
महाराष्ट्र की सड़कों पर ऑटो या टैक्सी चलाने वाले चालकों के लिए एक बेहद अहम और कड़ा नियम लागू कर दिया गया है। राज्य सरकार ने व्यावसायिक वाहनों के संचालन के लिए मराठी भाषा के ज्ञान को पूरी तरह से अनिवार्य बना दिया है। नए नियमों के मुताबिक, यदि अब कोई चालक मराठी नहीं जानता है, तो उसे पहले नोटिस दिया जाएगा और एक निश्चित समय सीमा के भीतर भाषा न सीखने की स्थिति में उसका ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट तक रद्द किया जा सकता है। सरकार के इस कदम से राज्यभर के हजारों चालकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
परिवहन विभाग का नया आदेश और कार्रवाई की रूपरेखा
राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक की घोषणा के बाद, बिना मराठी ज्ञान वाले ऑटो और टैक्सी चालकों के खिलाफ एक व्यापक और विशेष जांच अभियान शुरू कर दिया गया है। परिवहन विभाग के नए दिशा-निर्देशों के तहत महाराष्ट्रभर में आरटीओ (क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय) के उड़न दस्ते सक्रिय हो गए हैं। जांच प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरतने के लिए अभियान की पूरी वीडियोग्राफी भी कराई जा रही है। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि सड़क पर उतरकर चालकों की भाषाई दक्षता की जांच की जाए और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
तीन महीने का अल्टीमेटम और लाइसेंस कैंसिलेशन का नियम
परिवहन विभाग के नियमों के अनुसार, जांच के दौरान जिन चालकों को मराठी भाषा की बुनियादी जानकारी नहीं मिलेगी, उन्हें शुरुआत में चेतावनी नोटिस जारी किया जाएगा।
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नोटिस और समय सीमा: नोटिस मिलने के बाद चालकों को मराठी सीखने के लिए उचित समय दिया जाएगा ताकि वे भाषा में सहज हो सकें।
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निलंबन और रद्दीकरण: यदि तय तीन महीने की अवधि बीत जाने के बाद भी चालक भाषा सीखने में विफल रहता है, तो उसके ड्राइविंग लाइसेंस और कमर्शियल बैज को तीन महीने के लिए निलंबित कर दिया जाएगा। इसके बावजूद सुधार न होने पर उनके वाहन के परमिट और लाइसेंस को हमेशा के लिए रद्द करने की सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यूनियनों की चिंताएं और भ्रष्टाचार का अंदेशा
सरकार के इस फैसले से दूसरे राज्यों से आकर महाराष्ट्र में अपनी आजीविका चलाने वाले हजारों चालकों में हड़कंप मच गया है। ऑटो-टैक्सी यूनियनों ने इस नियम को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं। ‘सेवा सारथी ऑटो रिक्शा टैक्सी एंड ट्रांसपोर्ट यूनियन’ के नेता डीएम गोसावी का कहना है कि सरकार ने ‘वर्किंग नॉलेज’ (कार्यसाधक ज्ञान) की बात तो कही है, लेकिन इसकी कोई स्पष्ट और पुख्ता परिभाषा तय नहीं की गई है। यूनियनों का मानना है कि नियम में स्पष्टता न होने के कारण धरातल पर आरटीओ अधिकारियों द्वारा चालकों का वित्तीय शोषण और भ्रष्टाचार बढ़ने की आशंका है।
सरकार का पक्ष और अब तक का रुझान
इन तमाम चिंताओं के बीच महाराष्ट्र सरकार का साफ तौर पर कहना है कि इस नियम का उद्देश्य किसी भी गरीब या मेहनतकश व्यक्ति की आजीविका को प्रभावित करना नहीं है, बल्कि स्थानीय यात्रियों की सुविधा और भाषा के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना है। परिवहन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि कुछ महीने पहले जब यह पहल शुरू की गई थी, तब से लेकर अब तक महाराष्ट्रभर से 1,65,601 से अधिक चालक स्वेच्छा से मराठी सीखने के लिए आगे आ चुके हैं। मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) समेत पूरे राज्य के लगभग छह लाख ऑटो और टैक्सी चालकों को इस दायरे में लाने की योजना है ताकि वे समय रहते भाषा सीख सकें और किसी भी कानूनी कार्रवाई से बच सकें।
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