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Goa Liberation Operation Vijay: 15 अगस्त 1947 को देश आजाद होने के बाद भी गोवा क्यों नहीं बना भारत का हिस्सा? जानिए 1961 के ‘ऑपरेशन विजय’ की रोमांचक दास्तान

15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारतवर्ष ब्रिटिश हुकूमत की 200 साल पुरानी दासता की बेड़ियों को तोड़कर आजादी का जश्न मना रहा था, तब देश के पश्चिमी तट पर स्थित खूबसूरत राज्य गोवा में तिरंगा नहीं लहराया था। बहुत कम लोग इस ऐतिहासिक तथ्य से वाकिफ हैं कि अंग्रेज भारत में सबसे बाद में आए और सबसे पहले छोड़कर चले गए, लेकिन पुर्तगाली भारत आने वाले पहले यूरोपीय उपनिवेशवादी (1510 ईस्वी) थे और सबसे अंत में (1961 में) भारत से बाहर खदेड़े गए। भारत की संप्रभुता के बावजूद पुर्तगाल के तानाशाह एंटोनियो डी ओलिविएरा सालाजार ने गोवा, दमन और दीव को भारत को सौंपने से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद भारत को अपनी ही जमीन को आजाद कराने के लिए 14 साल लंबा इंतजार और अंततः 36 घंटे का निर्णायक सैन्य अभियान—’ऑपरेशन विजय’ (Operation Vijay)—चलाना पड़ा।

पुर्तगाल की हठधर्मिता और 450 साल की गुलामी का इतिहास

पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने 1510 में बीजापुर के सुल्तान यूसुफ आदिल शाह को हराकर गोवा पर कब्जा किया था। जब 1947 में अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, तो पुर्तगाली तानाशाह सालाजार का तर्क था कि गोवा भारत का हिस्सा नहीं, बल्कि पुर्तगाल का एक ‘विदेशी प्रांत’ (Overseas Province) है और नाटो (NATO) का सदस्य होने के कारण वह इसे किसी भी कीमत पर खाली नहीं करेगा। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शुरुआत में शांतिपूर्ण बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का रास्ता चुना। 1950 में भारत ने पुर्तगाल से औपचारिक वार्ता की अपील की, लेकिन पुर्तगाल ने बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए। इसके जवाब में भारत ने 1953 में लिस्बन स्थित अपना दूतावास बंद कर दिया और गोवा पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।

लोहिया का सत्याग्रह और निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर बर्बरता

गोवा को आजाद कराने की चिंगारी आजादी से पहले ही 18 जून 1946 को प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने मडगांव में एक विशाल जनसभा को संबोधित करके सुलगा दी थी। 1954 और 1955 में महाराष्ट्र और गुजरात के हजारों भारतीय राष्ट्रवादियों और सत्याग्रहियों ने ‘गोवा मुक्ति आंदोलन’ के तहत तिरंगा हाथ में लेकर गोवा की सीमाओं में प्रवेश करने का प्रयास किया। 15 अगस्त 1955 को पुर्तगाली पुलिस ने निहत्थे सत्याग्रहियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें 20 से अधिक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए और सैकड़ों गंभीर रूप से घायल हुए। इस क्रूर नरसंहार के बाद पूरे देश में पुर्तगालियों के खिलाफ भारी जनाक्रोश भड़क उठा और सैन्य कार्रवाई की मांग तेज हो गई।

18 दिसंबर 1961: शुरू हुआ थल, जल और नभ का ‘ऑपरेशन विजय’

कूटनीतिक रास्ते पूरी तरह बंद होने और पुर्तगाली सेना द्वारा भारतीय व्यापारी जहाजों पर गोलीबारी करने के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन और प्रधानमंत्री नेहरू ने सैन्य कार्रवाई को हरी झंडी दे दी। मेजर जनरल के. पी. कैंडेथ के नेतृत्व में भारतीय सेना ने 18 दिसंबर 1961 की सुबह ‘ऑपरेशन विजय’ का बिगुल फूंका।

  • थल सेना का धावा: भारतीय सेना की 17वीं इन्फैंट्री डिवीजन और 50वीं पैरा ब्रिगेड ने उत्तर और पूर्व दिशा से गोवा की सीमाओं में तेजी से प्रवेश किया और पुर्तगाली चौकियों को ध्वस्त कर दिया।

  • नौसेना का पराक्रम: अरब सागर में भारतीय नौसेना के युद्धपोतों आईएनएस राजपूत, आईएनएस किर्पान और आईएनएस बेतवा ने मोरमुगाओ बंदरगाह पर खड़े पुर्तगाली युद्धपोत ‘अल्बुकर्क’ को भीषण गोलाबारी में तबाह कर दिया और अंजदीप द्वीप पर कब्जा जमा लिया।

  • वायुसेना का सटीक वार: भारतीय वायुसेना के कैनबरा बमवर्षकों ने डाबोलिम हवाई अड्डे के रनवे पर सटीक बमबारी कर पुर्तगालियों का संपर्क दुनिया से पूरी तरह काट दिया।

36 घंटे में पुर्तगाल का सरेंडर और भारत में गोवा का विलय

भारतीय सेना के तीनों अंगों के संयुक्त और आक्रामक हमले के सामने पुर्तगाली सेना बमुश्किल 36 घंटे ही टिक पाई। 19 दिसंबर 1961 की शाम पुर्तगाल के गवर्नर जनरल मैनुअल एंटोनियो वासालो ई सिल्वा ने बिना शर्त आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही गोवा की धरती पर 451 साल पुराने दमनकारी पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन का हमेशा के लिए अंत हो गया और तिरंगा शान से फहरा दिया गया। भारत सरकार ने शुरू में गोवा, दमन और दीव को केंद्र शासित प्रदेश बनाया और बाद में 30 मई 1987 को गोवा को भारतीय संघ के 25वें पूर्ण राज्य का गौरव प्राप्त हुआ। 19 दिसंबर को हर साल पूरे गोवा में ‘गोवा मुक्ति दिवस’ (Goa Liberation Day) के रूप में बड़े गर्व के साथ मनाया जाता है।