भारी बारिश से बिगड़ेगा आम आदमी के घर का बजट! टमाटर, हरी सब्जियां और दूध के दाम छू सकते हैं आसमान

देशभर के विभिन्न राज्यों में जारी मूसलाधार बारिश, जलभराव और बाढ़ जैसी स्थितियों ने जहां जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, वहीं अब इसका सीधा और गहरा असर आम आदमी की रसोई के बजट पर पड़ने लगा है। उत्तर भारत से लेकर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में लगातार हो रही तेज बारिश के कारण खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं और प्रमुख राजमार्गों पर आवागमन बाधित होने से फल, सब्जी, दूध और अन्य दैनिक उपयोगी वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) बुरी तरह प्रभावित हुई है। मंडियों में आवक घटने से हरी सब्जियों के दामों में अचानक 30 से 60 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज किया जा रहा है, जिससे आने वाले दिनों में खुदरा महंगाई के और भड़कने की आशंका जताई जा रही है।

खेतों में पानी भरने से फसलें बर्बाद, मंडियों में घटी आवक

मानसून की भारी बारिश का सबसे पहला और तेज झटका सब्जियों के उत्पादन पर लगा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे बड़े उत्पादक राज्यों के कई इलाकों में जलजमाव के कारण खेतों में लगी तोरई, लौकी, भिंडी, बैंगन, फूलगोभी और पत्तेदार हरी सब्जियां सड़ने लगी हैं। थोक व्यापारियों के अनुसार, बारिश के मौसम में खेतों से सब्जियों की तुड़ाई और ढुलाई का काम बेहद कठिन हो जाता है। इसके चलते दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, लखनऊ और कोलकाता जैसी बड़ी थोक मंडियों में सब्जियों की दैनिक आपूर्ति में 40 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते इस बड़े अंतर का सीधा असर कीमतों में भारी तेजी के रूप में सामने आ रहा है।

टमाटर और प्याज के तेवर फिर तीखे, हरी सब्जियों के दाम दोगुने

सब्जियों के बाजार में सबसे बड़ा झटका टमाटर और प्याज के दामों से लग रहा है। प्रमुख टमाटर उत्पादक क्षेत्रों में अधिक बारिश और फंगस की बीमारी के चलते उत्पादन घटा है, जिससे खुदरा बाजार में टमाटर के दाम एक बार फिर प्रति किलो 60 से 90 रुपये तक पहुंच रहे हैं। इसी तरह प्याज और आलू की कीमतों में भी तेजी देखी जा रही है क्योंकि भंडारण से मंडियों तक माल पहुंचाने में बारिश के कारण देरी हो रही है। धनिया, पुदीना, पालक और मेथी जैसी पत्तेदार सब्जियां पानी के संपर्क में आने से जल्दी गलती हैं, जिसके चलते इनकी कीमतें आसमान छू रही हैं। कई शहरों में जो हरी मिर्च 40 रुपये प्रति किलो बिक रही थी, वह अब 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है।

दूध और डेयरी उत्पादों पर सप्लाई चेन और चारे का संकट

भारी बारिश और बाढ़ का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव पशुपालन और डेयरी सेक्टर पर भी पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में जलभराव के चलते हरे चारे की भारी कमी हो गई है, साथ ही चारे के दाम भी बढ़ गए हैं। कई क्षेत्रों में मवेशियों में मौसमी संक्रमण और बीमारियों का खतरा बढ़ने से दूध के दैनिक उत्पादन में गिरावट आई है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण कलेक्शन सेंटरों से बड़े शहरों के प्रोसेसिंग प्लांट्स तक दूध के टैंकरों के पहुंचने में लगने वाले अतिरिक्त समय और बढ़े हुए लॉजिस्टिक्स खर्च के कारण डेयरी कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ गई है। यदि बारिश का यह दौर लंबा खिंचता है, तो आने वाले हफ्तों में पैकेट वाले दूध, पनीर, मक्खन और छाछ के खुदरा दामों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

ट्रांसपोर्टेशन जाम और फ्रेट चार्ज बढ़ने से रोजमर्रा का सामान महंगा

पहाड़ी और मैदानी राज्यों में भूस्खलन, पुलों के टूटने और राष्ट्रीय राजमार्गों पर पानी भरने से भारी ट्रकों की आवाजाही की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। ट्रकों को गंतव्य तक पहुंचने में सामान्य से दो से तीन गुना अधिक समय लग रहा है। डीजल की खपत और बढ़े हुए फ्रेट (भाड़ा) शुल्क के कारण रोजमर्रा के एफएमसीजी (FMCG) सामान—जैसे दालें, खाद्य तेल, पैकेज्ड आटा, मसाले, चाय पत्ती, बिस्कुट और साबुन की सप्लाई कॉस्ट में इजाफा हुआ है। थोक व्यापारियों का कहना है कि जब तक माल की निर्बाध डिलीवरी शुरू नहीं होती, तब तक डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बना रहेगा, जिसका भार अंततः खुदरा ग्राहकों पर ही पड़ेगा।

खाद्य महंगाई का खतरा और रिजर्व बैंक की नीतियों पर असर

अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों का मानना है कि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आने वाला यह मौसमी उछाल देश की खुदरा मुद्रास्फीति (CPI Inflation) को प्रभावित कर सकता है। भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं और सब्जियों की हिस्सेदारी काफी अधिक है। यदि सब्जियों, दूध और दालों के दाम लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहते हैं, तो इससे खाद्य महंगाई दर में तेज उछाल आ सकता है। इसका असर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ब्याज दर नीतियों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती का फैसला लेते समय खाद्य महंगाई के आंकड़ों पर बारीक नजर रखता है।

राहत कब तक संभव और सरकार के क्या हैं एहतियाती कदम

व्यापारिक जानकारों का मानना है कि मानसून के दौरान सब्जियों की कीमतों में यह तेजी आमतौर पर कुछ हफ्तों के लिए अस्थायी होती है। जैसे ही बारिश का जोर कम होगा और मौसम साफ होगा, स्थानीय स्तर पर नई फसलों की कटाई और मंडियों तक आवागमन सुचारू होने से कीमतों में नरमी आने लगेगी। इस बीच, केंद्र और राज्य सरकारों के उपभोक्ता मामलों के विभाग जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए मंडियों की नियमित निगरानी कर रहे हैं। कई राज्यों में मोबाइल वैन और सरकारी आउटलेट्स के जरिए रियायती दरों पर टमाटर, प्याज और आवश्यक दालें उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है ताकि आम जनता को बढ़ती महंगाई से फौरी राहत मिल सके।