल में पीड़ित से उसके बैंक खातों, सावधि जमा (FD), म्यूचुअल फंड्स और यहां तक कि जमीन बेचकर जुटाए गए पैसों को ‘आरबीआई सुरक्षा सत्यापन खाते’ के नाम पर ठगों के बताए म्यूल खातों में ट्रांसफर करा लिया जाता था।

सीबीआई का ‘ऑपरेशन चक्र’ भारत में सक्रिय साइबर अपराध नेटवर्कों और उनके विदेशी आकाओं को पूरी तरह ध्वस्त करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इस अभियान के छठे चरण में एजेंसी ने न केवल जमीनी स्तर पर ठगी करने वाले गुर्गों को निशाना बनाया है, बल्कि उन तकनीकी ऑपरेटरों और हवाला ऑपरेटरों को भी दबोचा है जो ठगी के पैसे को क्रिप्टोकरेंसी (USDT) में बदलकर कंबोडिया, म्यांमार और लाओस जैसे देशों में बैठे सिंडिकेट तक पहुंचाते थे।

गिरफ्तार आरोपियों ने फर्जी पहचान पत्रों और गरीबों को कुछ हजार रुपयों का लालच देकर सैकड़ों ‘म्यूल बैंक अकाउंट’ खुलवा रखे थे। ठगी की रकम आते ही उसे कई चरणों में ट्रांसफर किया जाता था ताकि सुरक्षा एजेंसियां पैसे को फ्रीज न करा सकें। सीबीआई अब गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), रिजर्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों के साथ मिलकर इन वित्तीय लेन-देन की फॉरेंसिक जांच कर रही है ताकि पीड़ितों के डूबे हुए पैसे को रिकवर किया जा सके।

सीबीआई और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने आम नागरिकों से सतर्क रहने की सख्त अपील की है। कानून के अनुसार, देश की कोई भी जांच एजेंसी—चाहे वह सीबीआई हो, पुलिस हो या ईडी—कभी भी व्हाट्सएप या स्काइप वीडियो कॉल पर पूछताछ नहीं करती है और न ही कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम का कोई प्रावधान मौजूद है। नागरिकों को साइबर हमलों से सुरक्षित रहने के लिए निम्नलिखित सावधानियों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

कभी भी अनजान नंबरों से व्हाट्सएप, टेलीग्राम या एसएमएस पर आए किसी भी लिंक या ‘.apk’ एक्सटेंशन वाली फाइल पर क्लिक न करें और न ही उसे फोन में इंस्टॉल करें। ऐप केवल आधिकारिक गूगल प्ले स्टोर या एप्पल ऐप स्टोर से ही डाउनलोड करें।

यदि कोई व्यक्ति फोन पर पुलिस अधिकारी बनकर गिरफ्तारी या जेल भेजने की धमकी दे, तो घबराएं नहीं और तुरंत फोन काटकर स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करें। किसी भी वित्तीय फ्रॉड की स्थिति में बिना एक पल गंवाए नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर ‘1930’ पर कॉल करें या आधिकारिक पोर्टल (cybercrime.gov.in) पर शिकायत दर्ज कराएं ताकि समय रहते संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज किया जा सके।