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जौहर करने वाली महिलाएं कायर थीं’: संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ पर स्वरा भास्कर के इस बयान से भड़के लोग

बॉलीवुड की दुनिया में अपनी बेबाक और स्पष्टवादी शैली के लिए पहचानी जाने वाली अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर अपने एक पुराने बयान और विचारों को लेकर सोशल मीडिया के केंद्र में आ गई हैं। जब भी भारतीय सिनेमा में इतिहास, संस्कृति, परंपरा और नारी सम्मान की बात होती है, तो संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक और भव्य फिल्म ‘पद्मावत’ का जिक्र जरूर आता है। इसी फिल्म के एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक दृश्य—जौहर प्रथा—को लेकर स्वरा भास्कर ने अपनी राय रखते हुए यह कह दिया था कि जौहर करने वाली या खुद को आग के हवाले करने वाली महिलाएं कायर थीं। उनके इस बयान के सामने आते ही इंटरनेट पर भूचाल आ गया था, और आज भी जब इस मुद्दे पर चर्चा होती है, तो लोग खासे नाराज नजर आते हैं। इस विवादित टिप्पणी के बाद से सोशल मीडिया यूजर्स, इतिहास प्रेमियों और फिल्म के प्रशंसकों ने स्वरा भास्कर को आड़े हाथों लेते हुए उनकी सोच पर गंभीर सवाल उठाए हैं और उन्हें जमकर खरी-खोटी सुनाई है। आइए इस पूरे विवाद, स्वरा भास्कर के उस बयान और जनता के बीच मचे बवाल को विस्तार से समझते हैं।

संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘पद्मावत’ में रानी पद्मावती के किरदार और उनके द्वारा किए गए जौहर के ऐतिहासिक प्रसंग को बेहद भव्य और नाटकीय अंदाज में पर्दे पर उतारा गया था। फिल्म के अंत में जब आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी की सेना किले को घेर लेती है, तो रानी पद्मावती के नेतृत्व में सैकड़ों राजपूत महिलाएं अपनी अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए जौहर की अग्नि में कूद जाती हैं। यह दृश्य सिनेमाघरों में मौजूद दर्शकों की आंखें नम कर देने वाला और रोंगटे खड़े कर देने वाला था। भारतीय इतिहास में जौहर को मातृभूमि, स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए बलिदान का एक बड़ा प्रतीक माना जाता है। हालांकि, सिनेमा की दुनिया में जब इस तरह के दृश्यों को कलात्मक रूप से दिखाया जाता है, तो उस पर वैचारिक बहस छिड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जब इस पर बाहरी दृष्टिकोण से तीखी टिप्पणियां की जाती हैं, तो भावनाएं आहत होना भी लाजिमी हो जाता है।

स्वरा भास्कर ने अपनी एक खुली चिट्ठी और इंटरव्यू के दौरान संजय लीला भंसाली की इस फिल्म और जौहर प्रथा की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्हें यह फिल्म देखने के बाद ऐसा महसूस हुआ कि महिलाओं को केवल योनि (vagina) के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि अपनी जान बचाने या परिस्थिति से लड़ने के बजाय आग में कूदकर आत्महत्या कर लेना या जौहर करना किसी भी रूप में वीरता नहीं बल्कि कायरता की निशानी है। उनके इस बयान के सार्वजनिक होते ही देश भर में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। राजपूत संगठनों, ऐतिहासिक शोधकर्ताओं और आम जनता का यह कहना था कि स्वरा भास्कर ने भारतीय इतिहास, राजपूत रानियों के अदम्य साहस और उनके त्याग के बलिदान को पूरी तरह से गलत संदर्भ में पेश किया है। आलोचकों का मानना था कि उस दौर की परिस्थितियों और सामाजिक ताने-बाने को समझे बिना इस तरह के भारी भरकम और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना पूरी तरह से अनुचित और निंदनीय है।

स्वरा भास्कर के इस बयान के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और यूजर्स ने उन्हें बुरी तरह ट्रोल करना शुरू कर दिया। ट्विटर और इंस्टाग्राम पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जो लोग सदियों पुराने इतिहास, संस्कृति और मातृशक्ति के बलिदान के बारे में कुछ नहीं जानते, उन्हें इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयान देने का कोई अधिकार नहीं है। कई यूजर्स ने तो यहां तक कह दिया कि स्वरा भास्कर केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए ऐसे विवादास्पद बयान देती रहती हैं। लोगों ने इतिहास के पन्नों का हवाला देते हुए समझाया कि जौहर कोई मजबूरी या कायरता नहीं बल्कि अपनी पवित्रता और संस्कृति की रक्षा के लिए उठाया गया एक अत्यंत कठोर और साहसिक कदम था। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि जब भी भारतीय सिनेमा में इतिहास और परंपराओं की व्याख्या की जाती है, तो वैचारिक ध्रुवीकरण और जनता की भावनाएं किस हद तक उफन पड़ती हैं, और कलाकार के एक शब्द पर पूरा देश आमने-सामने आ जाता है।