वीर सावरकर टिप्पणी मामले में राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: लखनऊ कोर्ट का समन और आपराधिक शिकायत पूरी तरह रद्द, जानें ‘सरकारी मंजूरी’ पर शीर्ष अदालत ने क्या दिया फैसला!

देश की सर्वोच्च अदालत से कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी राहत मिली है। स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी को लेकर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की एक अदालत द्वारा जारी समन और आपराधिक शिकायत को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में कानून के तहत जरूरी वैधानिक अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) मौजूद नहीं थी, जिसके चलते यह कानूनी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। शीर्ष अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही पिछले कई सालों से चल रहे इस हाई-प्रोफाइल कानूनी विवाद का पटाक्षेप हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने क्यों रद्द किया समन और शिकायत?

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह पाया कि राहुल गांधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और धारा 505 (सार्वजनिक उपद्रव) जैसी संवेदनशील धाराओं के तहत मुकदमा चलाने के लिए सक्षम सरकार की पूर्व मंजूरी अनिवार्य होती है।

जब अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के हलफनामे और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के बयानों की समीक्षा की, तो पाया गया कि राज्य सरकार की ओर से राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए कोई कानूनी मंजूरी जारी ही नहीं की गई थी। इस पर पीठ ने सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कानून में मंजूरी की स्पष्ट अनिवार्यता है और सरकार ने कोई मंजूरी नहीं दी है, तो मामला सीधे तौर पर समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता और मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया।

क्या है पूरा मामला? 2022 में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान दिया गया था बयान

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें साल 2022 में कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से जुड़ी हुई हैं। 17 नवंबर 2022 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में आयोजित एक जनसभा और प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने वीर सावरकर को लेकर कुछ विवादित टिप्पणियां की थीं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि सावरकर अंग्रेजों के मददगार थे और वे ब्रिटिश हुकूमत से पेंशन लेते थे। उन्होंने एक ऐतिहासिक दस्तावेज का हवाला देते हुए सावरकर द्वारा अंग्रेजों को लिखे गए पत्रों का भी उल्लेख किया था।

राहुल गांधी के इस बयान के बाद पूरे देश की राजनीति में भूचाल आ गया था। बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) समेत कई संगठनों ने इस पर कड़ा विरोध जताया था। इसके बाद लखनऊ के निवासी और वकील नृपेंद्र पांडेय ने लखनऊ की अदालत में एक निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी ने सावरकर का जानबूझकर अपमान किया है और उनके बयान से समाज में वैमनस्यता और नफरत फैलने का गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है।

लखनऊ कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक: कानूनी लड़ाई का पूरा घटनाक्रम

यह मामला निचली अदालत से होते हुए देश की शीर्ष अदालत तक एक लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरा:

शिकायतकर्ता ने सबसे पहले एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) के समक्ष एफआईआर दर्ज कराने की याचिका दायर की थी। हालांकि, जून 2023 में मजिस्ट्रेट ने इस शिकायत को खारिज कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सत्र अदालत (Sessions Court) का दरवाजा खटखटाया, जिसने मामले को दोबारा विचार के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट को भेज दिया।

दिसंबर 2024 में लखनऊ के मजिस्ट्रेट ने राहुल गांधी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए उन्हें समन जारी कर दिया था। मजिस्ट्रेट के इस समन को राहुल गांधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में चुनौती दी। हालांकि, 4 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि राहुल गांधी सत्र अदालत में रिवीजन याचिका दायर कर सकते हैं। हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की।

‘स्वीकृति नहीं तो कोई केस नहीं’: कोर्ट रूम में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में आज हुई अंतिम सुनवाई के दौरान बेंच ने कानूनी प्रक्रिया के बुनियादी सिद्धांतों पर जोर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि क्या राज्य सरकार ने राहुल गांधी पर मुकदमा चलाने के लिए धारा 196 सीआरपीसी के तहत आवश्यक मंजूरी दी है? जब सरकारी वकील ने पुष्टि की कि ऐसी कोई मंजूरी नहीं दी गई है, तो अदालत ने स्थिति को स्पष्ट कर दिया।

शिकायतकर्ता के वकील ने अनुरोध किया कि मामले को मजिस्ट्रेट कोर्ट को दोबारा विचार के लिए वापस भेजा जाए, लेकिन बेंच ने इसे स्वीकार नहीं किया। जस्टिस दत्ता ने साफ शब्दों में कहा, “मंजूरी की आवश्यकता कानूनन अनिवार्य है। यहां कोई मंजूरी नहीं है। यदि कोई कानूनी स्वीकृति नहीं है, तो कोई केस नहीं बनता। आपको कानून का पालन करना होगा और यहीं पर यह मामला खत्म होता है।”

स्वतंत्रता सेनानियों पर सुप्रीम कोर्ट की पूर्व की सख्त टिप्पणी

यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी और कानूनी आधार पर इस मामले को खारिज कर दिया, लेकिन इससे पहले हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने राहुल गांधी के बयानों पर बेहद तल्ख और सख्त टिप्पणियां भी की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को कड़ी चेतावनी दी थी कि वे देश के स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ ऐसी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी करने से बचें।

अदालत ने सुनवाई के दौरान याद दिलाया था कि राहुल गांधी की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने भी एक बार वीर सावरकर के योगदान की सराहना करते हुए पत्र लिखा था। अदालत ने मौखिक रूप से कहा था कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने देश को आजादी दिलाई है और उनके ऐतिहासिक संदर्भों को समझे बिना उन पर इस तरह के हमले नहीं किए जाने चाहिए। अदालत ने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि भविष्य में ऐसे बयान दोहराए गए, तो सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर कार्रवाई करने में संकोच नहीं करेगा।

राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए इस फैसले के सियासी और कानूनी मायने

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राहुल गांधी के लिए एक बहुत बड़ी राजनीतिक और कानूनी विजय माना जा रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की संवैधानिक जिम्मेदारी संभालने के बाद उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मानहानि और हेट स्पीच से जुड़े मामलों में यह फैसला उनके कानूनी बोझ को कम करेगा।

कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे सत्य और न्याय की जीत करार दिया है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्ष के नेताओं को राजनीतिक दुर्भावना के तहत मुकदमों में फंसाने की कोशिशें अदालत के सामने टिक नहीं पा रही हैं। वहीं, कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला एक बार फिर यह साबित करता है कि राजनीतिक भाषणों को लेकर धारा 153A जैसी गंभीर धाराओं के दुरुपयोग पर न्यायपालिका की नजर हमेशा सख्त रहती है और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन कर किसी भी जनप्रतिनिधि को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जा सकता।