
खेती-किसानी, पशुपालन और हमारी रोजाना की खान-पान की आदतें सीधे तौर पर हमारी इस धरती और पर्यावरण पर गहरा असर डालती हैं। हम रोजाना जो भी भोजन अपनी प्लेट में परोसते हैं, उसे उगाने, तैयार करने या उत्पादित करने में भारी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों और विशेष रूप से उपजाऊ जमीन की जरूरत पड़ती है। हालांकि, यह इस बात पर पूरी तरह निर्भर करता है कि हम अपनी डाइट में किस प्रकार के खाद्य पदार्थों को शामिल कर रहे हैं। हाल ही में सामने आए वैश्विक आंकड़ों से यह चौंकाने वाला सच सामने आया है कि कुछ खास तरह के भोजनों के उत्पादन में जमीन की खपत बहुत ज्यादा होती है, जबकि कई अन्य चीजें बेहद कम जगह में आसानी से तैयार हो जाती हैं। ऐसे में यह जानना बेहद दिलचस्प और जरूरी हो जाता है कि आखिर हमारी थाली में मौजूद कौन-सी चीजें धरती पर सबसे ज्यादा बोझ डालती हैं।
विजुअल कैपिटलिस्ट (Visual Capitalist) की ओर से जारी किए गए हालिया आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में सबसे ज्यादा जमीन घेरने वाले खाद्य पदार्थों की सूची में लैंब और मटन (यानी भेड़ का मांस) का नाम सबसे ऊपर आता है। इस बात को यदि हम आंकड़ों के जरिए समझें, तो स्थिति और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। केवल लगभग 450 ग्राम (यानी एक पाउंड) लैंब या मटन का उत्पादन करने के लिए औसतन 1,805.6 वर्ग फीट जमीन की आवश्यकता पड़ती है। यह क्षेत्रफल इस सूची में शामिल अन्य सभी खाद्य वस्तुओं की तुलना में सबसे ज्यादा है। भेड़ जैसे जानवर बड़े पैमाने पर प्राकृतिक चरागाहों पर निर्भर होते हैं और उनके लिए उगाई जाने वाली चारा फसलों के कारण खेती योग्य भूमि और जंगलों पर भारी दबाव पड़ता है। यही मुख्य वजह है कि मटन और लैंब इस पर्यावरण और भूमि खपत की दौड़ में सबसे आगे खड़े नजर आते हैं।
इस सूची में दूसरे नंबर पर बीफ का स्थान आता है, जिसके लिए प्रति पाउंड लगभग 1,592.7 वर्ग फीट जमीन की जरूरत होती है। हालांकि, इस आंकड़े में एक बेहद दिलचस्प तकनीकी पहलू यह है कि बीफ कहां से और किस प्रणाली के तहत प्राप्त हो रहा है, उसके आधार पर जमीन की आवश्यकता में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता है। उदाहरण के लिए, वे पशु जो विशेष रूप से केवल मांस के उत्पादन के लिए पाले जाते हैं (जिन्हें स्पेशलाइज्ड बीफ हर्ड कहा जाता है), उनके बीफ के लिए प्रति पाउंड 1,592.7 वर्ग फीट जमीन चाहिए होती है। इसके विपरीत, जो बीफ डेयरी हर्ड यानी दूध देने वाले पशुओं के जीवन चक्र के अंत में प्राप्त होता है, उसके लिए प्रति पाउंड मात्र 211.1 वर्ग फीट जमीन की ही जरूरत पड़ती है, जो कि काफी हद तक कम मानी जाती है।
यह समझने के लिए कि कौन-सा खाद्य पदार्थ पर्यावरण पर कितना दबाव डालता है, आइए नजर डालते हैं उस सूची पर जो प्रति पाउंड उत्पादन के लिए आवश्यक वर्ग फीट जमीन को दर्शाती है:
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लैंब और मटन: 1,805.6 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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बीफ (बीफ हर्ड): 1,592.7 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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चीज (पनीर): 428.6 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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डार्क चॉकलेट: 336.7 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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बीफ (डेयरी हर्ड): 211.1 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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कॉफी: 105.6 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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पोर्क (सुअर का मांस): 84.8 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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ट्री नट्स (मेवे): 63.3 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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पोल्ट्री मीट (मुर्गी का मांस): 59.7 वर्ग फीट प्रति पाउंड
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ग्राउंडनट (मूंगफली): 44.5 वर्ग फीट प्रति पाउंड
यह गौर करने वाली बात है कि इस सूची में केवल मांसाहारी उत्पाद ही नहीं, बल्कि कई लोकप्रिय पौधों और बागवानी से मिलने वाली चीजें भी शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर, हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनने वाली डार्क चॉकलेट और कॉफी को उगाने और तैयार करने में पोर्क, पोल्ट्री और कई प्रकार के पौष्टिक नट्स से भी ज्यादा जमीन की खपत होती है। डार्क चॉकलेट के लिए प्रति पाउंड 336.7 वर्ग फीट और कॉफी के लिए 105.6 वर्ग फीट जमीन की आवश्यकता होती है। कोको और कॉफी के बागानों के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव किया जाता है, जो इसे पर्यावरणीय दृष्टिकोण से एक संवेदनशील विषय बनाता है।
दूसरी ओर, यदि हम इस बात पर गौर करें कि सबसे कम जमीन का उपयोग कौन-सा खाद्य पदार्थ करता है, तो इस टॉप-10 सूची में मूंगफली सबसे किफायती साबित होती है। मूंगफली के उत्पादन के लिए प्रति पाउंड सिर्फ 44.5 वर्ग फीट जमीन की आवश्यकता होती है, जो लैंब और मटन के मुकाबले नगण्य के बराबर है। पौधे आधारित और दलहनी फसलें मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के साथ-साथ कम भूमि क्षेत्र में उच्च पोषण प्रदान करने की क्षमता रखती हैं, जो भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
जैसे-जैसे दुनिया भर की मानव आबादी लगातार बढ़ रही है और सीमित कृषि भूमि पर दबाव दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है, वैसे-वैसे इस प्रकार के आंकड़े हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हमारा भोजन कहां से आता है और उसकी पर्यावरण कीमत क्या है। टिकाऊ खान-पान और भविष्य की दिशा में यह समझना आवश्यक है कि हमारे आहार में जमीन की खपत का यह संतुलन आने वाले दशकों में मानवता के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
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