Tuesday , September 1 2026

India Fiscal Deficit Drops: कम हुआ भारत का राजकोषीय घाटा, सरकारी खजाने पर घटा बोझ; टैक्स कलेक्शन में उछाल से सुधरे वित्तीय हालात

भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही और शुरुआती महीनों में देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। मजबूत प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर संग्रह (Direct & Indirect Tax Collection), गैर-कर राजस्व (Non-tax Revenue) में बढ़ोतरी और विवेकपूर्ण खर्च प्रबंधन के चलते सरकारी खजाने पर वित्तीय दबाव काफी कम हुआ है।

लेखा महानियंत्रक (Controller General of Accounts – CGA) द्वारा जारी ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सरकार अपने वार्षिक राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को साधने की दिशा में काफी मजबूत स्थिति में नजर आ रही है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में राजकोषीय घाटे की स्थिति इस प्रकार रही:

  • वार्षिक बजट लक्ष्य का प्रतिशत: चालू वित्त वर्ष के पहले 4 महीनों (अप्रैल-जुलाई/अगस्त अवधि) के दौरान केंद्र का राजकोषीय घाटा पूरे साल के बजट अनुमान (Budget Estimate – BE) के 17.2% से 20% के निचले दायरे में सिमट गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन है।

  • शुद्ध कर प्राप्तियां (Net Tax Receipts): केंद्र सरकार की शुद्ध कर प्राप्तियों में सालाना आधार पर दोहरे अंकों (Double Digit) की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें पर्सनल इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स और रिकॉर्ड जीएसटी (GST) कलेक्शन का अहम योगदान रहा है।

  • आरबीआई डिविडेंड का सहारा: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा सरकार को हस्तांतरित किए गए रिकॉर्ड लाभांश (Dividend) ने भी गैर-कर राजस्व को भारी मजबूती दी है, जिससे सरकार को बाजार से अतिरिक्त उधार लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

राजकोषीय घाटा किसी देश की सरकार की कुल आय (उधार को छोड़कर) और उसके कुल व्यय के बीच का अंतर होता है:

$$\text{राजकोषीय घाटा} = \text{कुल व्यय (Total Expenditure)} – \text{कुल प्राप्तियां (Total Revenue – Borrowings Excluding)}$$

जब सरकार की आमदनी कम और विकास कार्यों, वेतन, सब्सिडी व रक्षा पर खर्च अधिक होता है, तो इस अंतर को पाटने के लिए सरकार को बाजार से कर्ज (Borrowings) लेना पड़ता है। राजकोषीय घाटे में कमी आने का सीधा मतलब है कि सरकार पर नया कर्ज लेने का दबाव घट गया है।

  • मजबूत टैक्स कलेक्शन: अर्थव्यवस्था में औपचारिकरण (Formalisation) और सख्त अनुपालन के चलते कॉरपोरेट एडवांस टैक्स और पर्सनल इनकम टैक्स फाइलिंग में ऐतिहासिक उछाल आया है।

  • जीएसटी में निरंतर स्थिरता: हर महीने औसतन ₹1.80 से ₹1.90 लाख करोड़ से अधिक का जीएसटी संग्रह सरकारी खजाने को लगातार तरलता प्रदान कर रहा है।

  • सब्सिडी का तर्कसंगत प्रबंधन: उर्वरक (Fertilizer) और खाद्य सब्सिडी के डिजिटल वितरण से लीकेज कम हुआ है, जिससे गैर-योजनागत खर्चों में बचत हुई है।

  • संतुलित पूंजीगत व्यय (Capex): सरकार ने हाईवे, रेलवे और पोर्ट्स जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर कैपेक्स की गति को बनाए रखते हुए अनावश्यक राजस्व खर्चों पर कड़ा नियंत्रण रखा है।

राजकोषीय घाटे में गिरावट पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत संकेत है:

  • सॉवरेन रेटिंग में सुधार: अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां (जैसे Moody’s, S&P, Fitch) भारत की राजकोषीय स्थिति को देखकर देश की रेटिंग अपग्रेड करने पर सकारात्मक रुख अपना सकती हैं, जिससे विदेशी निवेश (FDI/FPI) का प्रवाह बढ़ेगा।

  • मुद्रास्फीति (महंगाई) पर नियंत्रण: सरकार द्वारा बाजार से कम उधारी लेने से बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) पर दबाव नहीं बनता, जिससे ब्याज दरें स्थिर रहती हैं और महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।

  • प्राइवेट सेक्टर को फंड्स की आसान उपलब्धता: जब सरकार बाजार से कम कर्ज उठाती है, तो बैंकों के पास प्राइवेट कंपनियों और उद्योगों को नए निवेश के लिए कर्ज देने के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी उपलब्ध रहती है।

सरकार का लक्ष्य मध्यम अवधि में देश के राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.5% से नीचे लाने का है, और वर्तमान वित्तीय आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था वित्तीय अनुशासन (Fiscal Consolidation) के रास्ते पर मजबूती से आगे बढ़ रही है।