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बेगूसराय में बाढ़ का विकराल रूप: वार्ड 18 के 500 से अधिक घरों में घुसा पानी, 10 हजार आबादी पर संकट

बिहार के मध्य और पूर्वी हिस्से में गंगा नदी के रौद्र रूप का कहर अब बेगूसराय जिले के शहरी और उप-शहरी इलाकों में भीषण तबाही मचाने लगा है। जिले के नगर निगम क्षेत्र से सटे निचले हिस्सों और विशेष रूप से वार्ड नंबर 18 में बाढ़ की स्थिति अत्यंत भयावह हो चुकी है। गंगा के लगातार बढ़ते जलस्तर और बैकवाटर के तेज दबाव के कारण सुरक्षा नालों व कल्वर्ट्स के जरिए सैलाब का पानी सीधे रिहायशी बस्तियों में दाखिल हो गया है। देखते ही देखते वार्ड 18 के 500 से अधिक पक्के और कच्चे मकान पानी के आगोश में समा गए हैं। स्थानीय आकलन के अनुसार, इस अप्रत्याशित जल-प्रलय से लगभग 10,000 की घनी आबादी सीधे तौर पर प्रभावित हुई है। सड़कें, संपर्क गलियां, सामुदायिक भवन और आंगनबाड़ी केंद्र 4 से 6 फीट गहरे पानी में डूब चुके हैं। पूरा इलाका किसी बड़ी झील में तब्दील हो चुका है, जिससे मुख्य बाजार और शहर से वार्ड का संपर्क पूरी तरह कट गया है। लोग अपने ही घरों में बंधक बनकर रह गए हैं और सुरक्षित स्थानों तक निकलने के लिए छटपटा रहे हैं।

वार्ड 18 में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि रात के अंधेरे में जब लोग सो रहे थे, तभी पानी अचानक घरों के भीतर घुसने लगा। देखते ही देखते कमरों, दालानों और रसोइयों में 4 से 5 फीट तक मटमैला पानी भर गया। पानी का बहाव इतना तेज था कि लोगों को अपनी गृहस्थी का जरूरी सामान समेटने का मौका तक नहीं मिला। अनाज की बोरियां, गेहूं, चावल, कपड़े, बिस्तर, गैस सिलेंडर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पानी में तैरने लगे। कई कच्चे मकान और मिट्टी की दीवारें पानी के तेज दबाव को नहीं झेल सकीं और भरभराकर गिर गईं।

अपनी जान बचाने के लिए सैकड़ों परिवार अपने छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को लेकर पक्के मकानों की छतों पर शरण लेने को मजबूर हैं। तपती धूप और उमस के बीच खुले आसमान के नीचे पॉलीथिन और तिरपाल तानकर परिवार दिन-रात काट रहे हैं। जिनके पास छत नहीं थी, वे पड़ोसियों के पक्के मकानों पर किसी तरह पनाह लिए हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पिछले कई वर्षों में पानी का ऐसा भयानक फैलाव नहीं देखा था, जिसने कुछ ही घंटों में पूरे मोहल्ले को जलमग्न कर दिया।

बाढ़ के इस तांडव के बीच वार्ड 18 के निवासियों के सामने सबसे गंभीर संकट शुद्ध पेयजल और रोशनी का खड़ा हो गया है। वार्ड के सार्वजनिक और निजी स्तर पर लगे लगभग सभी चापाकल (हैंडपंप) पूरी तरह बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं। नलों से गंदा और बदबूदार पानी निकल रहा है, जिसके कारण लोग एक-एक घूंट पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। कई परिवार बारिश के पानी को बर्तनों में जमा करके या बाढ़ के मटमैले पानी को उबालकर पीने पर मजबूर हैं, जिससे डायरिया, उल्टी, पेट दर्द और त्वचा संक्रमण जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ गया है।

