
दुनियाभर के मौसम विज्ञानी और जलवायु वैज्ञानिक प्रशांत महासागर में घटित हो रही असामान्य मौसमी हलचल को लेकर गंभीर चेतावनी जारी कर रहे हैं। अमेरिकी मौसम एजेंसी एनओएए (NOAA) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ चुका है। यह संकेत ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Niño) के विकसित होने की पुष्टि करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग और सुपर अल नीनो के इस खतरनाक गठजोड़ की वजह से साल 2026 आधुनिक मौसम विज्ञान के इतिहास में धरती का अब तक का सबसे गर्म साल साबित हो सकता है। तापमान में इस ऐतिहासिक वृद्धि का सीधा असर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण और भारत के वर्षा चक्र पर पड़ना तय माना जा रहा है।
सुपर अल नीनो का विज्ञान और वैश्विक तापमान में रिकॉर्ड उछाल
अल नीनो मूल रूप से एक प्राकृतिक समुद्री और वायुमंडलीय घटना है, जो अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) का गर्म चरण मानी जाती है। जब प्रशांत महासागर की सतह असामान्य रूप से गर्म हो जाती है, तो व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) कमजोर पड़ जाती हैं। इसके कारण पूर्व की ओर गर्म पानी का फैलाव होता है और वायुमंडल में भारी मात्रा में ऊष्मा अवमुक्त होती है। जब यह गर्मी पहले से मौजूद ग्रीनहाउस गैसों के असर से मिलती है, तो यह वैश्विक औसत तापमान को नए रिकॉर्ड स्तर पर धकेल देती है। वर्ष 2026 में अल नीनो की तीव्रता इतनी असाधारण आंकी गई है कि यह 1950 के बाद से दर्ज सभी ऐतिहासिक रिकॉर्डों को पीछे छोड़ सकती है। इसके परिणामस्वरूप यूरोप, उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के बड़े हिस्से में भीषण लू और अनियंत्रित जंगलों की आग जैसी चरम मौसमी घटनाओं का दायरा व्यापक होता जा रहा है।
भारतीय मॉनसून और वर्षा चक्र पर अल नीनो का वास्तविक प्रभाव
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए अल नीनो हमेशा से एक बड़ी चिंता का विषय रहा है। ऐतिहासिक रूप से जब भी प्रशांत महासागर में मजबूत अल नीनो विकसित हुआ है, भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (Southwest Monsoon) में वर्षा की कमी या सूखा देखने को मिला है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय वेदर मॉडल्स के आकलन के अनुसार, अल नीनो वाकर सर्कुलेशन (Walker Circulation) को विस्थापित कर देता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप पर नमी युक्त मानसूनी हवाओं का दबाव कमजोर पड़ जाता है। इसके चलते मॉनसून के दौरान लंबे ‘ड्राई स्पेल’ यानी बारिश में ठहराव की अवधि बढ़ जाती है। वर्षा का वितरण अत्यधिक असमान हो जाता है, जहां कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखा पड़ता है, वहीं कुछ स्थानीय इलाकों में अचानक अत्यधिक तीव्र बारिश या क्लाउडबर्स्ट (Cloudburst) जैसी चरम घटनाएं बढ़ जाती हैं।
इंडियन ओशन डिपोल (IOD) और भारत के लिए राहत की संभावना
यद्यपि अल नीनो का खतरा बड़ा है, लेकिन भारतीय मौसम प्रणाली केवल प्रशांत महासागर पर निर्भर नहीं है। हिंद महासागर में बनने वाला ‘इंडियन ओशन डिपोल’ (IOD) भारत के मॉनसून के लिए एक ढाल का काम कर सकता है। जब हिंद महासागर का पश्चिमी भाग पूर्वी हिस्से की तुलना में अधिक गर्म होता है, तो इसे ‘पॉजिटिव आईओडी’ (Positive IOD) कहा जाता है। पॉजिटिव आईओडी अरब सागर से पर्याप्त नमी खींचकर भारत की तरफ भेजता है, जिससे अल नीनो का नकारात्मक प्रभाव काफी हद तक संतुलित हो जाता है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 के अंतिम महीनों में हिंद महासागर में पॉजिटिव आईओडी के संकेत उभर रहे हैं, जिससे देश के जलाशय स्तर और भूजल भंडारण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को आंशिक रूप से सीमित किया जा सकता है।
कृषि, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक खतरे
यदि 2026 में अल नीनो का असर देर तक बना रहता है, तो इसका सबसे गहरा प्रभाव रबी और खरीफ दोनों फसलों की बुआई तथा उत्पादकता पर देखने को मिल सकता है। धान, सोयाबीन, मक्का, दालें और गन्ने जैसी फसलों के उत्पादन में गिरावट की आशंका से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खुदरा महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अतिरिक्त, भीषण गर्मी के कारण बिजली की मांग में अप्रत्याशित उछाल और प्रमुख जलाशयों में जल स्तर घटने से पेयजल आपूर्ति पर भी भारी असर पड़ने की संभावना है। विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि किसानों को सूखा-प्रतिरोधी फसलों और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन के इस तीव्र झटके से खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखा जा सके।
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