
तकनीकी और मेडिकल साइंस की दुनिया में एक ऐसा क्रांतिकारी बदलाव सामने आया है जो इंसानी इतिहास की धारा को पूरी तरह बदल सकता है। अब तक आपने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) और ब्रेन चिप इम्प्लांटेशन के बारे में यही सुना होगा कि इसके लिए मरीज की खोपड़ी (Skull) की जटिल सर्जरी करनी पड़ती है, जिसमें घंटों का समय लगता है और गंभीर जोखिम भी शामिल होते हैं। लेकिन अब चीन ने इस पूरी अवधारणा को पलट कर रख दिया है। चीन के एक स्टार्टअप ने ऐसी नायाब और अत्याधुनिक तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिसकी मदद से बिना किसी चीर-फाड़ और सर्जरी के केवल 10 मिनट के भीतर दिमाग के अंदर चिप स्थापित की जा सकती है। चिकित्सा जगत में इस नई तकनीक को लेकर खलबली मच गई है क्योंकि यह अरबपति उद्यमी एलन मस्क की मशहूर कंपनी ‘न्यूरालिंक’ (Neuralink) को सीधी और कड़ी चुनौती देती नजर आ रही है। आइए विस्तार से जानते हैं कि चीन की यह नई तकनीक कैसे काम करती है और मेडिकल साइंस की दुनिया में इसे इतना बड़ा मील का पत्थर क्यों माना जा रहा है।
कैसे काम करती है यह 10 मिनट की अनोखी तकनीक? जानिए बिना सर्जरी का पूरा गणित
पारंपरिक रूप से जब भी किसी मरीज के दिमाग में कोई इलेक्ट्रॉनिक चिप या इलेक्ट्रोड लगाने की बात आती है, तो न्यूरोसर्जन को सर्जिकल रोबोट या अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से मरीज की खोपड़ी को खोलना पड़ता है। इसके बाद दिमाग के नाजुक टिशू या कॉर्टेक्स में सीधे इलेक्ट्रोड थ्रेड्स स्थापित किए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम दो से तीन घंटे या उससे अधिक का समय लग सकता है और रिकवरी का पीरियड भी काफी लंबा और दर्दनाक होता है। इसके विपरीत, चीन की शंघाई स्थित स्टार्टअप कंपनी ‘स्टेयरमेड टेक्नोलॉजी’ (StairMed Technology) ने चीनी अकादमी ऑफ साइंसेज के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर एक ऐसा एंडोवैस्कुलर (Vascular) तरीका खोज निकाला है, जो इन तमाम जटिलताओं से पूरी तरह मुक्त है।
इस नई तकनीक के तहत डॉक्टरों को मरीज की खोपड़ी खोलने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इसके बजाय, शरीर के प्राकृतिक रक्त संचार तंत्र (Vascular System) का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञ डॉक्टर गर्दन की एक मुख्य रक्त वाहिका (Blood Vessel या नस) के जरिए एक बेहद बारीक और लचीली डिवाइस को शरीर के अंदर दाखिल करते हैं। यह डिवाइस ब्लड वेसल के रास्ते से होते हुए बिना किसी रुकावट के सीधे दिमाग के उस लक्षित हिस्से तक पहुँच जाती है जहाँ न्यूरल सिग्नल्स को कैप्चर करना होता है। दिमाग के पास पहुँचने के बाद यह डिवाइस रक्त वाहिका की दीवार के बिल्कुल बाहर सुरक्षित रूप से एंकर या फिक्स हो जाती है। बीजिंग के प्रतिष्ठित शुआनवू अस्पताल के मुख्य चिकित्सक डुआन वानरू के अनुसार, चार से पांच साल के अनुभव वाला एक कुशल सर्जन इस पूरी प्रक्रिया को महज 10 मिनट के भीतर सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है। यह समय पारंपरिक ओपन-स्कल सर्जरी के मुकाबले बेहद कम है।
एलन मस्क की Neuralink को सीधी चुनौती, ग्लोबल टेक रेस में आगे निकलने की होड़
ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) की दौड़ में अब तक एलन मस्क की कंपनी ‘न्यूरालिंक’ (Neuralink) का दबदबा सबसे ऊपर माना जाता रहा है। न्यूरालिंक ने पिछले कुछ समय में सुअर और बंदरों के साथ-साथ इंसानों पर भी अपनी चिप के सफल क्लिनिकल ट्रायल दुनिया के सामने रखे हैं, जिसमें मरीजों ने अपने विचारों (Thoughts) की मदद से कंप्यूटर स्क्रीन पर गेम खेलने या कर्सर चलाने जैसे कारनामे करके दिखाए हैं। हालांकि, न्यूरालिंक की तकनीक में खोपड़ी को काटना और रोबोटिक सुइयों की मदद से मस्तिष्क के ऊतकों में सीधे तार पिरोना शामिल है। इस प्रक्रिया को लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों के एक वर्ग में हमेशा से सुरक्षा चिंताओं और बड़े पैमाने पर जोखिम को लेकर चर्चा होती रही है।
