
विदेश में किए गए निवेश और उससे मिले रिटर्न को अघोषित संपत्ति यानी ब्लैक मनी मानकर आयकर विभाग द्वारा की गई बड़ी कार्रवाई टैक्स ट्रिब्यूनल (ITAT) में आकर पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। दिल्ली आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने एक अहम फैसले में टैक्सपेयर पर लगाए गए 2.04 करोड़ रुपये के टैक्स डिमांड और 1.84 करोड़ रुपये के भारी-भरकम जुर्माने को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। इस फैसले से करदाताओं को बड़ी कानूनी राहत मिली है और टैक्स अधिकारियों की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या था पूरा विदेशी निवेश का मामला
यह पूरा विवाद एक करदाता द्वारा सिंगापुर में नौकरी के दौरान कमाए गए पैसों से बरमूडा केंद्रित ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फंड में किए गए लगभग 3 लाख अमेरिकी डॉलर के निवेश से जुड़ा हुआ है। टैक्सपेयर ने फंड के रिडम्पशन पर 3.14 लाख डॉलर प्राप्त किए थे। भारत लौटने के बाद जब यह वित्तीय लेन-देन आयकर विभाग के संज्ञान में आया, तो विभाग ने इसे सख्त ब्लैक मनी (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति अधिनियम) के दायरे में खींच लिया।
आयकर विभाग के असेसिंग ऑफिसर (AO) ने इस निवेश की फेयर मार्केट वैल्यू 2.04 करोड़ रुपये तय करते हुए उस पर 30 प्रतिशत की दर से टैक्स लगा दिया। इसके साथ ही, ब्लैक मनी एक्ट के तहत कड़ा रुख अपनाते हुए करदाता पर 1.84 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना भी थोप दिया गया। कमिश्नर ऑफ अपील्स स्तर पर भी करदाता को राहत नहीं मिली, जिसके बाद मामला दिल्ली ITAT की बेंच के पास पहुंचा।
ITAT में कैसे पलटा पूरा मामला और क्यों हारी टैक्स अथॉरिटी
दिल्ली ITAT के न्यायिक सदस्य और अकाउंटेंट सदस्य की बेंच ने इस मामले की बारीकी से सुनवाई की। सुनवाई के दौरान करदाता के वशिष्ठ वकीलों और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने मुख्य रूप से कानूनी तकनीकी खामੀ को आधार बनाया। टैक्सपेयर का पक्ष रखते हुए दलील दी गई कि आयकर विभाग ने असेसमेंट ईयर 2019-20 के लिए जो कार्रवाई की है, उसके लिए कानूनन जरूरी धारा 10(1) का वैध नोटिस ही जारी नहीं किया गया था।
विभाग का तर्क था कि करदाता पूरी प्रक्रिया में शामिल रहा है और यह केवल एक मामूली प्रक्रियागत गलती (Procedural Defect) है, जिसे सुधारा जा सकता है। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने विभाग की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। ITAT ने स्पष्ट किया कि जब मूल्यांकन वर्ष के लिए बुनियादी और अनिवार्य अधिकारक्षेत्रीय नोटिस (Jurisdictional Notice) ही कानून के मुताबिक जारी नहीं किया गया था, तो पूरी असेसमेंट प्रक्रिया ही शुरुआती स्तर से अवैध हो जाती है। बुनियादी ढांचा फेल होने पर उससे जुड़ी जुर्माना और टैक्स की मांगें भी कानूनी रूप से टिक नहीं सकतीं।
करदाताओं के लिए क्या है इस फैसले के मायने
यह फैसला आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च और एसईओ के लिहाज से भी टैक्स कानूनों के जटिल दायरे को समझने का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। इस निर्णय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आयकर विभाग जैसी बड़ी संस्थाओं को भी किसी भी सख्त कार्रवाई या पेनाल्टी लगाने से पहले वैधानिक प्रावधानों और नोटिस की प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नोटिस के स्तर पर ही तकनीकी खामी पाई जाती है, तो अदालतें या ट्रिब्यूनल करदाताओं को भारी भरकम पेनाल्टी और टैक्स डिमांड से सुरक्षा प्रदान करने में पीछे नहीं हटते हैं।
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