
सनातन धर्म में सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी ‘सावन पुत्रदा एकादशी’ (पवित्रा एकादशी) का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह सावन माह की अंतिम एकादशी होती है, जो भगवान श्रीहरि विष्णु और देवाधिदेव महादेव दोनों की असीम कृपा प्राप्त करने का पावन अवसर प्रदान करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक इस दिन विधि-विधान से व्रत रखते हैं और महिष्मती पुरी के राजा महीजित की पौराणिक कथा का श्रवण करते हैं, उनकी संतान संबंधी सभी बाधाएं दूर होती हैं, योग्य व दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है और जीवन के अंत में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
सावन पुत्रदा एकादशी की पावन पौराणिक कथा: राजा महीजित और महर्षि लोमश
द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण ने सावन पुत्रदा एकादशी के महात्म्य और उसकी कथा का वर्णन किया था।
प्राचीन काल में महिष्मती पुरी नामक एक समृद्ध राज्य था, जहां ‘महीजित’ नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा, परोपकारी और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। राजा महीजित अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान स्नेह देते थे और राज्य में किसी प्रकार का अभाव नहीं था। परंतु, इतना सब कुछ होने के बाद भी राजा का कोई पुत्र या संतान नहीं थी। संतानहीन होने के कारण राजा महीजित दिन-रात अत्यंत दुखी और चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि जिस मनुष्य का कोई पुत्र न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही सूने और कष्टकारी होते हैं।
राजा ने संतान प्राप्ति के लिए अनेक दान, तप और अनुष्ठान किए, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। जब राजा वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगे, तो उन्होंने अपनी प्रजा और विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर अपनी व्यथा कही, “हे प्रजाजनों! मैंने जीवन में कभी कोई अधर्म नहीं किया, प्रजा पर कभी अत्याचार नहीं किया और सदैव धर्मपूर्वक राजकाज चलाया, फिर भी मुझे संतान का सुख क्यों नहीं मिला?”
लोमश ऋषि का दिव्य आश्रम और पूर्व जन्म का रहस्य
राजा की इस गहरी पीड़ा को देखकर राज्य के प्रमुख मंत्री, प्रजाजन और ब्राह्मण समाधान खोजने के लिए वन की ओर निकल पड़े। वन में भ्रमण करते हुए वे त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश के पवित्र आश्रम में पहुंचे। महर्षि लोमश ब्रह्मा जी के समान दीर्घायु और तीनों कालों के ज्ञाता थे। प्रजाजनों ने हाथ जोड़कर ऋषि से राजा महीजित के निःसंतान होने का कारण और उपाय पूछा।
महर्षि लोमश ने अपने ध्यान और तपोबल से राजा के पूर्व जन्म के कर्मों को देखा और कहा: “हे भद्र पुरुषों! राजा महीजित पूर्व जन्म में एक अत्यंत निर्धन और लोभी वैश्य (व्यापारी) थे। एक बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को, जब वे व्यापार के सिलसिले में दो दिनों से भूखे-प्यासे भटक रहे थे, तब वे एक जलाशय पर पहुंचे। वहां एक प्यासी गाय अपने नवजात बछड़े के साथ पानी पीने आई थी। वैश्य ने उस प्यासी गाय को डंडे मारकर वहां से भगा दिया और स्वयं पहले पानी पी लिया।”
ऋषि ने आगे बताया, “राजा ने जीवन में जो सत्कर्म और दान किए थे, उनके प्रभाव से उन्हें इस जन्म में राजा का पद और अकूत वैभव प्राप्त हुआ। परंतु, प्यासी गाय और बछड़े को जल पीने से रोकने के महापाप के कारण ही उन्हें इस जन्म में संतान वियोग का भयंकर दुख भोगना पड़ रहा है।”
पुत्रदा एकादशी का व्रत और संतान प्राप्ति का वरदान
प्रजाजनों ने अत्यंत व्याकुल होकर महर्षि लोमश से उस पाप के निवारण का उपाय पूछा।
तब महर्षि लोमश ने कृपापूर्वक बताया, “सावन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘पुत्रदा एकादशी’ कहा जाता है। यदि राजा महीजित, उनकी पटरानी और राज्य के सभी लोग पूर्ण श्रद्धा के साथ इस एकादशी का निर्जला/फलाहारी व्रत रखें, रात्रि जागरण कर भगवान विष्णु की आराधना करें और द्वादशी के दिन उस व्रत का समस्त पुण्यफल राजा को समर्पित कर दें, तो राजा का पूर्व जन्म का पाप तत्काल भस्म हो जाएगा और उन्हें अवश्य ही तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी।”
प्रजाजनों ने राजधानी लौटकर महर्षि लोमश का पूरा संदेश राजा और रानी को सुनाया। सावन शुक्ल एकादशी तिथि आने पर राजा महीजित, महारानी और पूरी प्रजा ने नियमपूर्वक पुत्रदा एकादशी का पावन व्रत किया और श्रीहरि की पूजा-अर्चना की। द्वादशी के दिन सभी ने अपने व्रत का पुण्य राजा को अर्पित किया।
व्रत के दिव्य प्रभाव से राजा के पूर्व जन्म का पाप कट गया और कुछ ही समय बाद महारानी गर्भवती हुईं। समयानुसार उन्होंने एक अत्यंत सुंदर, गुणवान, प्रतापी और यशस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा महीजित का जीवन खुशियों से भर गया और मृत्यु के उपरांत उन्हें वैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।
पुत्रदा एकादशी व्रत और पूजा के मुख्य नियम
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भगवान विष्णु का अभिषेक: सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु और शालिग्राम जी का गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक करें और पीले पुष्प, फल, चंदन व तुलसी दल अर्पित करें।
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कथा का श्रवण व कीर्तन: दोपहर या संध्या के समय राजा महीजित की इस पवित्र कथा का पाठ करें अथवा ध्यानपूर्वक श्रवण करें।
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द्वादशी पारण: अगले दिन द्वादशी तिथि के शुभ मुहूर्त में किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर और दक्षिणा देकर ही व्रत का पारण करें।
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