यही कारण है कि चीन का यह नया दृष्टिकोण ग्लोबल टेक और मेडिकल जगत का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। चीन न केवल इस तकनीक को विकसित कर रहा है बल्कि अपनी घरेलू बीसीआई (BCI) इंडस्ट्री को मजबूती देने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश भी कर रहा है। पिछले एक साल के दौरान स्टेयरमेड टेक्नोलॉजी को चीन के दिग्गज निवेशकों जैसे कि टेनसेंट और अलीबाबा से 1.1 अरब युआन (लगभग 163 मिलियन अमेरिकी डॉलर) से अधिक की फंडिंग मिल चुकी है। चीन की सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक देश में कम से कम दो से तीन ऐसी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियां खड़ी कर दी जाएं जो ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक में दुनिया का नेतृत्व कर सकें। अमेरिका की एक अन्य कंपनी ‘सिंक्रोन’ (Synchron) भी जुगुलर वेन के जरिए इसी तरह की वैस्कुलर तकनीक पर काम कर रही है, लेकिन चीन ने जिस गति और 10 मिनट के इम्प्लांटेशन का दावा किया है, उसने इस रेस को बेहद रोमांचक बना दिया है।
पैरालिसिस और गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकारों से ग्रस्त मरीजों के लिए बनेगी जीवनदान
आम लोगों के मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि क्या यह ब्रेन चिप तकनीक आम इंसानों के सामान्य इस्तेमाल या स्मार्टफोन चलाने के लिए बनाई जा रही है? इसका जवाब है— बिल्कुल नहीं। इस अत्याधुनिक तकनीक का मुख्य फोकस उन गंभीर रूप से बीमार और असहाय मरीजों पर है, जो पैरालिसिस (लकवा), स्पाइनल कॉर्ड इंजरी, एएलएस (Amyotrophic Lateral Sclerosis) या अन्य गंभीर मोटर न्यूरॉन विकारों के कारण अपने शरीर के अंगों को हिलाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
जब कोई स्वस्थ व्यक्ति अपने हाथ को हिलाने या किसी वस्तु को पकड़ने का सिर्फ विचार करता है, तो उसका मस्तिष्क सूक्ष्म विद्युत तरंगें (Neural Signals) उत्पन्न करता है। लेकिन गंभीर चोट या बीमारी के कारण दिमाग से शरीर के अन्य अंगों तक यह संदेश भेजने वाले रास्ते टूट जाते हैं। ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) तकनीक इन्हीं न्यूरल सिग्नल्स को सीधे तौर पर रिकॉर्ड कर लेती है। इसके बाद उन्नत सॉफ्टवेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एल्गोरिदम इन सिग्नल्स को डीकोड करके कंप्यूटर या रोबोटिक डिवाइस के लिए कमांड में बदल देते हैं। इसका मतलब यह है कि जो मरीज बोल नहीं सकते या अपने हाथों से कुछ कर नहीं सकते, वे भविष्य में केवल अपने मन की इच्छा या विचारों के बल पर कंप्यूटर पर टाइप कर सकेंगे, अपनी व्हीलचेयर को चला सकेंगे या बाहरी उपकरणों को नियंत्रित करके एक स्वावलंबी जीवन जी सकेंगे।
वर्तमान परीक्षण और भविष्य की राह: अभी इंसानी ट्रायल बाकी, वैज्ञानिक और विनियामक चुनौतियाँ
यद्यपि चीन के इस स्टार्टअप और शोधकर्ताओं के दावे बहुत बड़े और आकर्षक लग रहे हैं, लेकिन मेडिकल साइंस के क्षेत्र में किसी भी नए आविष्कार को धरातल पर उतरने से पहले कड़े वैज्ञानिक और विनियामक (Regulatory) पैमानों से गुजरना पड़ता है। वर्तमान स्थिति की बात करें तो स्टेयरमेड टेक्नोलॉजी की इस वैस्कुलर ब्रेन चिप तकनीक का परीक्षण अभी तक केवल भेड़ों (Sheep) पर ही सफलतापूर्वक किया गया है। अभी तक इस विशेष 10 मिनट की तकनीक के लिए इंसानों पर बड़े पैमाने पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू नहीं किए गए हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि हालांकि इम्प्लांटेशन की प्रक्रिया को 10 मिनट में पूरा करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे की पूरी मेडिकल प्रक्रिया में मरीज की गहन जांच, न्यूरो-इमेजिंग, सटीक प्लेसमेंट और सर्जरी के बाद की लंबी मॉनिटरिंग शामिल होती है। इसके अलावा, मस्तिष्क के अंदर लंबे समय तक विदेशी डिवाइस के रहने से किसी प्रकार की सूजन, रक्त के थक्के जमने (Blood Clots) या अन्य न्यूरोलॉजिकल प्रभावों का अध्ययन करना भी बेहद जरूरी है। बीजिंग के शुआनवू अस्पताल के डॉक्टरों ने जरूर कुछ अन्य वेनस साइनस आधारित वैस्कुलर तकनीकों के शुरुआती मानव क्लीनिकल अध्ययन शुरू कर दिए हैं और यह भी बताया है कि यदि जरूरत पड़े तो इस डिवाइस को ऑपरेशन के एक महीने के भीतर सुरक्षित रूप से बाहर भी निकाला जा सकता है। कुल मिलाकर, यह तकनीक भले ही अभी शुरुआती रिसर्च और एक्सपेरिमेंटल फेज में हो, लेकिन आने वाले समय में यह न्यूरोलॉजी और चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में एक नए युग की शुरुआत करने की पूरी क्षमता रखती है।
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