
श भर के लाखों युवा हर साल इंजीनियरिंग के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी (IIT-JEE) और मेडिकल के लिए नीट (NEET) जैसी कठिन प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में अपना दिन-रात एक कर देते हैं। इन परीक्षाओं को पास करने के लिए छात्र छठी-सातवीं कक्षा से ही कोचिंग संस्थानों का रुख करना शुरू कर देते हैं और माता-पिता भी अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा इन कोचिंग फीस पर खर्च कर देते हैं। आम तौर पर यही माना जाता है कि बच्चों की सफलता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा कोचिंग की भारी-भरकम फीस या अत्यधिक प्रतिस्पर्धा है, लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा गठित एक उच्च स्तरीय पैनल की रिपोर्ट ने इस धारणा को पूरी तरह से पलट कर रख दिया है। इस सरकारी पैनल ने अपनी जांच और आंकड़ों के आधार पर यह चौंकाने वाला खुलासा किया है कि छात्रों के लिए कोचिंग नहीं, बल्कि उनके नियमित स्कूलों की पढ़ाई और शिक्षा का मौजूदा ढांचा सबसे बड़ी परेशानी और मानसिक तनाव का कारण बन रहा है।
स्कूल और कोचिंग के बीच फँसकर रह गया है छात्र का जीवन
सरकारी पैनल की इस विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, आज के समय में स्कूली शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बीच तालमेल पूरी तरह से बिगड़ चुका है। एक तरफ स्कूल में बच्चों को बोर्ड परीक्षा के पाठ्यक्रम और पारंपरिक तरीकों से पढ़ाया जाता है, तो दूसरी तरफ कोचिंग संस्थानों में उन्हें बिल्कुल अलग पैटर्न पर शॉर्टकट और कॉम्पिटिटिव अप्रोच सिखाई जाती है। छात्र सुबह से दोपहर तक अपने रेगुलर स्कूल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और औपचारिकताएं पूरी करने के लिए मजबूर रहते हैं, और उसके तुरंत बाद वे कोचिंग भागते हैं। स्कूल के लंबे घंटों, होमवर्क, असाइनमेंट्स और प्रैक्टिकल परीक्षाओं का भारी बोझ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। इसके अलावा, कई स्कूलों में बच्चों को अपनी उपस्थिति (Attendance) पूरी करने के लिए अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता है, जिससे वे अपनी सेल्फ-स्टडी और कोचिंग के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं।
क्या अब देश में स्कूली शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की है सख्त जरूरत
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और अभिभावकों के बीच इस बात पर गंभीर बहस छिड़ गई है कि क्या हमारी मौजूदा स्कूली शिक्षा प्रणाली अब देश की आधुनिक जरूरतों और प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुकूल बची है या नहीं। पैनल का सुझाव है कि स्कूलों और कोचिंग सेंटर्स के इस दोहरे दबाव से छात्रों को बाहर निकालने के लिए एक एकीकृत (Integrated) और लचीली व्यवस्था बनाने की बेहद आवश्यकता है। यदि स्कूल स्तर पर ही छात्रों को इस प्रकार की शिक्षा और बुनियादी तैयारी मिल सके कि उन्हें अलग से लाखों रुपये खर्च करके कोचिंग संस्थानों के चक्कर न काटने पड़ें, तो बच्चों का तनाव काफी हद तक कम हो सकता है। सरकार और शिक्षा मंत्रालय अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि कैसे स्कूलों के पाठ्यक्रम को अधिक व्यावहारिक और प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुरूप बनाया जाए, ताकि बच्चों को मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सके।
अभिभावकों और छात्रों के लिए क्या है सबसे जरूरी और सही कदम
इस पूरी स्थिति को देखते हुए शिक्षा विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि वे सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर अपने बच्चों पर स्कूल और कोचिंग दोनों का असहनीय बोझ न डालें। बच्चों की क्षमता को समझकर उन्हें समय प्रबंधन (Time Management) सिखाना और उनके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। स्कूलों को भी चाहिए कि वे छात्रों की उपस्थिति के नियमों में कुछ नरमी बरतें और उन्हें अपने करियर के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जरूरी स्पेस दें। जब तक स्कूल, प्रशासन और कोचिंग संस्थान मिलकर छात्रों के हित में कोई ठोस नीति नहीं बनाते, तब तक बच्चों को इस दोहरी चक्की में पिसने से बचाना कठिन होगा। यह रिपोर्ट देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी और सुधार की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम साबित हो सकती है।
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