
बिहार की राजधानी पटना से ठीक सामने और वैशाली जिले के प्रशासनिक दायरे में आने वाला ऐतिहासिक ‘राघोपुर दियारा’ इस समय गंगा नदी के भयानक उफान के चलते जल-समाधि ले चुका है। गंगा नदी के दोनों किनारों से घिरे इस विशाल द्वीप प्रखंड की सभी 20 पंचायतों के कुल 74 गांव पूरी तरह बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं। जल संसाधन विभाग और केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, गंगा का जलस्तर लगातार खतरे के निशान से 1.5 से 2 मीटर ऊपर बह रहा है, जिसके चलते नदी की तेज धाराएं तटबंधों और सुरक्षा बांधों को लांघकर सीधे बस्तियों में प्रवेश कर गई हैं। राघोपुर पूर्वी, राघोपुर पश्चिमी, जहांगीरपुर, जुड़ावनपुर बरारी, जुड़ावनपुर करारी, फतेहपुर, चकसिंगार, रामपुर श्यामचंद, बिदुलिया, रुस्तमपुर, शिवनगर, पहाड़पुर, बहरामपुर और तेरसिया सहित सभी पंचायतों के रिहायशी इलाकों में 5 से 8 फीट तक पानी भर चुका है। इस समय पूरा राघोपुर किसी विशाल समुद्र जैसा नजर आ रहा है, जहां जहां तक नजर जाती है, केवल पानी की लहरें और घरों की डूबती छतें ही दिखाई दे रही हैं। जमीनी स्तर पर आवागमन के सभी रास्ते, संपर्क सड़कें, पुलिया और संपर्क मार्ग जलमग्न होकर पूरी तरह कट चुके हैं, जिससे लगभग 3 लाख से अधिक की आबादी मुख्य भूमि से अलग-थलग पड़कर अपने ही घरों में बंधक बन गई है।
राघोपुर में बाढ़ की विभीषिका इतनी भयानक है कि लोगों के घरों के पहले तल (ग्राउंड फ्लोर) पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। बक्से, अनाज की कोठियां, बिस्तर, गैस सिलेंडर और चूल्हे सब कुछ जलमग्न हो चुका है। जान बचाने के लिए ग्रामीण अपने छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को लेकर पक्के मकानों की छतों पर तिरपाल तानकर दिन-रात गुजारने को मजबूर हैं। जिनके पास केवल कच्चे या झोपड़ीनुमा मकान थे, वे अपने घरों के भीतर बांस-बल्ली का ऊंचा मचान बनाकर उस पर बैठे हैं या फिर जान जोखिम में डालकर गांव के ऊंचे टीलों और मंदिरों के चबूतरों पर शरण लिए हुए हैं। क्षेत्र में सबसे बड़ा संकट सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का है। लाखों की आबादी पर प्रशासन द्वारा चलाई जा रही चंद सरकारी नावें ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ साबित हो रही हैं। निजी नाव चालक एक-एक व्यक्ति को पटना के गायघाट या हाजिरपुर के तटीय घाटों तक पहुंचाने के लिए मनमाना किराया वसूल रहे हैं। गरीब और लाचार ग्रामीण, जो पैसे देने में असमर्थ हैं, वे केले के थंब (डोंगा), थर्माकोल और लकड़ी के तख्तों का सहारा लेकर उफनती गंगा की लहरों के बीच से जान हथेली पर रखकर सुरक्षित ठिकानों की ओर निकलने का खतरनाक प्रयास कर रहे हैं।
बाढ़ के इस तांडव के बीच ग्रामीणों के सामने सबसे विकट चुनौती पेट की भूख और गले की प्यास बुझाने की खड़ी हो गई है। गांवों में लगे लगभग सभी सरकारी व निजी चापाकल (हैंडपंप) बाढ़ के गंदे पानी में डूब चुके हैं, जिसके कारण नलों से बदबूदार और दूषित पानी निकल रहा है। मुख्यमंत्री ग्रामीण पेयजल निश्चय योजना (हर घर नल का जल) की पाइपलाइनें और मोटर पंप पानी में डूबकर बंद हो चुके हैं। मजबूरी में लोग उसी बाढ़ के मटमैले और दूषित पानी को फिटकरी या कपड़े से छानकर पीने को विवश हैं, जिससे बच्चों और बुजुर्गों में उल्टी, दस्त, पेचिश और पेट दर्द जैसी जलजनित बीमारियों का प्रकोप तेजी से फैलने लगा है।
इंसानों के साथ-साथ मूक पशुओं की स्थिति और भी ज्यादा हृदयविदारक हो चुकी है। राघोपुर के किसानों की आजीविका का मुख्य आधार दुधारू पशु हैं। सैकड़ों एकड़ में लगी हरी घास, चरी और भूसे के भंडार पानी में सड़ चुके हैं। मवेशियों को रखने के लिए सूखी जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं बचा है। ग्रामीण अपनी गायों और भैंसों को छतों के सहारे या गले तक पानी में बांधकर रखने को मजबूर हैं। चारे और भोजन के अभाव में कई मवेशी भूखे-प्यासे दम तोड़ रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में दुर्गंध फैल रही है और महामारी फैलने का गंभीर अंदेशा पैदा हो गया है।
