
बिहार की राजनीति में आरक्षण की समीक्षा और क्रीमी लेयर को लेकर छिड़ा विवाद अब बेहद आक्रामक मोड़ ले चुका है. इस पूरे सियासी घमासान में अब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के परिवार की सीधी और तीखी एंट्री हो चुकी है. सिंगापुर से लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया के जरिए केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान पर बड़ा हमला बोला है. रोहिणी आचार्य के इस तीखे संदेश ने बिहार के राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है. आरक्षण के संवेदनशील मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल इस मुद्दे को सीधे तौर पर दलितों और पिछड़ों के अधिकारों पर हमले के रूप में पेश कर रहा है. वहीं, एनडीए गठबंधन में शामिल दलित चेहरों चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के स्टैंड को लेकर आरजेडी आक्रामक नजर आ रही है. रोहिणी आचार्य के बयान के बाद यह तय माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार की भावी राजनीति और चुनावी समीकरणों का केंद्र बिंदु बनने जा रहा है.
आरक्षण समीक्षा विवाद में सिंगापुर से रोहिणी आचार्य का तीखा प्रहार, मांझी और चिराग पर दागे सनसनीखेज सवाल
रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक के बाद एक बेहद सख्त और तीखी टिप्पणियां कीं, जिनमें उन्होंने केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान को निशाने पर लिया. रोहिणी ने अपने संदेश में कहा कि जो लोग खुद को दलितों, शोषितों और वंचितों का मसीहा या प्रतिनिधि बताते हैं, वे आज सत्ता की मलाई चाटने के चक्कर में खामोश बैठे हैं या फिर घुमावदार बातें कर रहे हैं. उन्होंने पूछा कि जब आरक्षण के स्वरूप में बदलाव या समीक्षा की बातें की जा रही हैं, तो ये दोनों नेता अपनी चुप्पी क्यों नहीं तोड़ते और खुलकर सड़क से संसद तक विरोध दर्ज क्यों नहीं कराते. रोहिणी आचार्य के इस बयान ने केंद्रीय मंत्रियों को असहज कर दिया है क्योंकि दोनों ही नेता बिहार में दलित और महादलित वोट बैंक का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं. सिंगापुर में रहकर भी बिहार की राजनीति पर अपनी पैनी नजर रखने वाली रोहिणी आचार्य के इस रुख से स्पष्ट है कि लालू परिवार इस मुद्दे को हाथ से जाने नहीं देना चाहता और इसे एनडीए के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक हथियार बनाने में जुट गया है.
जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बयानों से भड़का विवाद, बिहार की राजनीति में क्यों मच गया है सियासी कोहराम
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में उप-वर्गीकरण (Sub-classification) और क्रीमी लेयर (Creamy Layer) को लागू करने के संदर्भ में आई टिप्पणियों के बाद देश भर सहित बिहार में राजनीति गरमा गई है. इस फैसले के बाद जीतन राम मांझी ने कुछ हद तक क्रीमी लेयर के विचार का समर्थन करते हुए कहा था कि जो लोग पीढ़ियों से आरक्षण का लाभ उठाकर मजबूत हो चुके हैं, उन्हें खुद आगे आकर बाकी गरीब भाई-बहनों के लिए जगह छोड़नी चाहिए. दूसरी तरफ चिराग पासवान ने पहले तो क्रीमी लेयर का विरोध किया था, लेकिन एनडीए सरकार में मंत्री पद पर रहते हुए उनके बयानों के विरोधाभास को विपक्ष भुनाने में लगा है. आरजेडी का आरोप है कि मांझी और चिराग दोनों ही नेता सत्ता के साथ समझौता कर चुके हैं और वे केंद्र की बीजेपी सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं. इसी दोहरे रवैये को लेकर आरजेडी नेताओं ने इन दोनों नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और जनता के बीच जाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि असली सामाजिक न्याय केवल लालू प्रसाद यादव की विचारधारा ही दे सकती है.
लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की आरजेडी का रुख: दलित और पिछड़े आरक्षण के मुद्दे पर आर-पार के मूड में विपक्ष
राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने हमेशा से ही मंडल आयोग, सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दे को अपनी राजनीति की मुख्य धुरी बनाया है. जब से आरक्षण समीक्षा की बहस शुरू हुई है, तेजस्वी यादव ने स्पष्ट किया है कि आरजेडी किसी भी कीमत पर आरक्षण की सीमा या उसकी मूल भावना से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगी. पार्टी का स्पष्ट रुख है कि देश में जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए और जिसकी जितनी आबादी है, उसको उसी अनुपात में हक मिलना चाहिए. आरजेडी नेताओं का मानना है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दल संवैधानिक संस्थाओं और अदालती बयानों के सहारे धीरे-धीरे आरक्षण के ढांचे को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं. लालू परिवार इस बात को समझता है कि बिहार में अति पिछड़े, यादव और दलित मतदाताओं का एक बड़ा धड़ा इस मुद्दे को लेकर बेहद संवेदनशील है, और यदि इस मुद्दे पर हमला तेज किया गया तो एनडीए के भीतर शामिल दलित नेताओं को रक्षात्मक होना पड़ेगा.
बिहार विधानसभा चुनावों से पहले आरक्षण के मुद्दे पर सामाजिक और कूटनीतिक ध्रुवीकरण की नई स्क्रिप्ट
बिहार में आने वाले समय में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए आरक्षण और सामाजिक न्याय का यह मुद्दा बहुत बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है. राज्य की राजनीति में महादलित और दलित वोटों पर पकड़ बनाने के लिए एनडीए की तरफ से चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे बड़े चेहरे आगे रखे गए हैं. हालांकि, आरजेडी और महागठबंधन के नेता लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि इन दोनों नेताओं की साख को दलित समाज के सामने कमजोर किया जाए. रोहिणी आचार्य के इस नए हमले ने विपक्षी खेमे में एक नई ऊर्जा भर दी है और यह संकेत दे दिया है कि सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी रैलियों तक इस मुद्दे को भुनाया जाएगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एनडीए घटक दल इस मुद्दे पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट नहीं करते हैं, तो उन्हें चुनाव में दलित और पिछड़ा वोट बैंक के असंतोष का सामना करना पड़ सकता है. दूसरी ओर, एनडीए नेता इसे विपक्ष की बौखलाहट और झूठा भ्रम फैलाने का प्रयास बता रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में बिहार का राजनीतिक घटनाक्रम और अधिक रोचक होने वाला है.
girls globe