
देश की सर्वोच्च अदालत से न्यायपालिका और शासन व्यवस्था को लेकर एक बेहद अहम और दूरदर्शी टिप्पणी सामने आई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने देश में लगातार हो रहे सीजेपी (CJP) और युवा प्रदर्शनों को लेकर एक सार्वजनिक मंच से बेहद तीखी और संवेदनशील बात कही है। सीजेआई ने सरकार और नीति निर्माताओं को सख्त सलाह देते हुए कहा है कि शासकों को अपनी जिद छोड़ने की बजाय युवाओं की बात को ध्यान से सुनना चाहिए और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि आखिर आज की युवा पीढ़ी सड़कों पर उतरकर विरोध क्यों कर रही है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र और युवा विभिन्न नीतिगत मुद्दों और अधिकारों को लेकर आवाज उठा रहे हैं। सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि एक जीवंत लोकतंत्र में संवाद सबसे बड़ा हथियार होता है। जब युवा अपनी किसी मांग या असंतोष को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हैं, तो शासन तंत्र का यह दायित्व बनता है कि वह उनकी चिंताओं को सुने और उनके मूल कारणों का संवेदनशीलता के साथ समाधान तलाशे, न कि उनकी आवाज़ को दबाने का प्रयास करे।
न्यायपालिका के शीर्ष पद से आई इस सलाह को राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि सीजेआई की यह टिप्पणी लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारी और असहमति के अधिकार के महत्व को रेखांकित करती है। जब युवा वर्ग किसी व्यवस्था से असहज होता है, तो उनकी ऊर्जा और रोष को नजरअंदाज करने के बजाय उनके साथ सार्थक बातचीत करना ही किसी भी कल्याणकारी सरकार की बुद्धिमत्ता की पहचान होती है।
CJI सूर्यकांत ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि कानून के दायरे में रहकर अपनी बात कहना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। सरकार और प्रशासन को विरोध करने वालों को दुश्मन मानने के बजाय उनके नजरिए को समझना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश की इस दो टूक सलाह ने देश में एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए असहमति और युवा संवाद कितना जरूरी है।
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