क्या लोन राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफी है? जानिए RBI के नियम और बैंकों की वसूली का पूरा सच

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में जब भी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) और डूबे हुए कर्जों की बात आती है, तो ‘लोन राइट-ऑफ’ (Loan Write-Off) शब्द अक्सर चर्चा और विवादों में घिर जाता है। आम जनता, सोशल मीडिया और कई बार खुद कर्जदार भी इस गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं कि बैंक ने उनका लोन ‘राइट-ऑफ’ कर दिया है, तो इसका मतलब कर्ज पूरी तरह माफ हो गया है और अब उन्हें पैसा नहीं चुकाना पड़ेगा।

हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दिशानिर्देशों और बैंकिंग कानूनों के अनुसार वास्तविकता इसके ठीक उलट है। लोन राइट-ऑफ का मतलब कतई कर्ज माफी नहीं होता। यह केवल बैंकों की बैलेंस शीट को दुरुस्त करने की एक वैधानिक अकाउंटिंग प्रक्रिया है, जिसके बाद भी बैंक कानूनी रूप से एक-एक रुपये की वसूली के लिए स्वतंत्र होते हैं।

लोन राइट-ऑफ और कर्ज माफी (Loan Waiver) में क्या है बुनियादी अंतर?

इन दोनों वित्तीय अवधारणाओं के बीच के अंतर को समझना बेहद आवश्यक है:

  • कर्ज माफी (Loan Waiver / Waive-Off): यह कानूनी और व्यावहारिक रूप से कर्ज को पूरी तरह समाप्त कर देना है। कर्ज माफी मुख्य रूप से सरकार की नीतिगत घोषणाओं (जैसे कृषि कर्ज राहत योजनाएं) या विशेष परिस्थितियों में होती है। जब कोई लोन ‘वेव-ऑफ’ होता है, तो कर्जदार कानूनी देनदारी से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और बैंक उससे भविष्य में कोई वसूली नहीं कर सकते।

  • लोन राइट-ऑफ (Loan Write-Off / Technical Write-Off): यह विशुद्ध रूप से बैंक के बहीखाते (Accounting Books) की सफाई की प्रक्रिया है। जब कोई कर्जदार लगातार 90 दिनों से अधिक समय तक ईएमआई नहीं चुकाता और लोन एनपीए बनने के बाद भी कई वर्षों तक नहीं वसूला जा पाता, तो बैंक उसे अपनी एक्टिव एसेट बुक से हटा देता है। हालांकि, कर्जदार पर कर्ज चुकाने की कानूनी बाध्यता (Legal Liability) जस की तस बनी रहती है।

बैंक कर्जों को राइट-ऑफ क्यों करते हैं? जानिए RBI के प्रोविजनिंग नियम

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रूडेंशियल नॉर्म्स के अनुसार, बैंकों को अपने वित्तीय स्वास्थ्य को पारदर्शी और मजबूत बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना पड़ता है:

  • 100% प्रोविजनिंग का नियम: जब कोई लोन कई सालों तक एनपीए (NPA) रहता है और उसकी वसूली अनिश्चित हो जाती है, तो बैंक को अपने मुनाफे में से उस फंसे हुए कर्ज के बराबर 100% प्रोविजनिंग (Provisioning) यानी सुरक्षा राशि अलग रखनी पड़ती है।

  • बैलेंस शीट को साफ करना: यदि बैंक अपनी बैलेंस शीट पर लगातार डूबे हुए कर्जों को ‘एसेट’ के रूप में दिखाते रहेंगे, तो उनकी वित्तीय स्थिति कमजोर दिखेगी और वे नया कर्ज बांटने में असमर्थ होंगे। राइट-ऑफ करने से बैंक का ग्रॉस एनपीए (Gross NPA) कागजों पर कम हो जाता है।

  • टैक्स में छूट का लाभ: आयकर कानूनों के तहत डूबे हुए कर्ज को राइट-ऑफ करने से बैंक अपनी कर देनदारी (Tax Liability) को कानूनी रूप से ऑप्टिमाइज कर पाते हैं।

राइट-ऑफ के बाद बैंकों की वसूली कैसे और किन कानूनों से जारी रहती है?

