
भारतीय न्याय व्यवस्था में ‘देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है’ वाली कहावत का एक बेहद चौंकाने वाला और आंखें खोल देने वाला मामला देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है। किसी भी इंसान के जीवन में 45 साल का लंबा समय बहुत मायने रखता है, लेकिन कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति को अदालती चक्करों और कानूनी दांव-पेंच के बीच न्याय पाने के लिए पूरे 45 साल तक अपनी जिंदगी के अहम साल दांव पर लगाने पड़ जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे ही आपराधिक मामले पर सुनवाई करते हुए बेहद सख्त रुख अपनाया है, जहां निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक की लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण मामला चार दशकों से अधिक समय तक अटका रहा। इस स्थिति पर गहरी नाराजगी जताते हुए सर्वोच्च अदालत ने न केवल उस बुजुर्ग मुजरिम की सजा को निलंबित (Suspend) कर दिया है, बल्कि संबंधित हाईकोर्ट की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। देश की न्याय प्रणाली में मुकदमों के इस तरह दशकों तक लंबित रहने और अदालती सुस्ती पर अब चारों तरफ एक नई बहस छिड़ गई है।
क्या है पूरा मामला और कैसे शुरू हुई 45 साल की लंबी कानूनी जंग
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें दशकों पुराने एक आपराधिक विवाद से जुड़ी हैं, जिसकी शुरुआत आज से लगभग 45 साल पहले हुई थी। उस दौर में जब मामला दर्ज हुआ था, तब देश की न्यायिक व्यवस्था और कागजी रिकॉर्ड्स का तरीका आज के मुकाबले काफी अलग और सुस्त हुआ करता था। समय के साथ-साथ मुकदमों की तारीखें, गवाहों के बयान, जिरह और अदालती बदलावों के बीच यह मामला फाइलों के बोझ तले दबकर रह गया। निचली अदालत के फैसले के बाद जब मामला उच्च न्यायालय (High Court) यानी हाईकोर्ट पहुंचा, तो वहां भी अपीलों और पेंडेंसी के चलते सुनवाई में सालों-साल निकलते चले गए। इस लंबी अवधि के दौरान मामले से जुड़े कई गवाह या तो इस दुनिया में नहीं रहे या फिर मुकदमे का सामना कर रहा आरोपी अब एक वृद्ध व्यक्ति बन चुका है। इतने लंबे समय तक कानूनी तलवार लटकते रहने के कारण मुजरिम का पूरा जीवन और उसका मानसिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो चुका है, जिसने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर निशान छोड़ दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: हाईकोर्ट की सुस्ती पर जताई गहरी चिंता
जब यह मामला अपील के जरिए देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंचा, तो वहां के न्यायाधीशों ने फाइलों को देखकर गहरी हैरानी और चिंता व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में अपील या सुनवाई के लिए 45 साल का समय लगना भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक विषय है। अदालत ने विशेष रूप से हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी मामले में अपील दशकों तक पेंडिंग पड़ी रहती है और उस पर समय पर फैसला नहीं लिया जाता है, तो यह सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों और त्वरित न्याय पाने के अधिकार का हनन है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि जब न्याय मिलने में इतनी अत्यधिक देरी हो जाती है, तो सजा का मूल उद्देश्य और उसका भय दोनों ही बेमानी हो जाते हैं, क्योंकि तब तक मुजरिम अपनी उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुका होता है जहां शारीरिक और मानसिक रूप से उसका जीवन पूरी तरह बदल चुका होता है।
उम्रदराज मुजरिम की सजा हुई सस्पेंड, जमानत मिलने से मिली राहत
मामले की गंभीरता, आरोपी की अत्यधिक आयु और 45 साल के लंबे व दंडात्मक मानसिक सफर को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा और उस पर हाईकोर्ट के रुख को दरकिनार करते हुए फिलहाल उस उम्रदराज मुजरिम की सजा को पूरी तरह से निलंबित (Suspend) कर दिया है। इसके साथ ही, उसे उचित शर्तों के आधार पर जमानत का लाभ भी दे दिया गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भले ही एक विशेष परिस्थिति और अत्यधिक देरी के आधार पर आया हो, लेकिन यह देश के तमाम उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे पेंडिंग मामलों के निपटारे में तेजी लाएं ताकि किसी भी आम नागरिक को न्याय के लिए आधी सदी तक इंतजार न करना पड़े।
भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक और सुधार की जरूरत
यह पूरा प्रकरण इस बात का जीवंत उदाहरण है कि भारत की निचली और ऊपरी अदालतों में जजों की कमी, भारी-भरकम मुकदमों का बोझ और पुरानी पारंपरिक कार्यशैली किस तरह आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करती है। देश के कानूनविदों और नीति निर्माताओं का लंबे समय से यह कहना रहा है कि जब तक न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल रिकॉर्ड्स और समयबद्ध सुनवाई की आधुनिक तकनीकों को पूरी तरह से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे मामलों पर लगाम लगाना मुश्किल होगा। सुप्रीम कोर्ट की इस ताजा और कड़ी टिप्पणी के बाद अब एक बार फिर से यह आवाज तेज हो गई है कि देश की न्याय प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए त्वरित न्याय नीति (Fast Track Justice) को प्राथमिकता के आधार पर बढ़ावा देना चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक को अपने जीवन के 45 साल सिर्फ यह साबित करने में न बिताने पड़ें कि वह निर्दोष है या उसे न्याय चाहिए।
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