
उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बयानों का दौर तेज हो गया है। बीजेपी में मोर्चा संभालते ही बासित अली ने समाजवादी पार्टी (सपा) पर करारा हमला बोला है। उन्होंने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि उनमें हिम्मत है, तो वे आजम खान को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित करें। अली के इस बयान ने राज्य की राजनीति में खलबली मचा दी है और सपा के भीतर नए समीकरणों को लेकर बहस छेड़ दी है।
बीजेपी नेता बासित अली की सपा पर तीखी चोट
बीजेपी में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने के बाद बासित अली ने आक्रामक रुख अपनाते हुए विपक्षी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी को घेरना शुरू कर दिया है। बासित अली ने कहा कि समाजवादी पार्टी हमेशा से तुष्टीकरण की राजनीति करती आई है और अब उन्हें अपनी कथनी और करनी को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सपा के अंदरूनी कलह और आजम खान के प्रति पार्टी के नरम रुख को देखते हुए यह जरूरी है कि जनता के सामने सच्चाई आए। अली की यह ललकार सपा के लिए एक बड़ी सियासी मुसीबत खड़ी कर सकती है, क्योंकि आजम खान के नाम पर पार्टी के भीतर पहले से ही मतभेद की खबरें आती रही हैं।
आजम खान को सीएम प्रत्याशी बनाने के बहाने सपा को घेरा
बीजेपी नेता ने सपा की चुनावी रणनीति पर निशाना साधते हुए कहा कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर रहे हैं और केवल परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर सपा वास्तव में सबको साथ लेकर चलने का दावा करती है, तो उन्हें आजम खान जैसे बड़े नेता को आगे करके यह साबित करना चाहिए। सियासी गलियारों में चर्चा है कि बासित अली का यह बयान सपा के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की बीजेपी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। बासित अली ने अपनी ललकार में यह भी साफ कर दिया है कि बीजेपी किसी भी हाल में सपा के इस ‘वोट बैंक की राजनीति’ को सफल नहीं होने देगी और आगामी चुनावों में जनता उन्हें करारा जवाब देगी।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या आजम खान को आगे करना सपा के लिए आसान है?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बासित अली का यह बयान केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि एक गहरी सोची-समझी चाल है। आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से रहे हैं, लेकिन उनके हालिया कानूनी विवादों और पार्टी नेतृत्व से बढ़ती दूरी के कारण सपा उनके नाम पर खुलकर कोई फैसला लेने से बचती रही है। बीजेपी का यह दांव सपा को दोहरे संकट में डाल सकता है। यदि सपा उन्हें प्रत्याशी घोषित करती है, तो विवादों के कारण पार्टी की छवि खराब होने का डर है और यदि नहीं करती है, तो मुस्लिम समाज में एक गलत संदेश जा सकता है कि सपा अपने पुराने दिग्गजों का सम्मान नहीं करती है। इस बयान के बाद अब अखिलेश यादव पर यह दबाव बढ़ गया है कि वे अपनी पार्टी की स्थिति स्पष्ट करें।
चुनावी माहौल में गरमाया पारा, जनता पर क्या होगा असर?
बासित अली की इस जोरदार ललकार के बाद राज्य का चुनावी तापमान बढ़ने लगा है। बीजेपी अब जमीनी स्तर पर सपा की कमियों को उजागर करने के लिए ऐसे ही आक्रामक बयानों का सहारा ले रही है। हालांकि सपा की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन पार्टी के भीतर इस बयान को लेकर मंथन तेज हो गया है। जनता के बीच इस तरह के मुद्दों का क्या प्रभाव पड़ेगा, यह तो आने वाले चुनाव ही बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि बासित अली ने बीजेपी की तरफ से मोर्चा संभालते ही विपक्ष को बैकफुट पर धकेलने का काम बखूबी शुरू कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा इस चुनौती का सामना कैसे करती है और क्या बीजेपी का यह ‘आजम कार्ड’ सपा को कोई नुकसान पहुंचा पाता है या नहीं।
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