इसके साथ ही, घरों के बिजली मीटर और ट्रांसफार्मरों तक पानी पहुंच जाने के बाद विद्युत विभाग ने जान-माल की सुरक्षा को देखते हुए इलाके की बिजली आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी है। पिछले 48 घंटों से पूरा वार्ड घने अंधेरे में डूबा हुआ है। मोबाइल फोन डिस्चार्ज हो चुके हैं, जिससे लोग आपातकालीन मदद के लिए प्रशासन या अपने रिश्तेदारों से संपर्क तक नहीं साध पा रहे हैं। अंधेरा होते ही पानी के साथ घरों और छतों पर रेंगते हुए जहरीले सांपों, बिच्छुओं और जहरीले कीड़ों के आने से लोगों में दहशत का माहौल है। रातभर लोग लाठी-डंडे हाथ में लेकर जागते हुए पहरा देने को विवश हैं।

वार्ड 18 में रहने वाले अधिकांश लोग मध्यमवर्गीय, दैनिक वेतनभोगी मजदूर, छोटे किसान और पशुपालक हैं। इस जल-प्रलय ने उनकी आजीविका की रीढ़ को तोड़ कर रख दिया है। बाढ़ के पानी में मोहल्ले के दर्जनों गोठान डूब चुके हैं। मवेशियों के लिए रखा गया सूखा भूसा, कुट्टी और पशु आहार पानी में सड़कर बर्बाद हो चुका है। सूखी जमीन का एक टुकड़ा न बचने के कारण लोग अपनी दुधारू गायों और भैंसों को पानी के बीच खूंटे से बांधने या छतों की सीढ़ियों पर चढ़ाने को मजबूर हैं। भूखे-प्यासे मवेशियों की लगातार रंभाने की आवाजें माहौल को और अधिक मार्मिक बना रही हैं।

इसके अतिरिक्त, जो मजदूर रोज कमाकर रोज खाते थे, उनका काम-धंधा पिछले तीन दिनों से पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है। दुकानों और छोटे-मोटे प्रतिष्ठानों में पानी भर जाने से आर्थिक नुकसान लाखों में पहुंच चुका है। लोगों की जेब में पैसे खत्म हो रहे हैं और बाजार तक जाने के लिए कोई सूखा रास्ता नहीं बचा है।

वार्ड 18 के बाढ़ पीड़ितों में स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति गहरा असंतोष और गुस्सा देखा जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बाढ़ का पानी घुसे दो दिन से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस राहत कार्य शुरू नहीं किया गया है। 10 हजार की आबादी के लिए वार्ड में एक भी सरकारी नाव की व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे बीमारों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों या अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके।

मोहल्लेवासियों ने जिला प्रशासन और नगर निगम से मांग की है कि:

  • तत्काल प्रभाव से इलाके में एनडीआरएफ (NDRF) या एसडीआरएफ (SDRF) की मोटरबोट्स तैनात की जाएं ताकि फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।

  • विस्थापित परिवारों के लिए ऊंचे बांध या सड़कों के किनारे तुरंत सरकारी ‘सामुदायिक रसोई’ (Community Kitchen) शुरू की जाए, जहां बच्चों और बड़ों को पका हुआ भोजन मिल सके।

  • सूखा राशन (चूड़ा, मीठा/गुड़, सत्तू, बिस्कुट, माचिस) और वाटरप्रूफ पॉलीथिन शीट्स का घर-घर वितरण सुनिश्चित कराया जाए।

  • स्वास्थ्य विभाग की मोबाइल मेडिकल टीम नावों के माध्यम से ओआरएस के पैकेट, जरूरी दवाइयां, ब्लीचिंग पाउडर और एंटी-वेनम इंजेक्शन लेकर वार्ड में कैंप करे।

  • टैंकरों या नावों के जरिए शुद्ध पेयजल के गैलन और पाउच वितरित किए जाएं ताकि किसी भी महामारी को फैलने से रोका जा सके।

यदि अगले 24 से 48 घंटों में गंगा का जलस्तर कम नहीं हुआ और प्रशासनिक सहायता जमीन पर नहीं पहुंची, तो बेगूसराय के इस वार्ड में मानवीय संकट और अधिक गहरा सकता है।