जल-प्रलय ने राघोपुर के संपूर्ण प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे को पंगु बना दिया है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), अतिरिक्त स्वास्थ्य उप-केंद्र, पंचायत भवन और सभी प्राथमिक व मध्य विद्यालय 4 से 6 फीट पानी में डूब चुके हैं। अस्पतालों में पानी भर जाने से दवाएं और चिकित्सा उपकरण खराब हो चुके हैं, जिससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों का बैठना नामुमकिन हो गया है। यदि किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है या किसी बीमार बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ती है, तो उसे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए कोई स्ट्रेचर या एम्बुलेंस नाव उपलब्ध नहीं है।
इसके साथ ही, बाढ़ का पानी बिजली के सब-स्टेशनों और ट्रांसफार्मरों तक पहुंच जाने के कारण विद्युत आपूर्ति विभाग ने सुरक्षा के लिहाज से पूरे राघोपुर प्रखंड की बिजली काट दी है। पिछले कई दिनों से पूरा दियारा क्षेत्र शाम ढलते ही घने अंधेरे के आगोश में समा जाता है। मोबाइल टावरों का बैकअप खत्म होने से नेटवर्क पूरी तरह गायब हो चुका है, जिससे छतों पर फंसे लोग अपने बाहर रहने वाले परिजनों को अपनी कुशलता तक नहीं बता पा रहे हैं। अंधेरे में बाढ़ के पानी के साथ घरों में घुस रहे जहरीले सांपों, बिच्छुओं और जहरीले कीड़ों के काटने (Snake Bites) की घटनाओं ने ग्रामीणों की दहशत को कई गुना बढ़ा दिया है।
राघोपुर के बाढ़ पीड़ितों में स्थानीय प्रशासन और सरकार के प्रति भारी नाराजगी और आक्रोश देखा जा रहा है। कागजों पर भले ही आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा व्यापक राहत और बचाव के दावे किए जा रहे हों, लेकिन धरातल पर अधिकांश पंचायतों में अब तक सूखा राशन (चूड़ा, गुड़, सत्तू, माचिस, मोमबत्ती) या पॉलीथिन शीट्स का वितरण नहीं पहुंच सका है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बाढ़ आने पर उन्हें इसी तरह उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। इस क्षेत्र से चुनकर आने वाले बड़े राजनीतिक चेहरों और जन प्रतिनिधियों की गैर-मौजूदगी को लेकर भी लोगों में गहरा रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि जब वोट मांगना होता है तो नेता नावों पर बैठकर आते हैं, लेकिन जब पूरा इलाका डूब रहा है और बच्चे दाने-दाने के लिए रो रहे हैं, तो कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है। पीड़ितों ने मांग की है कि सेना, एनडीआरएफ (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) की बड़ी मोटरबोट्स को तुरंत सभी 20 पंचायतों में भेजा जाए, ऊंचे स्थानों पर सरकारी कम्युनिटी किचन (सामुदायिक रसोई) शुरू किए जाएं और मेडिकल टीमों को नावों के जरिए घर-घर भेजकर ओआरएस, क्लोरीन की गोलियां और एंटी-वेनम इंजेक्शन वितरित किए जाएं।
इस तबाही ने राघोपुर के किसानों की आर्थिक रीढ़ को पूरी तरह तोड़ कर रख दिया है। दियारा क्षेत्र अपनी उपजाऊ मिट्टी, बड़े पैमाने पर होने वाली सब्जी की खेती, परवल, मक्का, केला और धान की फसलों के लिए जाना जाता है। हजारों एकड़ में लहलहाती फसलें अब पानी के नीचे सड़ चुकी हैं, जिससे किसानों की महीनों की मेहनत और लाखों रुपये का कर्ज पानी में बह गया है। खेतों के डूबने से कृषि मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट पैदा हो गया है।
बाढ़ का पानी यदि अगले कुछ दिनों तक इसी तरह बना रहा, तो पानी उतरने के बाद सिल्ट (गाद) और कटाव के कारण जमीन के बंजर होने का खतरा भी मंडरा रहा है। राघोपुर की जनता अब केवल तात्कालिक राहत ही नहीं, बल्कि इस सालाना त्रासदी से मुक्ति के लिए स्थायी पक्के बांध, रिंग बांध की मरम्मत और गंगा नदी पर बन रहे पुल के निर्माण को जल्द पूरा करने की मांग कर रही है। जब तक गंगा का जलस्तर शांत नहीं होता और प्रशासनिक मदद जमीन पर नहीं उतरती, तब तक राघोपुर के 74 गांवों के लाखों बाशिंदों के लिए हर गुजरता पल जिंदगी और मौत के बीच की जंग बना हुआ है।
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