आरबीआई के नियमों के मुताबिक, राइट-ऑफ किए गए खातों को बंद (Close) नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें एक अलग इंटरनल बहीखाते (Off-Balance Sheet Recovery Ledger) में ट्रांसफर कर दिया जाता है। बैंक निम्नलिखित कानूनी मंचों और हथियारों के जरिए अपनी वसूली प्रक्रिया को पूरी आक्रामकता से जारी रखते हैं:

  • सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act, 2002): इसके तहत बैंक बिना अदालत जाए डिफॉल्टर की गिरवी रखी संपत्ति (मकान, जमीन, फैक्ट्री) को कुर्क करके और उसकी नीलामी करके अपने पैसे वसूलते हैं।

  • डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT): ₹20 लाख से अधिक के बड़े बकाएदारों के खिलाफ बैंक डीआरटी में मुकदमा दायर करते हैं।

  • इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC, 2016): कॉर्पोरेट कर्जदारों के मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में कंपनी के समाधान या लिक्विडेशन की अर्जी लगाई जाती है।

  • लोक अदालत और सेटलमेंट: छोटे कर्जों के मामलों में लोक अदालत के जरिए समझौता कराया जाता है।

  • एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARC) को ट्रांसफर: कई बार बैंक अपने फंसे हुए कर्जों के पोर्टफोलियो को वसूली एजेंसियों या एआरसी (जैसे NARCL) को डिस्काउंट पर बेच देते हैं, जो बाद में कर्जदारों से वसूली करती हैं।

लोन राइट-ऑफ का कर्जदार के सिबिल स्कोर और क्रेडिट प्रोफाइल पर क्या असर पड़ता है?

यदि किसी व्यक्ति का लोन बैंक द्वारा राइट-ऑफ किया जाता है, तो उसके वित्तीय जीवन पर इसका गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है:

  • सिबिल रिपोर्ट पर ‘Written-Off’ का ठप्पा: बैंक क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो (CIBIL, Experian, CRIF) को रिपोर्ट करते हैं कि यह खाता ‘Written-Off’ हो चुका है।

  • सिबिल स्कोर में भारी गिरावट: क्रेडिट स्कोर तुरंत गिरकर 500 से 600 के खराब दायरे में आ जाता है।

  • भविष्य में लोन और क्रेडिट कार्ड मिलना बंद: जब तक कर्जदार बैंक का पूरा बकाया या सेटलमेंट अमाउंट चुकाकर ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ (NOC) प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक देश का कोई भी बैंक या एनबीएफसी उसे भविष्य में होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड जारी नहीं करता।

  • पासपोर्ट और विदेश यात्रा पर प्रभाव: बड़े विलफुल डिफॉल्टर्स (Wilful Defaulters) के खिलाफ लुक-आउट सर्कुलर (LOC) जारी होने पर देश छोड़ने पर भी पाबंदी लग सकती है।

लोन राइट-ऑफ को किसी भी सूरत में मुफ्त कर्ज माफी या ‘फ्री पास’ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह बैंकों का एक आंतरिक अकाउंटिंग फैसला है, जबकि कर्जदार को दी गई पाई-पाई पर कानूनन बैंक का अधिकार अंत तक बना रहता है। जब भी बैंक को डिफॉल्टर की किसी नई संपत्ति या आय स्रोत का पता चलता है, कानूनी प्रक्रिया के जरिए वसूली तुरंत तेज कर दी जाती है। वित्तीय अनुशासन बनाए रखना और समय पर ईएमआई चुकाना ही किसी भी कर्जदार के लिए अपनी क्रेडिट साख सुरक्षित रखने का सबसे सुरक्षित रास्ता है।